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वारकरी आंदोलन

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  वारकरी आंदोलन  वारकरी आंदोलन की शुरुआत 13 शताब्दी में महाराष्ट्र में हुई। पंडुलिक को इसका प्रथम संत माना जाता है। पंढरपुर वारकरी आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। अधिकांश वारकरी संत विठोबा की पूजा करते थे जिन्हे विष्णु का अवतार माना जाता है। वारकारी संतो की संख्या 50 से अधिक थी। इसके प्रमुख संतो में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, और रामदास शामिल है।   दार्शनिक शिक्षाएं  वारकरी संतो के अनुसार भगवान् तक पहुँचने का रास्ता प्रेम और मानवता की सेवा से होकर जाता है और यह रास्ता सभी के लिए खुला है। साथ ही उनका मानना था की इसपर केवल पंडितों और ब्राह्मणों का ही विशेष अधिकार नहीं है। इनके अनुसार पुरोहित वर्ग भगवान पर अधिकार होने का दावा करते है। वह नहीं जानते की दिव्य को वश में नहीं किया जा सकता, बल्कि सेवा के माध्यम से ही उसका अनुसरण किया जा सकता है। वारकरी सम्रदाय का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं को दैनिक जीवन में अधिक सुलभ बनाना था।  विद्वान सुविरा जायसवाल के अनुसार भगवान को केवल एक समुदाय की संपत्ति के रक्षक और मालिक के रूप में देखने से लेकर भगवान को एक सार्वभौमिक ...

300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन

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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन पृष्ठभूमि :- प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था विद्यमान् थी। यह व्यवस्था वैश्य कहलाने वाले किसानों, व्यवसायियों तथा शूद्र कहलाने वाले मज़दूरों पर आधारित थी। राजा के अधिकारी वैश्य से कर वसूलते थे जिससे वह अधिकारियों का वेतन चुकाते तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे, और स्वयं के लिए भोग-विलास की वस्तुएँ ख़रीदते थे। तीसरी तथा चौथी सदी में यह व्यवस्था चरमराने लगी। निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे। अर्थात वह कर चुकाना और सेवा कार्य छोड़ने लगे, जिसने सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वह वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने लगे क्योंकि उत्पादक वर्ग कारों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था। इस स्थिति से निपटने के लिए राजाओं द्वारा एक कारगर क़दम उठाया गया। जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि अनुदान दिया जाने लगा। जिससे राजकीय भूमि से कर वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार भूमि अनुदान प्राप्तकर्ता के ऊपर चला गया। साथ ही उन्हें वहाँ के मूलनिवासियों को वर्ण व्यवस्था को ...

संगम साहित्य

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संगम साहित्य  तमिल साहित्य को संगम साहित्य कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना संगम कवियों द्वारा की गई। संगम विद्वानों की एक संस्था थी। इन ग्रंथों से हमें तमिल संस्कृति, इतिहास और जीवन शैली की जानकारी मिलती है। तमिल इतिहास में तीन संगम हुए है जिसमें लगभग 8,598 कवियों ने भाग लिया। मदुरै में हुए संगम को प्रमुख संगम माना जाता है तथा पाण्डेय राजाओं द्वारा इसे संरक्षण प्रदान किया गया। इसमें प्रमुख रूप से तीन राज्यों चेर, चोल और पाण्डेय के इतिहास की जानकारी मिलती है। संगम कवियों द्वारा राजा (अरशर) ,व्यवसायी (वेश्यार) , किसान (वेलालर ) शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कई नगरों का उल्लेख है जैसे कांची, कोरकई, मदुरै, पुहार और उरैयूर । संगम कविताओं में युद्धों की गाथाएँ कूट कूट कर भरी हुई है। वीरगति को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। माना जाता था की वीरगति प्राप्त योद्धा को स्वर्ग में स्थान मिलता है। पुरनानूरु की एक कविता में बताया गया है कि यदि किसी योद्धा की मृत्यु युद्ध के मैदान में नहीं हुई हो तो अंतिम क्रिया के पहले उसके शरीर को तलवार से काट दिया जाता था। वतकिरुतल के ...