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औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" || Great Divergence

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  औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" ||  Great Divergence "ग्रेट डाइवर्जेस" यानी "महान विभाजन" की बहस ने औद्योगिक क्रांति को समझने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। यह बहस मूल रूप से इस सवाल पर है: आधुनिक आर्थिक तरक्की यूरोप में ही क्यों शुरू हुई, चीन जैसे देशों में क्यों नहीं, जबकि पहले चीन भी आर्थिक रूप से यूरोप जितना ही आगे था, बल्कि कहीं-कहीं उससे भी बेहतर था। अरविंद सिन्हा अपने लेख "यूरोप इन ट्रांज़िशन" में बताते हैं कि इस बहस ने तीन बड़े काम किए हैं- पहला, यूरोप को हमेशा सही और आगे मानने वाली पुरानी सोच को चुनौती दी; दूसरा, यह दिखाया कि यूरोप का विकास पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अकेले नहीं हुआ; और तीसरा, यह साबित किया कि यूरोप का आगे निकलना कोई तय बात नहीं थी, बल्कि हालात और मौकों का नतीजा था। इस लेख में हम देखेंगे कि अलग-अलग विद्वानों की राय से यह समझ कैसे और गहरी हुई। पुरानी सोच और उसकी कमियाँ यह समझने से पहले कि नई बहस ने क्या बदला, पहले यह जानना ज़रूरी है कि पुरानी सोच क्या कहती थी। पहले के इतिहासकार मानते थे कि औद्योगिक क्रांति सिर्...

प्रबोधन या प्रबुद्धवाद (Enlightenment)

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  प्रबोधन (Enlightenment) प्रबोधन या प्रबुद्धवाद (Enlightenment) 17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोप में विकसित हुआ एक महत्वपूर्ण बौद्धिक और वैचारिक आंदोलन था। इसका मुख्य आधार तर्क, विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता था। प्रबोधन के विचारकों का मानना था कि मनुष्य अपनी बुद्धि और तर्क के माध्यम से समाज, राजनीति, धर्म और प्रकृति से जुड़े प्रश्नों को समझ सकता है। विद्वान पीटर गे (Peter Gay) के अनुसार प्रबोधन एक बौद्धिक आंदोलन था जिसमें तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व दिया गया। प्रबोधन ने परंपरागत मान्यताओं, निरंकुश राजतंत्र, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास पर प्रश्न उठाए। इसके प्रमुख विचारकों में रेने देकार्ते, जॉन लॉक, डिडरो, आइजक न्यूटन, मांटेस्क्यू, वॉल्तेयर, जां-जाक रूसो, एडम स्मिथ, सीजर बिकारिया आदि शामिल थे। प्रबोधन का मूल विचार वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मानव मस्तिष्क को अंधविश्वासों से मुक्त होना चाहिए  प्राकृतिक शक्तियाँ समस्त ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। प्राकृतिक घटनाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाना चाहिए। व...

वारकरी आंदोलन

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  वारकरी आंदोलन  वारकरी आंदोलन की शुरुआत 13 शताब्दी में महाराष्ट्र में हुई। पंडुलिक को इसका प्रथम संत माना जाता है। पंढरपुर वारकरी आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। अधिकांश वारकरी संत विठोबा की पूजा करते थे जिन्हे विष्णु का अवतार माना जाता है। वारकारी संतो की संख्या 50 से अधिक थी। इसके प्रमुख संतो में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, और रामदास शामिल है।   दार्शनिक शिक्षाएं  वारकरी संतो के अनुसार भगवान् तक पहुँचने का रास्ता प्रेम और मानवता की सेवा से होकर जाता है और यह रास्ता सभी के लिए खुला है। साथ ही उनका मानना था की इसपर केवल पंडितों और ब्राह्मणों का ही विशेष अधिकार नहीं है। इनके अनुसार पुरोहित वर्ग भगवान पर अधिकार होने का दावा करते है। वह नहीं जानते की दिव्य को वश में नहीं किया जा सकता, बल्कि सेवा के माध्यम से ही उसका अनुसरण किया जा सकता है। वारकरी सम्रदाय का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं को दैनिक जीवन में अधिक सुलभ बनाना था।  विद्वान सुविरा जायसवाल के अनुसार भगवान को केवल एक समुदाय की संपत्ति के रक्षक और मालिक के रूप में देखने से लेकर भगवान को एक सार्वभौमिक ...

कुतुब परिसर के बहुआयामी अर्थ

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  कुतुब परिसर के बहुआयामी अर्थ   दिल्ली के महरौली में स्थित कुतुब परिसर केवल मध्यकालीन स्मारकों या पत्थरों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह दिल्ली सल्तनत के उतार-चढ़ाव, उसकी राजनीतिक तथा धार्मिक महत्वाकांक्षाओं का एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इस परिसर में स्थित मस्जिद, मीनार, मकबरे और प्रवेश द्वार समय के साथ बदलते रहे और प्रत्येक सुल्तान ने इसके माध्यम से समाज, प्रजा और अपने शत्रुओं को अलग-अलग संदेश देने का प्रयास किया। आधुनिक इतिहासकारों जैसे आर. नाथ, पर्सी ब्राउन, सुनील कुमार, एंथनी वेल्च, और मोहम्मद मुजीब के अनुसार, कुतुब परिसर के साथ कई राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ जुड़े हुए है। सैन्य विजय और राजनीतिक प्रभुत्व क़ुतुब मीनार :- 'टावर ऑफ विक्ट्री' के रूप में मीनार कुतुब-उद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में शुरू की गई मीनार को एक 'विजय स्तंभ' के रूप में देखा गया। विद्वान पर्सी ब्राउन के अनुसार, यह मीनार सुदूर क्षेत्रों से भी दिखाई देती थी और यह स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा करती थी कि राजपूत शासकों को पराजित कर दिल्ली पर अब मुसलमानों का राजनीतिक नियंत्रण स्...