संदेश

अक्टूबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

चित्र
                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

मुगलकालीन राज्य की प्रकृति (वाद -विवाद)

मुगलकालीन राज्य की प्रकृति (वाद -विवाद) परिचय:- राजतंत्र को मध्ययुगीन राज्यव्यवस्था का आधार समझा गया। अबुल फजल के अनुसार “अगर राजतंत्र न रहा तो कलह की आंधी कभी दब नहीं पाएगी, न ही स्वार्थपूर्ण महत्वकांक्षा समाप्त हो पाएगी। लालसा और व्यवस्था के भार से दबा मनुष्य विध्वंस की खाई में गिरता चला जाएगा”। किसी साम्राज्य के प्रशासनिक ढांचे का आकार-प्रकार और राज्य की प्रकृति मुख्य रूप से संप्रभुता के सिद्धांत और राजा की अपनी नीतियों द्वारा निर्धारित होती है। इसलिए मुगल राज्य को सही ढंग से समझने के लिए राज्य संबंधी सिद्धांत और इसके विभिन्न पक्षों को जानना जरूरी है। मुगलों ने तुर्की और मंगोल मध्य एशियाई राज्यव्यवस्था को अपनाया। मंगोल व्यवस्था तुर्क-मंगोल व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। मुगल स्रोतों के मूल्यांकन से पता चलता है कि मुगल शासकों ने राजनीतिक आवश्यकताओं से प्रेरित होकर इसे अपनाया। वे भारत पर आक्रमण करने वाले दो आक्रमणकारियों चंगेज और तैमूर से अपना संबंध सिद्ध करना चाहते थे। इतिहासकार आर.पी.त्रिपाठी ने मुगल राजसत्ता का गंभीरता से अध्ययन किया है, यह इसे तुर्क-मंगोल सिद्धांत मानते है। इनके अन...

ईसाई इतिहासलेखन की शुरुआत

ईसाई इतिहासलेखन की शुरुआत परिचय:- प्राचीनकालीन इतिहासलेखन की तुलना में मध्यकालीन इतिहास लेखन की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें दैवीय विधान को महत्व दिया गया जिसमें कि व्यक्ति की भूमिका नाम मात्र की थी। ईसाई इतिहासलेखन की परंपरा में धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया और विधर्मियों पर इसाइयत की विजय ने ईसाई इतिहासलेखन की परंपरा के लिए प्रेरित किया। ईसाई इतिहासकारों ने यहूदी धर्म ग्रंथों को मूल स्रोतों के रूप में स्वीकार किया। मध्यकाल में ईसाई सन्यासियों एवं पुरोहित वर्ग की इतिहासलेखन में अत्यधिक अभिरुचि थी। उन्होंने यीशु मसीह, चर्च और उसके संरक्षको तथा स्थानीय शासकों के राजवंशीय इतिहास के विषय में प्रचुर मात्रा में लिखा। प्रारंभिक मध्यकाल में ऐतिहासिक रचनाओं का स्वरूप आख्यानो अथवा इतिवृत्तों के रूप में होता था जिनमें कि साल दर साल की घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन होता था। केवल तिथिक्रमानुसार घटनाओं के वृतांत की इस शैली के लेखन में विशिष्ट घटनाओं और उनके कारणों के विश्लेषण की संभावना नहीं रह पाती थी। मध्यकालीन ईसाई इतिहासलेखन वास्तव में हेलेनिस्टिक व रोमन इतिहासलेखन परंपरा की ही अगली कड़ी है। ईस...

भारतीय सामंतवाद (Debate)

भारतीय सामंतवाद (Debate) परिचय:- सामंतवाद की चर्चा करने वाले विद्वानों ने इस शब्द के अर्थ का व्यापक रूप में प्रयोग किया तथा सामंतवाद की मूल परिभाषा को लेकर भी उनमें मतभेद है। प्रोफेसर हरबंस मुखिया का मानना है कि सामंत शब्द का प्रयोग मध्यकालीन यूरोप में कानूनी अर्थ में किसी के संपत्तिगत अधिकार को इंगित करने के लिए होता था। वहीं सामंतवाद शब्द का प्रयोग काफी बाद लगभग 18वीं सदी में आरंभ हुआ जिसके उद्देश्य छोटे-छोटे राजकुमारों और अधिपतियों के बीच संप्रभुता की साझेदारी को परिभाषित करना था। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान इस शब्द का उपयोग पुरानी राजतंत्रीय व्यवस्था की आलोचना करने के लिए किया गया, इसके बाद सामंतवाद शब्द का प्रयोग और भी व्यापक होता गया। अधिकांश इतिहासकारों ने पश्चिमी और मध्य यूरोप में 10वीं से 12वीं सदी की राजनीतिक और सामाजिक ढांचे के रूप में सामंतवाद को इस काल की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था माना है। भारतीय औपनिवेशिक अधिकारियों ने अपने साम्राज्यवादी शासन को सही प्रमाणित करने के लिए भारत के इतिहास को अंधकारमय युग के रूप में प्रस्तुत कियानी जहां यूरोपीय आधुनिक ज्ञान और व्यवस्थाओं से पहले क...