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जापान पर अमेरिकी अधिकार (1945–1952)

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  जापान पर अमेरिकी अधिकार (1945–1952) दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान एशिया के अन्य देशों पर कब्ज़ा करके अपनी ताकत बढ़ाना चाहता था। जापान ने 1931 में मंचूरिया पर हमला किया और 1937 में चीन पर आक्रमण करके दूसरा चीन-जापान युद्ध शुरू किया। जापान, जर्मनी और इटली के साथ मिलकर 'धुरी शक्तियों' (एक्सिस पावर्स) का हिस्सा बना। 7 दिसंबर 1941 को जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर नौसैनिक अड्डे पर हमला किया, जिसके बाद अमेरिका भी युद्ध में शामिल हो गया। अगस्त 1945 में अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराए, जिसमें बहुत लोग मारे गए और भारी तबाही हुई। इसके तुरंत बाद, 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और जापान के लिए दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया। यह सिर्फ एक सैन्य हार नहीं थी, बल्कि मेइजी काल से चले आ रहे शाहीतंत्र के अंत की शुरुआत भी थी। युद्ध के बाद अमेरिकी सेना ने जापान पर कब्ज़ा किया और बड़े बदलाव शुरू किए। इस दौरान जापान की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज में जबरदस्त बदलाव आया। अमेरिका के जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व ने पूरे देश को बदल दिया। डगलस का मकसद था -स...

जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" || Great Divergence

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  औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" ||  Great Divergence "ग्रेट डाइवर्जेस" यानी "महान विभाजन" की बहस ने औद्योगिक क्रांति को समझने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। यह बहस मूल रूप से इस सवाल पर है: आधुनिक आर्थिक तरक्की यूरोप में ही क्यों शुरू हुई, चीन जैसे देशों में क्यों नहीं, जबकि पहले चीन भी आर्थिक रूप से यूरोप जितना ही आगे था, बल्कि कहीं-कहीं उससे भी बेहतर था। अरविंद सिन्हा अपने लेख "यूरोप इन ट्रांज़िशन" में बताते हैं कि इस बहस ने तीन बड़े काम किए हैं- पहला, यूरोप को हमेशा सही और आगे मानने वाली पुरानी सोच को चुनौती दी; दूसरा, यह दिखाया कि यूरोप का विकास पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अकेले नहीं हुआ; और तीसरा, यह साबित किया कि यूरोप का आगे निकलना कोई तय बात नहीं थी, बल्कि हालात और मौकों का नतीजा था। इस लेख में हम देखेंगे कि अलग-अलग विद्वानों की राय से यह समझ कैसे और गहरी हुई। पुरानी सोच और उसकी कमियाँ यह समझने से पहले कि नई बहस ने क्या बदला, पहले यह जानना ज़रूरी है कि पुरानी सोच क्या कहती थी। पहले के इतिहासकार मानते थे कि औद्योगिक क्रांति सिर्...