मध्यकालीन भारत में ग्राम समुदाय
मध्यकालीन भारत में ग्राम समुदाय मध्यकालीन भारत में गाँव ग्रामीण समाज और खेती की सबसे बुनियादी इकाई था। ज़्यादातर लोग गाँवों में रहते थे और रोज़ी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर थे। इरफ़ान हबीब के अनुसार गाँव केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि एक प्रशासनिक और आर्थिक इकाई भी था, जिसके ज़रिए मुग़ल राज्य भू-राजस्व (ज़मीन का कर) वसूलता था। गाँव का समाज बराबर नहीं था। उसमें ज़मींदार, मुक़द्दम जैसे अधिकारी, खुद-काश्त ( गाँव में बसे किसान), पाही-काश्त ( बाहर से आए किसान), बालूतेदार (कारीगर और सेवा देने वाले) और भूमिहीन मज़दूर थे। ज़मीन, साधन और सत्ता तक सबकी पहुँच बराबर नहीं थी। ग्राम समुदाय की अवधारणा और संरचना ग्राम समुदाय में किसान, अधिकारी, कारीगर और अन्य समूह शामिल थे, जो खेती पर टिकी व्यवस्था चलाते थे। मुग़ल काल में गाँव ही वह इकाई था जिससे राज्य राजस्व तय और वसूल करता था। खेती मुख्य पेशा: ज़्यादातर लोग किसान थे और पारंपरिक तरीकों, बैलों और साधारण औज़ारों से खेती करते थे। उपज का बड़ा हिस्सा राजस्व के रूप में राज्य ले लेता था, इसलिए ज़मीन का रिकॉर्ड सावधानी से रखा जाता था। गाँव के मुख्य अ...