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मध्यकालीन भारत में ग्राम समुदाय

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  मध्यकालीन भारत में ग्राम समुदाय मध्यकालीन भारत में गाँव ग्रामीण समाज और खेती की सबसे बुनियादी इकाई था। ज़्यादातर लोग गाँवों में रहते थे और रोज़ी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर थे। इरफ़ान हबीब के अनुसार गाँव केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि एक प्रशासनिक और आर्थिक इकाई भी था, जिसके ज़रिए मुग़ल राज्य भू-राजस्व (ज़मीन का कर) वसूलता था। गाँव का समाज बराबर नहीं था। उसमें ज़मींदार, मुक़द्दम जैसे अधिकारी, खुद-काश्त ( गाँव में बसे किसान), पाही-काश्त ( बाहर से आए किसान), बालूतेदार (कारीगर और सेवा देने वाले) और भूमिहीन मज़दूर थे। ज़मीन, साधन और सत्ता तक सबकी पहुँच बराबर नहीं थी। ग्राम समुदाय की अवधारणा और संरचना ग्राम समुदाय में किसान, अधिकारी, कारीगर और अन्य समूह शामिल थे, जो खेती पर टिकी व्यवस्था चलाते थे। मुग़ल काल में गाँव ही वह इकाई था जिससे राज्य राजस्व तय और वसूल करता था। खेती मुख्य पेशा: ज़्यादातर लोग किसान थे और पारंपरिक तरीकों, बैलों और साधारण औज़ारों से खेती करते थे। उपज का बड़ा हिस्सा राजस्व के रूप में राज्य ले लेता था, इसलिए ज़मीन का रिकॉर्ड सावधानी से रखा जाता था। गाँव के मुख्य अ...

मंगल काव्य / मुग़ल और मराठा

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                                         मंगल काव्य / मुग़ल और मराठा मंगल काव्य मध्यकालीन बंगाल की एक प्रमुख काव्य-परंपरा है। इसमें किसी लोकदेवता की महिमा का गान किया जाता है, ताकि देवता प्रसन्न होकर भक्त का "मंगल" (कल्याण) करें। मध्यकालीन बंगाल के साहित्य, समाज और संस्कृति के इतिहास में मंगल काव्य का महत्वपूर्ण स्थान है। ये कविताएँ 15वीं से 18वीं सदी के बीच आम बंगला भाषा में लिखी गई। इनमें चंडी, मनसा और धर्म ठाकुर जैसे स्थानीय देवी-देवताओं की महिमा गाई गई है। इन कविताओं का संबंध उस समय के असली जीवन से था, जिसमें उस समय के लोगों की चिंताएँ, उम्मीदें और अनुभव दिखाई देते हैं। मंगल काव्य से हमें मध्यकालीन बंगाल की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, धार्मिक जीवन और सोच के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। फ़ारसी इतिहास-ग्रंथ ज़्यादातर बादशाहों, युद्धों और दरबार की राजनीति के बारे में थे। इसके उलट, मंगल काव्य आम लोगों के अनुभव बताते हैं और बंगाल की असली हालत को बहुत करीब से दिखाते हैं। क...

मुगल काल में संस्कृत

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  मुगल काल में संस्कृत मुग़ल साम्राज्य के इतिहास को आमतौर पर फ़ारसी ग्रंथों जैसे अकबरनामा, आइन-ए-अकबरी और पादशाहनामा के ज़रिए पढ़ा जाता है। चूँकि फ़ारसी प्रशासन की सरकारी भाषा थी, इसलिए लंबे समय तक इतिहासकार यह मानते रहे कि मुग़ल राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन को केवल फ़ारसी स्रोतों से ही समझा जा सकता है। लेकिन आधुनिक इतिहासकारों ने इस सीमित नज़रिए को चुनौती दी है और मुग़ल भारत के इतिहास को समझने में संस्कृत तथा स्थानीय भाषाओं के ग्रंथों के महत्व को उजागर किया है। ऑड्रे ट्रश्के, कुमकुम चटर्जी, डेविड शुलमन, क्रिस्टोफ़र मिन्कोव्स्की और संजय सुब्रह्मण्यम जैसे विद्वानों का तर्क है कि संस्कृत स्रोत मुग़ल इतिहास के उन पहलुओं को सामने लाते हैं जिन्हें फ़ारसी दरबारी इतिहास अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ये ग्रंथ क्षेत्रीय राजनीति, धार्मिक समझौतों, बौद्धिक आदान-प्रदान, सामाजिक जीवन और मुग़ल शासकों तथा भारतीय परंपराओं के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की जानकारी देते हैं। संस्कृत और मुग़ल दरबार संस्कृत विद्वानों को संरक्षण देकर और बड़े पैमाने पर अनुवाद करके, मुग़ल शासक राजनीतिक वैधता हासिल करना...