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काकतीय अभिलेख

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  काकतीय अभिलेख  काकतीय वंश ने 12वीं से 14वीं शताब्दी तक पूर्वी दक्कन क्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया। इस साम्राज्य की जानकारी का प्रमुख स्रोत लिखित अभिलेख (Inscriptions) है। यह अभिलेख, पत्थर, तांबे की प्लेटों और मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए है जो काकतीयों साम्राज्य की वंशावली, राजनीतिक गतिविधियों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म और सांस्कृतिक योगदान के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। काकतीय अभिलेख मुख्य रूप से तेलुगु और संस्कृत में लिखे गए। उल्लेखनीय अभिलेखों में बय्यारम टैंक शिलालेख, मोटुपल्ली शिलालेख, मंगल्लु शिलालेख और हनुमकोंडा शिलालेख शामिल हैं। विद्वान पी.वी. परब्रह्म शास्त्री के अनुसार काकतीय अभिलेख तेलुगु भाषा और साहित्य के विकास का "स्वर्णयुग" दिखाते हैं।  वंशावली की जानकारी शिलालेख काकतीय शासकों की वंशावली और कालक्रम को उजागर करते है। गणपति देवा (1199–1262) के शासनकाल में जारी बय्यारम टैंक शिलालेख , एक विस्तृत वंशावली सूची प्रदान करता है। यह शिलालेख वेन्ना, बीटा I, प्रोल I, और रुद्रदेवा जैसे पूर...

असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधी जी की भूमिका

प्रश्न:- असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक लोकप्रिय नेता के रूप में गांधी की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। परिचय:- आधुनिक भारत के निर्माण में जो स्थान मोहनदास करमचंद गांधी (1869-1948) को प्राप्त है, वह किसी अन्य भारतीय नेता को नहीं है। दक्षिण अफ्रीका से गांधीजी 1915 में लौटे और भारतीय राजनीति में उनका प्रवेश 1919 में रौलट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन से हुआ। इसके बाद भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र बिल्कुल बदल गया। अपनी संगठनात्मक क्षमता, भाषणों एवं अपनी बुद्धिमता के बलपर गांधी शीघ्र ही व्यापक जन समूह के नेता के रूप में उभरे। गांधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व अभिजात वर्गों के पास था। इसमें पश्चिमी अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों के सीमित वर्ग का प्रभाव था। यही कारण है कि गांधी युग से पूर्व के राष्ट्रीय आंदोलन को "ज्यूडिथ ब्राउन" ने, "सुविचारिथ सीमा बंदियों की राजनीति" कहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दायरा संकुचित था और प्रभाव सीमित इसलिए यह आम जनता तक अपनी पहुंच नहीं बना सकी। गांधी जी के नेतृत्व के फलस्वरुप भ...

भारत में अंग्रेजों का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण

प्रश्न:- भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण के लिए अंग्रेजों ने किन तरीकों को अपनाया। परिचय:- भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा डाली गई। 1608 में कैप्टन हॉकिंग्स के नेतृत्व में कंपनी ने मुगल सम्राट जहांगीर से राजकीय फरमान प्राप्त कर सूरत में पहली फैक्ट्री बनाई। 1615 में कंपनी के राजदूत टॉमसरो के माध्यम से कंपनी को एक राजकीय फरमान के द्वारा भारत के सभी क्षेत्रों में व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया। यही वह शुरुआत थी जिसने कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों को संपूर्ण भारत में फैलाया और उसके राजनीतिक प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। 1757 के प्लासी युद्ध के बाद बंगाल पर कंपनी का नियंत्रण स्थापित हो गया। 1764 की बक्सर युद्ध के बाद कंपनी का बंगाल, बिहार, उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्राप्त हो गए। इन क्षेत्रों के नियंत्रण व संचालन की प्रशासनिक नीतियों की आवश्यकता हुई। अत: कंपनी शासन ने एक सुव्यवस्थित पुलिस, सेना व प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण किया। कंपनी के अधीन न्याय व प्रशासन के विभिन्न विभागों का विकास हुआ। लगान की नई नीतियां बनाई गई। लोक सेवा:- बक्सर युद्ध क...

