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काकतीय अभिलेख

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  काकतीय अभिलेख  काकतीय वंश ने 12वीं से 14वीं शताब्दी तक पूर्वी दक्कन क्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया। इस साम्राज्य की जानकारी का प्रमुख स्रोत लिखित अभिलेख (Inscriptions) है। यह अभिलेख, पत्थर, तांबे की प्लेटों और मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए है जो काकतीयों साम्राज्य की वंशावली, राजनीतिक गतिविधियों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म और सांस्कृतिक योगदान के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। काकतीय अभिलेख मुख्य रूप से तेलुगु और संस्कृत में लिखे गए। उल्लेखनीय अभिलेखों में बय्यारम टैंक शिलालेख, मोटुपल्ली शिलालेख, मंगल्लु शिलालेख और हनुमकोंडा शिलालेख शामिल हैं। विद्वान पी.वी. परब्रह्म शास्त्री के अनुसार काकतीय अभिलेख तेलुगु भाषा और साहित्य के विकास का "स्वर्णयुग" दिखाते हैं।  वंशावली की जानकारी शिलालेख काकतीय शासकों की वंशावली और कालक्रम को उजागर करते है। गणपति देवा (1199–1262) के शासनकाल में जारी बय्यारम टैंक शिलालेख , एक विस्तृत वंशावली सूची प्रदान करता है। यह शिलालेख वेन्ना, बीटा I, प्रोल I, और रुद्रदेवा जैसे पूर...

ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत में वि- औद्योगिकरण

प्रश्न:- वि-औद्योगीकरण के विषय में हुए वाद-विवाद का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- वि-औद्योगीकरण से तात्पर्य किसी भी राष्ट्र की औद्योगिक क्षमता में गिरावट से है। किसी भी अर्थव्यवस्था में यह स्थिति तब आती है जब उद्योगों का अंशदान कम होता जाता है और गैर औद्योगिक क्षेत्र का अंशदान बढ़ता जाता है। दूसरे शब्दों में जब अर्थव्यवस्था में द्वितीय क्षेत्र की भागीदारी कम होती जाती है और प्राथमिक क्षेत्र की भागीदारी बढ़ती जाती है तो स्थिति वि-औद्योगीकरण की होती है। ब्रिटिश भारत के काल में भारत की अर्थव्यवस्था को भी एक ऐसे ही स्थिति से गुजरना पड़ा जिसके लिए वि-औद्योगीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। वि-औद्योगीकरण का विचार सबसे पहले "दादा भाई नौरोजी" ने 19वीं सदी के अंत में दिया था जिसका समर्थन बाद में रमेश चंद्र दत्त जैसे विद्वानों ने किया। नौरोजी और दत ने इस प्रक्रिया की तार्किक व्याख्या की और आंकड़ों के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारत में अंग्रेजों की उपस्थिति का सीधा परिणाम था -वि-औद्योगिकरण। वहीं साम्राज्यवादी इतिहासकारों, जिसमें "डी. मार्थट" और मॉरिस-डी-माॅरि...