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काकतीय अभिलेख

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  काकतीय अभिलेख  काकतीय वंश ने 12वीं से 14वीं शताब्दी तक पूर्वी दक्कन क्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया। इस साम्राज्य की जानकारी का प्रमुख स्रोत लिखित अभिलेख (Inscriptions) है। यह अभिलेख, पत्थर, तांबे की प्लेटों और मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए है जो काकतीयों साम्राज्य की वंशावली, राजनीतिक गतिविधियों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म और सांस्कृतिक योगदान के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। काकतीय अभिलेख मुख्य रूप से तेलुगु और संस्कृत में लिखे गए। उल्लेखनीय अभिलेखों में बय्यारम टैंक शिलालेख, मोटुपल्ली शिलालेख, मंगल्लु शिलालेख और हनुमकोंडा शिलालेख शामिल हैं। विद्वान पी.वी. परब्रह्म शास्त्री के अनुसार काकतीय अभिलेख तेलुगु भाषा और साहित्य के विकास का "स्वर्णयुग" दिखाते हैं।  वंशावली की जानकारी शिलालेख काकतीय शासकों की वंशावली और कालक्रम को उजागर करते है। गणपति देवा (1199–1262) के शासनकाल में जारी बय्यारम टैंक शिलालेख , एक विस्तृत वंशावली सूची प्रदान करता है। यह शिलालेख वेन्ना, बीटा I, प्रोल I, और रुद्रदेवा जैसे पूर...

खुश्चेव की विदेश नीति

खुश्चेव की विदेश नीति निकिता खुश्चेव 1953 से 1964 तक सोवियत संघ के नेता थे। खुश्चेव ने एक ऐसी विदेश नीति अपनाई जिसका उद्देश्य सोवियत हितों को बढ़ावा देना और दुनिया भर में सोवियत प्रभाव का विस्तार करना था। 8 फरवरी 1955 को मालनकोव ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया जिसके बाद बुलगानिन प्रधानमंत्री बना और निकिता खुश्चेव को दल का सचिव बनाया गया। इन दोनों के द्वारा अपनाई गई विदेश नीति को "बुलगानिन खुश्चेव कूटनीतिज्ञता" के नाम से जाना जाता है। किंतु 3 साल बाद 1958 में खुश्चेव ने स्वयं को प्रधानमंत्री एवं दल के सचिव के रूप में स्थापित कर लिया। बुलगानिन के पतन के बाद खुश्चेव विदेश नीति का वास्तविक प्रमुख बन गया। इसके बाद आंतरिक एवं विदेशी राजनीति में निकिता खुश्चेव सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में उभरा। उसे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक विषयों की पर्याप्त जानकारी थी, इसी योग्यता के बल पर वह विदेश नीति को एक नया रूप देने में सफल हुआ। 1955-56 के मध्य खुश्चेव के उत्कर्ष के साथ सोवियत संघ एक "सुपर शक्ति" बन गया। स्तालिन के विकास कार्यों का लाभ खुश्चेव को विरासत में मि...