भारत में साम्प्रदायिकता का उदय और विकास

प्रश्न:- भारत में सांप्रदायिकता के उदय और इससे संबंधित मुद्दों का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- सांप्रदायिकता का केंद्र बिंदु समुदाय होता है, इसमें व्यक्तिगत हितों की बजाए सामुदायिक हितों पर बल दिया जाता है। सांप्रदायिकता एक समुदाय के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक हितों कों, दूसरे समुदाय के हितों से प्रमुख मानती है, जिसमें समुदायों के बीच विवादों का उदय होता है। "डब्लू.सी. स्मिथ" का मानना है कि सांप्रदायिकता एक ऐसी विचारधारा है जो हर धर्म के समूह के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इकाई पर बल देती है तथा इन समूहों के आपसी प्रतिरोध को उजागर करती है। इतिहासकार "विपिन चंद्र" के अनुसार सांप्रदायिकता के मुख्य तीन चरण होते हैं। पहला, एक ही धर्म को मानने वाले लोगों के सांसारिक हित एक समान होते हैं। यह सांप्रदायिकता के उदय का पहला आधार है। दूसरा, भारत जैसे बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी धर्म के अनुयायियों से अलग होते हैं। यह उदार सांप्रदायिकता का चरण कहलाता है। तीसरा, जब यह मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायियों और समुदायों के हित ...

भारत के विभाजन के राजनीतिक घटनाक्रम

प्रश्न:- 1940 के दशक के राजनीतिक घटनाओं का वर्णन कीजिए जिसने भारत के विभाजन को अनिवार्य बना दिया। परिचय:- भारतीय लोगों को अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त करने में हिंदू-मुस्लिम विभाजन में बाधा उत्पन्न की। सांप्रदायिकता के आधार पर होने वाले दंगों ने भारत के विभाजन को स्पष्ट कर दिया। 1940 के लाहौर प्रस्ताव ने भारत के मुसलमानों को एक "राष्ट्र" बना दिया और जिन्ना को उनका नेतृत्व प्रदान किया गया। केंद्र में हिंदुओं की बराबरी करने के लिए जिन्ना ने मुस्लिम लीग में मुसलमानों के हित के लिए अपनी मांगे शामिल की। लीग की इन मांगों को स्वीकार नहीं किया गया। भारत के विभाजन में अंग्रेजों की नीतियां भी जिम्मेदार थी। कांग्रेस ने जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो अंग्रेजों ने अपने आपको भारत में जमाए रखने के लिए जिन्ना और मुस्लिम लीग का समर्थन प्राप्त किया। "चर्चिल" ने खुले तौर पर हिंदू-मुस्लिम टकराव को भारत में अंग्रेजी राज के लिए आवश्यक माना। इसके अलावा किसी एक समुदाय विशेष के हित के लिए स्थापित किए गए संगठनों ने भी विभाजन को अनिवार्य बना दिया।  सबसे पहले "पाकिस्तान" का विचार मो...

भारत में वामपंथ का उदय और विकास

प्रश्न:- भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान वामपंथी आंदोलन का वर्णन कीजिए। परिचय:- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में वामपंथी राजनीति का उदय प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुआ। इस समय से 1947 तक का काल वामपंथी और राजनीति आंदोलन दोनों के ही विकास में एक बहुत महत्वपूर्ण समय था। वामपंथियों ने श्रमजीवीयों एवं किसानों की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं को उभारने पर बल दिया और इस प्रकार राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरूप में परिवर्तन का प्रयत्न किया। वामपंथी आंदोलन के उदय और विकास की प्रक्रिया निर्बाध नहीं थी क्योंकि इसे प्रारंभ से ही ब्रिटिश सरकार के रोष का सामना करना पड़ा। अत: अक्सर इसे गुप्त रूप से कार्य करना पड़ता था। वामपंथियों ने पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध आम लोगों को जागरूक किया। परिणाम स्वरूप गांधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में कृषक और श्रमिक दोनों ही सम्मिलित हो गए। इस नए नेतृत्व में समाजवाद का प्रसार करना आसान हो गया। यह लोग कार्ल मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित थे और उन्होंने स्वयं देखा कि रूस में किस प्रकार साम्यवादी सरकार अस्तित्व में आई। भारत में मुंबई, कोलकाता, कानपुर, लाहौर ...

