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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

अकबर की राजपूत नीति का वर्णन

प्रश्न:- अकबर की राजपूत नीति का वर्णन कीजिए ? क्या अकबर ने धार्मिक उदारता की छाप छोड़ी। परिचय:- अकबर की राजपूत नीति को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 1569-70 तक पहला चरण माना जाता है जिसमें अकबर ने दिल्ली सुल्तानों की नीतियों का अनुसरण किया। दूसरे चरण में अकबर ने राजपूतों के साथ दोस्ती बढ़ाने का प्रयत्न किया। तीसरे चरण में अकबर ने मुस्लिम कट्टरपंथ से अपने को अलग कर लिया। राजपूतों के साथ अकबर के संबंध को लेकर कई प्रकार के विवाद हुए हैं। कुछ का तर्क है कि अकबर ने एक ऐसी व्यवस्था शुरू की जिसमें धर्म के आधार पर सार्वजनिक नियुक्तियों में कोई भेदभाव नहीं रखा जाता था। दूसरे यह तर्क देते हैं कि साम्राज्य के विस्तार के लिए अकबर ने राजपूत शक्ति का उपयोग किया और उन्हें एक दूसरे के खिलाफ लड़ाया ताकि एकजुट होकर वे साम्राज्य के लिए खतरा ना पैदा कर सकें। यह भी कहा जाता है कि अकबर की राजपूत नीति जमीदारों और लड़ाकू जातियों को अपने और मिलाने की नीति थी। इसमें राजपूत और अफगान दोनों शामिल थे। खैर जो भी हो राजपूतों की स्वामीभक्ति जगप्रसिद्ध थी। वे दरबार के अंदर और बाहर एक महत्वपूर्ण आधारस्तंभ साबित ...