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वारकरी आंदोलन

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  वारकरी आंदोलन  वारकरी आंदोलन की शुरुआत 13 शताब्दी में महाराष्ट्र में हुई। पंडुलिक को इसका प्रथम संत माना जाता है। पंढरपुर वारकरी आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। अधिकांश वारकरी संत विठोबा की पूजा करते थे जिन्हे विष्णु का अवतार माना जाता है। वारकारी संतो की संख्या 50 से अधिक थी। इसके प्रमुख संतो में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, और रामदास शामिल है।   दार्शनिक शिक्षाएं  वारकरी संतो के अनुसार भगवान् तक पहुँचने का रास्ता प्रेम और मानवता की सेवा से होकर जाता है और यह रास्ता सभी के लिए खुला है। साथ ही उनका मानना था की इसपर केवल पंडितों और ब्राह्मणों का ही विशेष अधिकार नहीं है। इनके अनुसार पुरोहित वर्ग भगवान पर अधिकार होने का दावा करते है। वह नहीं जानते की दिव्य को वश में नहीं किया जा सकता, बल्कि सेवा के माध्यम से ही उसका अनुसरण किया जा सकता है। वारकरी सम्रदाय का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं को दैनिक जीवन में अधिक सुलभ बनाना था।  विद्वान सुविरा जायसवाल के अनुसार भगवान को केवल एक समुदाय की संपत्ति के रक्षक और मालिक के रूप में देखने से लेकर भगवान को एक सार्वभौमिक ...

कुतुब परिसर के बहुआयामी अर्थ

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  कुतुब परिसर के बहुआयामी अर्थ   दिल्ली के महरौली में स्थित कुतुब परिसर केवल मध्यकालीन स्मारकों या पत्थरों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह दिल्ली सल्तनत के उतार-चढ़ाव, उसकी राजनीतिक तथा धार्मिक महत्वाकांक्षाओं का एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इस परिसर में स्थित मस्जिद, मीनार, मकबरे और प्रवेश द्वार समय के साथ बदलते रहे और प्रत्येक सुल्तान ने इसके माध्यम से समाज, प्रजा और अपने शत्रुओं को अलग-अलग संदेश देने का प्रयास किया। आधुनिक इतिहासकारों जैसे आर. नाथ, पर्सी ब्राउन, सुनील कुमार, एंथनी वेल्च, और मोहम्मद मुजीब के अनुसार, कुतुब परिसर के साथ कई राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ जुड़े हुए है। सैन्य विजय और राजनीतिक प्रभुत्व क़ुतुब मीनार :- 'टावर ऑफ विक्ट्री' के रूप में मीनार कुतुब-उद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में शुरू की गई मीनार को एक 'विजय स्तंभ' के रूप में देखा गया। विद्वान पर्सी ब्राउन के अनुसार, यह मीनार सुदूर क्षेत्रों से भी दिखाई देती थी और यह स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा करती थी कि राजपूत शासकों को पराजित कर दिल्ली पर अब मुसलमानों का राजनीतिक नियंत्रण स्...

काकतीय अभिलेख

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  काकतीय अभिलेख  काकतीय वंश ने 12वीं से 14वीं शताब्दी तक पूर्वी दक्कन क्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया। इस साम्राज्य की जानकारी का प्रमुख स्रोत लिखित अभिलेख (Inscriptions) है। यह अभिलेख, पत्थर, तांबे की प्लेटों और मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए है जो काकतीयों साम्राज्य की वंशावली, राजनीतिक गतिविधियों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म और सांस्कृतिक योगदान के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। काकतीय अभिलेख मुख्य रूप से तेलुगु और संस्कृत में लिखे गए। उल्लेखनीय अभिलेखों में बय्यारम टैंक शिलालेख, मोटुपल्ली शिलालेख, मंगल्लु शिलालेख और हनुमकोंडा शिलालेख शामिल हैं। विद्वान पी.वी. परब्रह्म शास्त्री के अनुसार काकतीय अभिलेख तेलुगु भाषा और साहित्य के विकास का "स्वर्णयुग" दिखाते हैं।  वंशावली की जानकारी शिलालेख काकतीय शासकों की वंशावली और कालक्रम को उजागर करते है। गणपति देवा (1199–1262) के शासनकाल में जारी बय्यारम टैंक शिलालेख , एक विस्तृत वंशावली सूची प्रदान करता है। यह शिलालेख वेन्ना, बीटा I, प्रोल I, और रुद्रदेवा जैसे पूर...