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पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष

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  पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष  “रोम में 510 ईसापूर्व में राजशाही का अंत हुआ तथा गणतंत्र की शुरुआत हुई। जिसमें राजनितिक सत्ता कुलीनों के हांथो में रही तथा उन्होंने इससे अकूत धन कमाया। जिसके चलते आमिर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती गयी तथा निम्न वर्ग इनसे नाराज रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन रोमन समाज दो वर्गो में विभाजित था - पैट्रिशियन और प्लीबियन । पैट्रिशियन में कुलीन वर्ग शामिल थे जो आर्थिक, राजनितिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे। प्लीबियन में आम लोग, किसान तथा मजदुर शामिल थे। इनके बीच होने वाले संघर्ष को "श्रेणियों का टकराव" तथा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ द ऑर्डर्स" के नाम से जाना जाता है जो लगभग 494 ई• पू• से 287 ई• पू• तक चला। रोमन इतिहासकार टाइटस लिवियस के अनुसार, प्लीबियन और पैट्रीशियन के बीच संघर्ष एक सामाजिक और आर्थिक संघर्ष था, जिसमें प्लीबियन ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार यह इतिहास का सबसे पहला 'वर्ग-संघर्ष' है जिसने बाद के सामाजिक बदलावों की नींव रखी। वैवाहिक प्रतिबंध - 445 ई• पू• के बाद पैट्रिशियन और प्लीबियन के ...

मातृवंशीयता

मातृवंशीयता संस्कृत महाकाव्यों में मातृवंशीय प्रथाओं का वर्णन विभिन्न रूपों में मिलता है, जहां वंश परंपरा, अधिकार और समाज में माताओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी। अब तक लोगों का मानना था कि पुरुषों का वर्चस्व समाज में सार्वभौमिक है और इतिहास में ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि कभी समाज में स्त्रियां पुरुषों के राजनीतिक और आर्थिक जीवन को नियंत्रित करती थीं। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी में मोरगान और बखोफन ने इस सिद्धांत को नकार दिया और बताया कि मानव संस्कृति के इतिहास में ऐसा समय भी था जब स्त्रियां समाज में प्रभावशाली थी। बखोफन ने अपना यह मत प्राचीन भारत के पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जब मातृदेवियों और रानियों का महत्वपूर्ण स्थान था। इसके लिए बखोफन ने उन प्राचीन मिथको का भी उल्लेख किया जिसमें स्त्रियों को अत्यंत शक्तिशाली रूप में दर्शाया गया है। लुईस हेनेरी मोरगान ने भी बखोफन के मत की पुष्ट की है। प्राचीन भारतीय महाकाव्यों में ऐसे अनेक उदाहरण है जिसमें मातृवंशीयता के उदाहरण देखने को मिलते है:– महाभारत: इस महाकाव्य में पांडवों और कौरवों की वं...

पितृसत्ता

पितृसत्ता पितृसत्ता से आशय पिता की सत्ता से है। पितृसत्ता दो शब्दों के मेल से बना है- पितृ + सत्ता पिता की सत्ता या शासन, जहाँ परिवार में सत्ता पिता के हाथों में होती है। पिता के बाद जब उसका बेटा इस योग्य होता है तो यह सत्ता उसे हस्तांतरित हो जाती है। कुल मिलाकर सारे प्रबंधन पर पुरुषों का ही वर्चस्व होता है यहाँ स्त्रियों के लिए कोई अधिकार नहीं होता।  पितृसत्ता को इसकी कुछ विशेषताओं के आधार पर जाना जा सकता है। 1. पुरुषों को महत्व प्रदान किया जाना। 2. पिता के बाद पुत्र ही सत्ता का अधिकारी होता है। 3. समाज में पुरुषों की मुख्य और स्त्रियों की गौण भूमिका होती है। 4. शक्ति और सत्ता का अधिकारी पुत्र ही होता है। 5. किसी भी निर्णय पर अंतिम मोहर पुरुषों की होती है। 6. पितृसत्तात्मक समाज में बेटी पिता के संरक्षण में, बहन भाई के संरक्षण में पत्नि पति के संरक्षण में रहती है। ब्रिटिश समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बी के अनुसार, पितृसत्ता सामाजिक संरचनाओं की एक प्रणाली है जिसमें पुरुष महिलाओं को अपने अधिकार में रखते हैं तथा उनका दमन और शोषण करते हैं। विद्वान गर्डा लरनर के अनुसार पितृसत्ता परिवार म...