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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" || Great Divergence

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  औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" ||  Great Divergence "ग्रेट डाइवर्जेस" यानी "महान विभाजन" की बहस ने औद्योगिक क्रांति को समझने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। यह बहस मूल रूप से इस सवाल पर है: आधुनिक आर्थिक तरक्की यूरोप में ही क्यों शुरू हुई, चीन जैसे देशों में क्यों नहीं, जबकि पहले चीन भी आर्थिक रूप से यूरोप जितना ही आगे था, बल्कि कहीं-कहीं उससे भी बेहतर था। अरविंद सिन्हा अपने लेख "यूरोप इन ट्रांज़िशन" में बताते हैं कि इस बहस ने तीन बड़े काम किए हैं- पहला, यूरोप को हमेशा सही और आगे मानने वाली पुरानी सोच को चुनौती दी; दूसरा, यह दिखाया कि यूरोप का विकास पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अकेले नहीं हुआ; और तीसरा, यह साबित किया कि यूरोप का आगे निकलना कोई तय बात नहीं थी, बल्कि हालात और मौकों का नतीजा था। इस लेख में हम देखेंगे कि अलग-अलग विद्वानों की राय से यह समझ कैसे और गहरी हुई। पुरानी सोच और उसकी कमियाँ यह समझने से पहले कि नई बहस ने क्या बदला, पहले यह जानना ज़रूरी है कि पुरानी सोच क्या कहती थी। पहले के इतिहासकार मानते थे कि औद्योगिक क्रांति सिर्...

प्रबोधन या प्रबुद्धवाद (Enlightenment)

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  प्रबोधन (Enlightenment) प्रबोधन या प्रबुद्धवाद (Enlightenment) 17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोप में विकसित हुआ एक महत्वपूर्ण बौद्धिक और वैचारिक आंदोलन था। इसका मुख्य आधार तर्क, विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता था। प्रबोधन के विचारकों का मानना था कि मनुष्य अपनी बुद्धि और तर्क के माध्यम से समाज, राजनीति, धर्म और प्रकृति से जुड़े प्रश्नों को समझ सकता है। विद्वान पीटर गे (Peter Gay) के अनुसार प्रबोधन एक बौद्धिक आंदोलन था जिसमें तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व दिया गया। प्रबोधन ने परंपरागत मान्यताओं, निरंकुश राजतंत्र, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास पर प्रश्न उठाए। इसके प्रमुख विचारकों में रेने देकार्ते, जॉन लॉक, डिडरो, आइजक न्यूटन, मांटेस्क्यू, वॉल्तेयर, जां-जाक रूसो, एडम स्मिथ, सीजर बिकारिया आदि शामिल थे। प्रबोधन का मूल विचार वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मानव मस्तिष्क को अंधविश्वासों से मुक्त होना चाहिए  प्राकृतिक शक्तियाँ समस्त ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। प्राकृतिक घटनाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाना चाहिए। व...