संदेश

फ़रवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मार्टिन लूथर किंग JR.

चित्र
मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

हुमायूँनामा

चित्र
हुमायूँनामा जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम का जन्म लगभग 1523 ई. में हुआ था। जब वह केवल दो वर्ष की थी तब हुमायूँ की माता माहम बेगम ने उसे गोद ले लिया। इस प्रकार जब बाबर 1525 ई. में हिन्दुस्तान जीतने के लिये काबुल से रवाना हुआ तब गुलबदन की उम्र केवल दो वर्ष थी। बाबर इस अन्तिम भारतीय अभियान के समय अपने परिवार को काबुल ही छोड़ आया था। 1529 ई. में गुलबदन, माहम बेगम के साथ भारत आ गई। दूसरे ही वर्ष जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसकी उम्र मात्र 8 वर्ष थी। जब वह दस वर्ष की थी तब महाम बेगम की मृत्यु हो गई और गुलबदन इससे बहुत उदास रहने लगी।  हुमायूँ, गुलबदन बेगम से अधिक स्नेह करता था। चौसा में शेरशाह के द्वारा पराजित होने के बाद उसने गुलबदन को लिखा था कि, "मैं तुम्हे बहुत याद करता रहता था और कभी-कभी पछताते हुए कहता था कि काश तुम्हे अपने साथ ले आता। किंतु जिस समय हलचल मची तो मैंने ईश्वर के प्रति अपनी भावना प्रकट कर कहा कि,"ईश्वर को धन्य है कि मैं गुलबदन को न लाया।” कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ की पराजय के बाद वह काबुल में ही रही। 1545 ई. में हुमायूँ के काबुल लौटने पर वह प्...

बाबरनामा

बाबरनामा बाबर की आत्मकथा "बाबरनामा" अथवा "तजुक-ए-बाबरी” जीवन-चरित्र भी है और इतिहास भी है। इसीलिये यह दूसरी बहुत सी आत्मकथाओं से अधिक महत्व रखती है। बाबर ने जिन्दगी में कभी भी दो वर्षों तक एक ही स्थान पर ईद नहीं मनाई थी। ऐसे व्यक्ति ने कहीं पर भी स्वयं इतिहासकार होने का दावा ही नहीं किया परन्तु फिर भी आज यह मान्यता है कि आत्मकथाओं में बाबरनामा निश्चय ही एक ऐसी उच्च कोटि की रचना है जिसके आधार पर बाबर को आत्मकथा लेखकों का शिरोमणि माना जा सकता है। बाबरनामा को पढ़ते समय जहां हम एक और रोमांचक साहित्य-सागर देखते है वहीं दूसरी ओर इतिहास के अमूल्य रत्न भी हमारे हाथ लग जाते हैं। इसीलिये Denison Ross ने लिखा है कि,"बाबर के आत्म-संस्मरण को सभी समयों के साहित्य में सबसे अधिक सम्मोहनकारी और रोमांटिक रचनाओं में स्थान मिलना चाहिये।" A.S Beveridge ने इस आत्मकथा का मूल्यांकन करते हुये लिखा है कि, "बाबर की आत्मकथा एक अनमोल ग्रन्थ है जिसकी तुलना सन्त आगास्टाइन और रूसो के स्वीकृति पत्रों तथा गिब्बन और न्यूटन की आत्मकथाओं से की जा सकती है। बाबर की इस अनूठी आत्मकथा का आधार ...