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पौराणिक धार्मिक परंपरा ( 300 ई• पू• से 700 ई• तक)

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पौराणिक धार्मिक परंपरा ( 300 ई• पू• से 700 ई• तक) भारतीय हिन्दू धर्म संसार के अन्य सभी धर्मों से भिन्न है। इसमें विविध प्रकार की आस्थाएँ, धार्मिक व्यवहार, संप्रदाय और धार्मिक परंपराएं मौजूद है। 200 ई• पू• से 300 ई• के बीच सर्वोच्च देवी-देवता की अवधारणा विकसित हुई, जिनकी प्रतिमाएं मंदिरों में स्थापित की गई। इस काल में शिव और विष्णु से जुड़े संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुए जिन्होंने देवी देवताओं को सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्वीकार किया। पुराणों में त्रिदेव के रूप में ब्रह्म, विष्णु और महेश की अवधारणा का विकास हुआ। ब्रह्म सृष्टि के रचयिता, विष्णु संसार के पालनकरता तथा शिव संसार के संहारकरता के रूप में स्थापित होने लगे। तीनों देवताओं के गुण को मिश्रित करके बहुदेवाद को एकदेववाद का रूप दिया गया। एक देवता को समर्पित मंदिर में अन्य देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी। जिसमें अन्य देवताओं द्वारा सर्वोच्च देवता को स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इस काल में विभिन्न धार्मिक संप्रदाय के प्रतीक चिह्न मुहरो पर अंकित किए गए। उदाहरण के लिए लिंग, त्रिशूल, नंदी, बैल, ग़ज़लक्ष्मी,...

300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन

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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन पृष्ठभूमि :- प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था विद्यमान् थी। यह व्यवस्था वैश्य कहलाने वाले किसानों, व्यवसायियों तथा शूद्र कहलाने वाले मज़दूरों पर आधारित थी। राजा के अधिकारी वैश्य से कर वसूलते थे जिससे वह अधिकारियों का वेतन चुकाते तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे, और स्वयं के लिए भोग-विलास की वस्तुएँ ख़रीदते थे। तीसरी तथा चौथी सदी में यह व्यवस्था चरमराने लगी। निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे। अर्थात वह कर चुकाना और सेवा कार्य छोड़ने लगे, जिसने सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वह वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने लगे क्योंकि उत्पादक वर्ग कारों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था। इस स्थिति से निपटने के लिए राजाओं द्वारा एक कारगर क़दम उठाया गया। जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि अनुदान दिया जाने लगा। जिससे राजकीय भूमि से कर वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार भूमि अनुदान प्राप्तकर्ता के ऊपर चला गया। साथ ही उन्हें वहाँ के मूलनिवासियों को वर्ण व्यवस्था को ...

संगम साहित्य

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संगम साहित्य  तमिल साहित्य को संगम साहित्य कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना संगम कवियों द्वारा की गई। संगम विद्वानों की एक संस्था थी। इन ग्रंथों से हमें तमिल संस्कृति, इतिहास और जीवन शैली की जानकारी मिलती है। तमिल इतिहास में तीन संगम हुए है जिसमें लगभग 8,598 कवियों ने भाग लिया। मदुरै में हुए संगम को प्रमुख संगम माना जाता है तथा पाण्डेय राजाओं द्वारा इसे संरक्षण प्रदान किया गया। इसमें प्रमुख रूप से तीन राज्यों चेर, चोल और पाण्डेय के इतिहास की जानकारी मिलती है। संगम कवियों द्वारा राजा (अरशर) ,व्यवसायी (वेश्यार) , किसान (वेलालर ) शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कई नगरों का उल्लेख है जैसे कांची, कोरकई, मदुरै, पुहार और उरैयूर । संगम कविताओं में युद्धों की गाथाएँ कूट कूट कर भरी हुई है। वीरगति को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। माना जाता था की वीरगति प्राप्त योद्धा को स्वर्ग में स्थान मिलता है। पुरनानूरु की एक कविता में बताया गया है कि यदि किसी योद्धा की मृत्यु युद्ध के मैदान में नहीं हुई हो तो अंतिम क्रिया के पहले उसके शरीर को तलवार से काट दिया जाता था। वतकिरुतल के ...