रूस की प्रबुद्धवादी निरंकुश शासक "कैथरीन"

प्रश्न:- यूरोप में प्रबुद्ध निरंकुश शासक की व्याख्या रूस की कैथरीन महान की नीतियों के संदर्भ में कीजिए। परिचय:- प्रबुद्धवादी विचारक डेनिस दीदरो के अनुसार प्रबुद्ध निरंकुश शासक प्रबुद्धवाद के विचारों के आधार पर प्रशासनिक ढांचे में सुधार करने और नीतियां बनाने के लिए इन नए विचारों को लागू करते थे, वे प्रबुद्ध निरंकुश शासक थे। यह शासक देश के भीतर अराजकता को नियंत्रित करने और विदेशी खतरों से सुरक्षा मुहैया कराने के लिए अपनी सरकारों को मजबूत करना चाहते थे। यह शासक कुलीन वर्ग की दखलअंदाजी को रोकना और नियंत्रित करना चाहते थे। साथ ही वह कभी नहीं चाहते थे कि लोकतंत्र को बढ़ावा दिया जाए या सरकार में लोगों की भागीदारी हो। इस तरह की नीति का अनुसरण रूस की रानी कैथरीन ने किया। वाल्तेर के अनुसार प्रबुद्ध शासक की उपाधि की सर्वश्रेष्ठ दावेदार रूस की कैथरीन द्वितीय थी। वह रूस साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली और सक्षम शासक साबित हुई। उनमें समझदारी, व्यवहारिकता, कल्पना और महत्त्वकांक्षा जैसे गुण मौजूद थे। 1745 में कैथरीन ने रूस के पीटर तृतीय के साथ शादी की। विवाह के बाद उन्हें पता चला कि उनका पति उसके विरुद्ध ह...

यूरोप में वाणिज्यवाद का विकास, इंग्लैंड और फ्रांस

प्रश्न:- यूरोप में वाणिज्यवाद के विकास का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- 15वीं सदी के अंत में नए व्यापारिक मार्गों और साम्राज्यों की खोज से व्यापार की मात्रा बढ़ने लगी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय नौपरिवहन का विस्तार हुआ। नई दुनिया से बड़ी मात्रा में सोने और चांदी के आयात से यूरोपीय राज्यों और यहां के लोगों की किस्मत बदलने लगी। इसका राज्य की नीतियों पर प्रभाव पड़ा। राज्य की आर्थिक ताकत बढ़ाने और नीतियों के मिश्रण को वाणिज्यवाद कहा गया। इसमें व्यावसायिक संबंध पर आधारित संस्थाओं और व्यापार संघ को महत्व दिया जाने लगा। वाणिज्यवाद में राज्य की अर्थव्यवस्था को सरकार द्वारा प्रोत्साहन और संरक्षण दिया जाने लगा। राज्य की शक्ति उसके धन पर निर्भर करती है जिसे सोने और चांदी जैसे बहुमूल्य धातु में व्यक्त किया जा सकता है। बहुमूल्य धातु जैसे सोना- चांदी यूरोपीय वाणिज्यवाद का सबसे महत्वपूर्ण श्रोत था। नए प्रदेशों की खोज से सोने- चांदी का महत्व काफी बढ़ गया था। वाणिज्यवाद में खान, विनिर्माण और उद्योग पर सभी राज्यों में जोर दिया जाने लगा। जरूरत की सभी वस्तुओं का उत्पादन किया जाने लगा और निर्यात के लिए इन...

