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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन

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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन पृष्ठभूमि :- प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था विद्यमान् थी। यह व्यवस्था वैश्य कहलाने वाले किसानों, व्यवसायियों तथा शूद्र कहलाने वाले मज़दूरों पर आधारित थी। राजा के अधिकारी वैश्य से कर वसूलते थे जिससे वह अधिकारियों का वेतन चुकाते तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे, और स्वयं के लिए भोग-विलास की वस्तुएँ ख़रीदते थे। तीसरी तथा चौथी सदी में यह व्यवस्था चरमराने लगी। निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे। अर्थात वह कर चुकाना और सेवा कार्य छोड़ने लगे, जिसने सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वह वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने लगे क्योंकि उत्पादक वर्ग कारों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था। इस स्थिति से निपटने के लिए राजाओं द्वारा एक कारगर क़दम उठाया गया। जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि अनुदान दिया जाने लगा। जिससे राजकीय भूमि से कर वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार भूमि अनुदान प्राप्तकर्ता के ऊपर चला गया। साथ ही उन्हें वहाँ के मूलनिवासियों को वर्ण व्यवस्था को ...

चार्टिस्ट आंदोलन

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चार्टिस्ट आंदोलन चार्टिस्ट आंदोलन का आरंभ 1832 में हुआ। यह आंदोलन मजदूरों तथा श्रमिकों द्वारा चलाया गया, जो राजनीतिक अधिकार प्राप्त करके अपनी सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान करना चाहते थे। महारानी विक्टोरिया के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में इस आंदोलन ने जोर पकड़ा तथा यह आंदोलन 1848 तक चलता रहा। इस आंदोलन के प्रमुख नेता विलियम लॉवेट, थामस एट्वुर्ड तथा फीयरगस ओ. कोनर थे। इस आंदोलन के प्रसिद्ध केंद्र लंदन, बर्मिंघम तथा लीड्स आदि नगर थे। विद्वान कालाईल ने कहा है कि “चार्टिस्ट का मामला बड़ा गंभीर और दूर-दूर तक फैलने वाला था। इसका आरंभ केवल कल ही नहीं हुआ और न ऐसे ही किसी ढंग से आज या कल समाप्त किया जा सकता है”। आंदोलन का कारण:- (सामाजिक तथा आर्थिक) औद्योगिक क्रांति के कारण इंग्लैंड के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में काफी परिवर्तन आया। औद्योगिक विकास तथा मशीनों के प्रयोग से देश के उत्पादन एवं विदेशी व्यापार का आश्चर्यजनक विकास हुआ था परंतु इससे देश में हजारों किसान, कारीगर तथा मजदूर बेकार हो गए थे। कारखानों में लगे मजदूरों की स्थिति भी चिंताजनक हो गई थी। उन्हें बहुत कम वेतन प्रा...

जहांगीरनामा

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जहांगीरनामा आत्मकथा लेखन के मामले में भारत में मुगल सत्ता की नींव रखने वाले बाबर का अनुसरण जहांगीर ने किया। इतिहास लेखन में उनका यह प्रेम अपने पिता अकबर के कारण था। वह प्रथम बादशाह था जिसने साम्राज्य का व्यवस्थित इतिहास लिखवाने का प्रयास किया। जहांगीर ने भी अपने पिता अकबर का अनुसरण किया, जिसका परिणाम तुजुक-ए-जहांगीरी है, जिसे जहांगीरनामा के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रंथ में जहांगीर के शासनकाल के 19 वर्षों का फारसी भाषा में वर्णन है। इसमें प्रारंभिक 16 वर्षों का वर्णन स्वयं जहांगीर की कलम से लिखा गया है जबकी शेष 3 वर्षों का ब्यौरा अर्थात 17 से 19 वर्ष तक का ब्योरा मुदामिद खां की कलम से लिखा गया है। जहांगीर ने अपने बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण मुदामिद खां को यह कार्य सौंपा। इसका अंग्रेजी में अनुवाद अलेक्जेंडर राजर्स ने किया था तथा उर्दू में अनुवाद मुंशी अहमद अली सीमाब ने किया था।  जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में क्रमबद्धता से वर्णन किया है। जो घटना जब घटती थी उसके तत्काल बाद ही वह इसे लिख लेता था, जिससे उसमें भूल के कारण से कोई गलती नहीं हो पाती थी। इसके अलावा इसके मध्य में किसी घ...