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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन

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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन पृष्ठभूमि :- प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था विद्यमान् थी। यह व्यवस्था वैश्य कहलाने वाले किसानों, व्यवसायियों तथा शूद्र कहलाने वाले मज़दूरों पर आधारित थी। राजा के अधिकारी वैश्य से कर वसूलते थे जिससे वह अधिकारियों का वेतन चुकाते तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे, और स्वयं के लिए भोग-विलास की वस्तुएँ ख़रीदते थे। तीसरी तथा चौथी सदी में यह व्यवस्था चरमराने लगी। निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे। अर्थात वह कर चुकाना और सेवा कार्य छोड़ने लगे, जिसने सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वह वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने लगे क्योंकि उत्पादक वर्ग कारों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था। इस स्थिति से निपटने के लिए राजाओं द्वारा एक कारगर क़दम उठाया गया। जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि अनुदान दिया जाने लगा। जिससे राजकीय भूमि से कर वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार भूमि अनुदान प्राप्तकर्ता के ऊपर चला गया। साथ ही उन्हें वहाँ के मूलनिवासियों को वर्ण व्यवस्था को ...

हुमायूँनामा

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हुमायूँनामा जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम का जन्म लगभग 1523 ई. में हुआ था। जब वह केवल दो वर्ष की थी तब हुमायूँ की माता माहम बेगम ने उसे गोद ले लिया। इस प्रकार जब बाबर 1525 ई. में हिन्दुस्तान जीतने के लिये काबुल से रवाना हुआ तब गुलबदन की उम्र केवल दो वर्ष थी। बाबर इस अन्तिम भारतीय अभियान के समय अपने परिवार को काबुल ही छोड़ आया था। 1529 ई. में गुलबदन, माहम बेगम के साथ भारत आ गई। दूसरे ही वर्ष जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसकी उम्र मात्र 8 वर्ष थी। जब वह दस वर्ष की थी तब महाम बेगम की मृत्यु हो गई और गुलबदन इससे बहुत उदास रहने लगी।  हुमायूँ, गुलबदन बेगम से अधिक स्नेह करता था। चौसा में शेरशाह के द्वारा पराजित होने के बाद उसने गुलबदन को लिखा था कि, "मैं तुम्हे बहुत याद करता रहता था और कभी-कभी पछताते हुए कहता था कि काश तुम्हे अपने साथ ले आता। किंतु जिस समय हलचल मची तो मैंने ईश्वर के प्रति अपनी भावना प्रकट कर कहा कि,"ईश्वर को धन्य है कि मैं गुलबदन को न लाया।” कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ की पराजय के बाद वह काबुल में ही रही। 1545 ई. में हुमायूँ के काबुल लौटने पर वह प्...

बाबरनामा

बाबरनामा बाबर की आत्मकथा "बाबरनामा" अथवा "तजुक-ए-बाबरी” जीवन-चरित्र भी है और इतिहास भी है। इसीलिये यह दूसरी बहुत सी आत्मकथाओं से अधिक महत्व रखती है। बाबर ने जिन्दगी में कभी भी दो वर्षों तक एक ही स्थान पर ईद नहीं मनाई थी। ऐसे व्यक्ति ने कहीं पर भी स्वयं इतिहासकार होने का दावा ही नहीं किया परन्तु फिर भी आज यह मान्यता है कि आत्मकथाओं में बाबरनामा निश्चय ही एक ऐसी उच्च कोटि की रचना है जिसके आधार पर बाबर को आत्मकथा लेखकों का शिरोमणि माना जा सकता है। बाबरनामा को पढ़ते समय जहां हम एक और रोमांचक साहित्य-सागर देखते है वहीं दूसरी ओर इतिहास के अमूल्य रत्न भी हमारे हाथ लग जाते हैं। इसीलिये Denison Ross ने लिखा है कि,"बाबर के आत्म-संस्मरण को सभी समयों के साहित्य में सबसे अधिक सम्मोहनकारी और रोमांटिक रचनाओं में स्थान मिलना चाहिये।" A.S Beveridge ने इस आत्मकथा का मूल्यांकन करते हुये लिखा है कि, "बाबर की आत्मकथा एक अनमोल ग्रन्थ है जिसकी तुलना सन्त आगास्टाइन और रूसो के स्वीकृति पत्रों तथा गिब्बन और न्यूटन की आत्मकथाओं से की जा सकती है। बाबर की इस अनूठी आत्मकथा का आधार ...