अमेरिका की क्रांति का विस्तार से वर्णन

प्रश्न:- अमेरिका की क्रांति का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- अमेरिकी क्रांति उपनिवेशों तथा ग्रेट ब्रिटेन में नई विचारधाराओं के विकास के कारण हुई थी। ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका में अपने कुछ उपनिवेश स्थापित कर लिए थे। अमेरिका ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत अधीनता की स्थिति स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी ओर 1763 के बाद से ब्रिटिश सरकारों ने ऐसी नीतियां अपनाई जिनका लक्ष्य उपनिवेशों पर पहले की अपेक्षा अधिक कड़ा नियंत्रण स्थापित करना था। 18 वीं सदी के मध्यकाल में उपनिवेशों ने जो उन्नति की थी उसने अमेरिका के मन में आत्मविश्वास की भावना पैदा की। अनेक अमेरिकी यह समझने लगे कि वह अपनी जीवन शैली का विकास कर सकते हैं और अपनी नियति का स्वयं संचालन कर सकते हैं। शुरुआत में अमेरिका ब्रिटेन के साथ राजनीतिक संबंध समाप्त करना नहीं चाहते थे। वे ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत बने रहना चाहते थे। लेकिन "बेंजामिन फ्रैंकलिन" जैसे कुछ लोग स्वशासन का स्वप्न देखने लगे। कुछ महत्वाकांक्षी लोग इस नई भावना से प्रभावित होने लगे। जैसे दक्षिण उपनिवेशों के बागान मालिक ब्रिटिश व्यापारियों के ऋण से छुटकारा प...

इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के कारक

प्रश्न:- इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति की उत्पत्ति के कारको का वर्णन कीजिए। परिचय:- 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी अर्थव्यवस्था तेजी से बदलने लगी। परिणामस्वरूप कारखानों के स्वरूप वाला औद्योगिकरण हुआ जिसमें कामगार दिहाड़ी मजदूर की तरह एक ही स्थान पर काम करते थे। 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति के परिणामस्वरूप इंग्लैंड में सर्वप्रथम सामंत वर्ग की अवधारणा से मध्यम वर्ग का उदय हुआ। ये मध्यम वर्ग के उद्योगपति और व्यापारी ही थे जिन्होंने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति को सफल बनाया। औपनिवेशिक क्षेत्रों के शोषण व दास व्यापार से पर्याप्त पूंजी उपलब्ध हो सकी। कृषि क्रांति से छोटे कृषक स्वतंत्र मजदूर में परिवर्तित हो गए जिससे सस्ता श्रम उपलब्ध हुआ। तकनीकी व वैज्ञानिक क्षेत्र में व्यापक विकास एवं नए-नए आविष्कार, जैसे- वाष्प इंजन, फ्लाइंग शटल, स्पिनिंग जेनी आदि ने औद्योगिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया। लोहा, कोयला व अन्य प्राकृतिक संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता ने भी इसमें योगदान दिया।  इंग्लैंड में ही औद्योगिक क्रांति होने का मुख्य कारण वहाँ पर तकनीकों व नवीन व्यापार प्रणालियों का मध्यम वर्ग द्...

यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत

प्रश्न:- यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- 17 वी सदी में ब्रह्मांड के बारे में मनुष्य की समझ में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। एक नया बौद्धिक माहौल का निर्माण हुआ। सदियों पुरानी पृथ्वी केंद्रित अवधारणा का स्थान अब सूर्य केंद्रित अवधारणा ने ले लिया। अब पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने वाले कई ग्रहों में से एक ग्रह माना जाने लगा। यह पता चला कि सूर्य भी लाखों तारों में से एक तारा है। इसके साथ ही यूरोप में नैतिक और धार्मिक मामलों तथा प्रकृति के बारे में मनुष्य के विचारों पर पुनर्विचार किया जाने लगा। जिस प्रक्रिया के द्वारा ब्रह्मांड के बारे में नए नजरिए और विज्ञान के ज्ञान की स्थापना हुई उसे वैज्ञानिक क्रांति कहा जाता है। प्राकृतिक घटनाओं का परीक्षण तथा प्रयोग और निष्कर्ष के आधार पर नियमों या सिद्धांतों का निर्माण वैज्ञानिक क्रांति की प्रमुख विशेषता थी। आधुनिक विश्व के निर्माण में 17वीं सदी के वैज्ञानिक और बौद्धिक परिवर्तन बहुत अहम थे। इस सदी में वैज्ञानिक ज्ञान और खोज में बहुत तेजी से वृद्धि होने लगी। जे.डी. बर्नाल के अनुसार वैज्ञानिक क्रांति की अवधि को तीन चरणों मे...

