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मार्टिन लूथर किंग JR.

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मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

भारतीय ताम्रपाषाणिक काल

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भारतीय ताम्रपाषाणिक काल नवपाषाण युग का अंत होते-होते धातुओं का इस्तेमाल शुरू हो गया। धातुओं में सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ। कई संस्कृतियों का जन्म पत्थर और तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग करने के कारण हुआ। इन संस्कृतियों को ताम्रपाषाणिक कहते हैं, जिसका अर्थ है पत्थर और तांबे के उपयोग की अवस्था। यह लगभग 3300 ईसा पूर्व से 1300 ई•पू• तक फैला हुआ है। ताम्रपाषाण युग के लोग अधिकांशतः पत्थर और तांबे की वस्तुओं का प्रयोग करते थे। वे मुख्यतः ग्रामीण समुदाय बनाकर रहते थे और देश के ऐसे विशाल भागों में फैले थे जहाँ पहाड़ी जमीन और नदियाँ थीं। भारत में ताम्रपाषाण अवस्था की बस्तियाँ दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग , पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई गई हैं।  मालवा संस्कृति:– मध्य और पश्चिमी भारत की मालवा ताम्रपाषाण संस्कृति की विशेषता मालवा मृद्भांड है जो ताम्रपाषाण मृद्भांडों में उच्चतम माना गया है। मालवा संस्कृति की विशेषता इसकी उन्नत मिट्टी के बर्तनों की तकनीक थी, जिसमें बढ़िया काले चित्रित डिजाइनों के साथ लाल बर्तनों का उपयोग शामिल था। वे धातु विज्ञ...

प्राचीन भारतीय इतिहास का पुनर्निर्माण (स्रोत)

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प्राचीन भारतीय इतिहास का पुनर्निर्माण (स्रोत) प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में पुरातात्विक निष्कर्षों, शिलालेखों, धार्मिक ग्रंथों और मौखिक परंपराओं सहित विभिन्न स्रोतों से जानकारी को शामिल किया गया है। यह हजारों वर्षों तक फैला हुआ है, जिसमें सिंधु घाटी, वैदिक, मौर्य, गुप्त और अन्य सभ्यताएं शामिल हैं। स्रोत इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके आधार पर हम अपने अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं। अतीत का कोई भी अवशेष स्रोत के उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए हमारे पास विभिन्न स्रोत हैं साहित्यिक, पुरातात्विक, और विदेशी वृतान्त। साहित्यिक स्रोतों के अंतर्गत वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्य, महाकाव्य, पुराण, संगम साहित्य, प्राचीन जीवनियाँ, कविता और नाटक शामिल हैं। पुरातत्व के अंतर्गत हम पुरातात्विक स्त्रोतो और उत्खनन के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले पुरालेखों मुद्राओं और स्थापत्य अवशेषों को शमिल करते है। भारतीय इतिहास में लिखित अभिलेखों की प्रधानता है। हालाँकि, मंदिर के अवशेष, सिक्के, घर के अवशेष, खंभों के गड्डे, मिट्टी के बर्तन आदि के रू...