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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

दिल्ली सल्तनत में इंडो-इस्लामिक स्थापत्यकला / वास्तुकला

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दिल्ली सल्तनत में इंडो-इस्लामिक स्थापत्यकला / वास्तुकला   12वीं सदी में तुर्क आक्रमणकारियों ने भारत में एक विशेष प्रकार की वास्तुकला को विकसित किया, जिसमें गुंबद, ऊँची मीनारें और मेहराब जैसी विशेषताएँ थीं। लेकिन भारत में पहले से ही एक उन्नत वास्तुकला शैली मौजूद थी, जिसमें सपाट छतें, खुले आंगन, शिखर और गोल खंभे शामिल थे। तुर्क अपने साथ कलाकार नहीं लाए थे, इसलिए उन्होंने भारतीय कलाकारों की मदद से इमारतें बनवाईं, जिन पर भारतीय शैली का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। हिन्दू और मुस्लिम कला के सम्पर्क ने एक नवीन शैली को जन्म दिया, जिसे इंडो-इस्लामिक कला कहा जाता है। अलंकरण के लिए तुर्कों ने ज्यामितीय और पुष्प अलंकरण को अपनाया। कुरान की आयतें खुदवाना भी अलंकरण का एक तरीका था। तुर्कों ने हिन्दू अलंकरण के नमूने जैसे घंटियां, बेल, स्वास्तिक, कमल आदि का भी प्रयोग किया। तुर्क लाल पत्थर का प्रयोग करके अपनी इमारतों को रंगीन बनाते थे। लाल रंग को हल्का रखने के लिए इसमें पीला पत्थर और संगमरमर का प्रयोग भी किया जाता था। दूसरी ओर जौनपुर और दक्षिण मे स्थानीय कलाओं ने अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त कि...

दिल्ली सल्तनत में अभिजात वर्ग

दिल्ली सल्तनत में अभिजात वर्ग दिल्ली सल्तनत मे अभिजात वर्ग राज्य के सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी थे तथा समाज में उनको उच्च स्थान प्राप्त था। अभिजात वर्ग की श्रेंणी में सामंत, कुलीन, अमीर, मलिक आदि शामिल थे। प्रारंभ में ये सेना के कमांडर थे, जिन्होंने युद्ध में विजय हासिल की। अभिजात वर्ग की स्थिति और शक्तियों में समय-समय पर उतार-चढ़ाव होता रहा। वे अभिजात वर्ग जो दिल्ली में स्थापित थे, अत्यधिक शक्तिशाली समूह के रूप में उभरे तथा वे समय-समय पर सुल्तान का चयन करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। उच्चतम मान-मर्यादां वाला अभिजात वर्ग "खान" की उपाधि धारण करता था। इनके नीचे मलिक थे और तीसरे नंबर पर अमीर आते थे। यह अभिजात वर्ग सल्तनत के शासक वर्ग की जीवन शैली की नकल करता था। लगभग हर अभिजात वर्ग के पास बड़े महल, हरम, गुलाम और उनकी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए घरेलू कारखाने थे। उनके पास अपने घराने के रख-रखाव के लिए पर्याप्त धन था। अभिजात वर्ग का शासक वर्ग के साथ संबंध उनके निजी हितों पर निर्भर था। प्रत्येक अमीर शाही तख्त के पास पहुंचने की कोशिश करता था। बलबन और अलाउद्दीन खलजी ने कठो...