इंग्लैंड की क्रांति,अंग्रेजी क्रांति ,गौरवपूर्ण क्रांति!

प्रश्न:- इंग्लैंड की क्रांति का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- 1603 में एलिजाबेथ की मृत्यु के पश्चात इंग्लैंड कि सत्ता का हस्तांतरण स्टुअर्ट वंश के हाथों में हुआ। पहले स्टुअर्ट राजा जेम्स प्रथम थे। वह पहले से ही स्कॉटलैंड के शासक थे। जेम्स ने पाया कि इंग्लैंड की सांसद को जिस तरह ट्यूडर राजाओं ने चलाया था उस तरह इसे चलाना बहुत कठिन है। चार दशकों तक जेम्स प्रथम (1603-25) और चार्ल्स प्रथम(1625-49) को राज्यों के मामले में तनाव का सामना करना पड़ा। उनके शासनकाल में 1642 में इंग्लैंड में गृहयुद्ध छिड़ गया जो 1649 तक चला। चार्ल्स प्रथम की हार हुई और उन्हें फांसी दे दी गई। इतिहासकारों ने इस अवधि को क्रांति काल कहा है। विद्वानों और इतिहासकारों ने इसमें गहरी दिलचस्पी ली है और इसके कारणों और प्रकृति पर आज भी बहस जारी है। आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक परिवर्तनों के कारण इस दौरान इंग्लैंड का सामाजिक वातावरण बहुत तेजी से बदल रहा था। इस क्रांति का प्रमुख कारण राजा और संसद के बीच कुछ प्रमुख मुद्दों को लेकर असहमति थी। यह असहमति कराधान, राज्य के विशेषाधिकार, धार्मिक और विदेश नीति को लेकर थी। जेम्स ने अप...

यूरोप में सत्रहवी सदी का संकट

प्रश्न:- यूरोप के विभिन्न भागों में सत्रहवीं शताब्दी में आए संकट का वर्णन कीजिए। परिचय:- पंद्रहवी शताब्दी में यूरोप का जो व्यापारिक विस्तार हुआ था वह सत्रहवी शताब्दी की शुरआत में यूरोप के कई भागों में समाप्त हो गया। कुछ क्षेत्रों में विकास की गति धीमी पड़ गई, कहीं उसमें ठहराव आया और कई क्षेत्रों में इसमें निरंतर गिरावट आने लगी। आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बदलने लगा। इतावली राज्य तेजी से पतन की ओर बढ़ने लगा। कृषि क्षेत्र के अभाव का वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यूरोप के कई हिस्सों में विद्रोह, संघर्ष और युद्ध जैसी परिस्थितियां देखी गई। इस संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव भूमध्यसागरीय राज्यों पर पड़ा। इतिहासकारों ने इस संकट की उत्पति की अलग अलग व्याख्या की है। इस संकट की तारीख और तीव्रता अलग - अलग क्षेत्रों में अलग - अलग थी। इस संकट के कारण जनसंख्या में भारी कमी, आर्थिक मंदी और सामाजिक तनाव और विनाशकारी युद्ध हुए। जनसांख्यिकी संकट:- इस काल में जनसंख्या में भरी गिरावट आई। कुछ भागो में जनसंख्या वृद्धि रुक सी गई, जबकि अन्य क्षेत्रों में वृद्धि की दर कम हो गई। "पीट...