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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

ब्रिटिश भारत में प्रच्यवादी विचारधारा का विस्तार

प्रश्न:- अंग्रेजों द्वारा औपनिवेशिक राज्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनाई गई विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण उपनिवेश था और इस पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए ब्रिटेन ने कई तरह के आर्थिक, सामाजिक प्रशासनिक और वैधानिक तरीकों का इस्तेमाल किया, परंतु उपनिवेशों में प्रशासनिक सर्वोच्चता महज कानूनी प्रशासनिक प्रावधानों पर निर्भर नहीं करती थी, बल्कि इन सबके पीछे एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित औपनिवेशिक विचारधारा भी कार्यरत थी। ब्रिटेन के बदलते सामाजिक आर्थिक हालात एवं भारतीय उपनिवेश की बदलती भूमिका के अनुरूप औपनिवेशिक विचारधारा में भी बदलाव आता रहता था। यही कारण है कि भारत में औपनिवेशिक नीतियों को व्यक्तिगत स्वरूप देने में कभी प्राच्यवादी, कभी उपयोगितावादी तो कभी ईसाई धर्म प्रचारको अर्थात इवेंजलिवादियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस विचारधारा के माध्यम से ब्रिटिश सरकार शासन करना चाहते थे तथा पश्चिमी सभ्यता के अनुसार पिछड़े भारतीय समाज को सभ्य और आधुनिक भी बनाना चाहते थे। इसलिए ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक विचारधाराओं को समझना जरूरी है क्यो...