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अशोक का धम्म / शिलालेख

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अशोक का धम्म / शिलालेख   सम्राट अशोक मौर्य साम्राज्य के महानतम सम्राट थे जिन्होंने अपने जीवन में बौद्ध धर्म के उपदेशों का पालन किया। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक एक महान सम्राट और बौद्ध उपासक था। अशोक ने महात्मा बुद्ध से जुड़े सभी स्थानों का भ्रमण किया और उन स्थानों पर स्मारर्को का निर्माण करवाया। अभिलेखों में अशोक को देवानंप्रिय (देवताओं का जो प्रिय है) के नाम से संबोधित किया गया है। अशोक का धम्म एक विचारधारा थी जिसका उद्देश्य समाज में नैतिकता, सहिष्णुता, और शांति को बढ़ावा देना था। अशोक का धम्म किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक सार्वभौमिक संहिता थी जिसका उद्देश्य समाज में शांति, सद्भाव, और नैतिकता को बढ़ावा देना था। अशोक ने अपने शिलालेखों में धम्म के इन सिद्धांतों को प्रचारित किया और लोगों को इनका पालन करने के लिए प्रेरित किया। अशोक के अभिलेखों को पाँच समूहों में बाँटा गया है। जिसमें 14 शिलालेख, 6 स्तंभ अभिलेख, लघु शिलालेख, लघु स्तम्भलेख तथा गुफा अभिलेख शामिल है। स्तंभलेख 2 तथा 7 में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है: धम्म है साधुता, कल्...

बौद्ध धर्म की शिक्षाएं

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बौद्ध धर्म की शिक्षाएं  बौद्ध दर्शन का विकास गौतम बुद्ध के उपदेशों से हुआ, जिनका मूल नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म 566 ई.पू. नेपाल के कपिलवस्तु में स्थित शाक्य राजघराने में हुआ। 29 वर्ष की आयु में ही, बुद्ध ने अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर संन्यास ले लिया। वह सत्य की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहे और इस दौरान उन्होंने अनेक गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। अंततः 35 वर्ष की आयु में बोधगया में एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और उसके बाद वह बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में अपने पहले पांच शिष्यों को दिया। बौद्ध धर्म में इस घटना को 'धर्मचक्रप्रवर्तन' के नाम से जाना जाता है। उनका देहावसान 80 वर्ष की अवस्था में संभवतः 486 ई.पू. में हुआ। बुद्ध की शिक्षा का उद्देश्य निर्वाण की प्राप्ति थी। निर्वाण एक अनुभूति है जिसे इसी जीवन में हासिल किया जा सकता है। निर्वाण का अभिप्राय तृष्णा, माया और अहंकार के नष्ट हो जाने से है। बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया अति सुख और अति दुख दोनों से परे...

मार्टिन लूथर किंग JR.

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मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

मार्कस गार्वे / UNIA / नागरिक अधिकार आंदोलन

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मार्कस गार्वे / UNIA / नागरिक अधिकार आंदोलन मार्कस गार्वे का जन्म 17 अगस्त, 1887 को जमैका के सेंट एनबे में हुआ था। 14 साल की उम्र में वे किंग्स्टन चले गए, जहाँ उन्होंने एक प्रिंटर चालक के रूप में काम किया और मजदूरों की दयनीय जीवन स्थिति से परिचित हुए। जल्द ही उन्होंने खुद को समाज सुधारको में शामिल कर लिया। गार्वे ने 1907 में जमैका में प्रिंटर्स यूनियन हड़ताल में भाग लिया और 'द वॉचमैन' नामक अखबार स्थापित करने में मदद की। जब वे अपनी परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए द्वीप छोड़कर गए, तो उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका का दौरा किया और पाया की बड़े पैमाने पर अश्वेत लोग भेदभाव के शिकार थे। गार्वे ने पनामा नहर क्षेत्र का दौरा किया और उन परिस्थितियों को देखा जिसके तहत वेस्ट इंडियन लोग रहते और काम करते थे। वे इक्वाडोर, निकारागुआ, होंडुरास, कोलंबिया और वेनेजुएला भी गए और देखा की हर जगह अश्वेतों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। मध्य अमेरिका की इस स्थिति से दुखी होकर गार्वे वापस जमैका लौट आए और जमैका की औपनिवेशिक सरकार से मध्य अमेरिका में वेस्ट इंडियन श्रमिकों की ...

बुकर टी. वाशिंगटन और नागरिक अधिकार आंदोलन

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बुकर टी. वाशिंगटन और नागरिक अधिकार आंदोलन अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन (1955-1968) का उद्देश्य अफ्रीकी अमेरिकी लोगों के खिलाफ नस्लिय भेदभाव को गैर कानूनी घोषित करना और दक्षिण अमेरिका में मतदान अधिकार को पुन: स्थापित करना था। गृहयुद्ध के बाद अश्वेतों को गुलामी से मुक्त कर दिया गया था लेकिन उसके बावजूद भी उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। पुनर्निर्माण और द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच अश्वेतों की स्थिति ओर खराब हो गई। इस दौरान बुकर टी. वाशिंगटन इनके लिए एक प्रभावशाली नेता बनकर उभरे। वाशिंगटन ने अफ्रीकी-अमेरिकियों के लिए व्यावसायिक शिक्षा और औद्योगिक शिक्षा को बढ़ावा दिया ताकि वह आर्थिक रूप से संपन्न और कुशल बन सके। पृषठभूमि दक्षिण अमेरिका में अश्वेतों ने संघर्ष कर अपने आपको दासता मुक्त कराया। अश्वेतों ने अपनी संस्थाएं बनाई जिससे अश्वेत राष्ट्रवाद का उदय हुआ। नेशनल नीग्रो कन्वेंशन जैसे कई नीग्रो संगठन बने। गृहयुद्ध के दौरान अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं के बीच कट्टरपंथी विचारों का विकास हुआ। बिशप एम. टर्नर, मार्टिन आर. डेलानी और अलेक्ज़ेंडर क्रूमेल ने अश्वेतों के लिए एक स्वायत्त राज्य की...