पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष

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  पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष  “रोम में 510 ईसापूर्व में राजशाही का अंत हुआ तथा गणतंत्र की शुरुआत हुई। जिसमें राजनितिक सत्ता कुलीनों के हांथो में रही तथा उन्होंने इससे अकूत धन कमाया। जिसके चलते आमिर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती गयी तथा निम्न वर्ग इनसे नाराज रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन रोमन समाज दो वर्गो में विभाजित था - पैट्रिशियन और प्लीबियन । पैट्रिशियन में कुलीन वर्ग शामिल थे जो आर्थिक, राजनितिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे। प्लीबियन में आम लोग, किसान तथा मजदुर शामिल थे। इनके बीच होने वाले संघर्ष को "श्रेणियों का टकराव" तथा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ द ऑर्डर्स" के नाम से जाना जाता है जो लगभग 494 ई• पू• से 287 ई• पू• तक चला। रोमन इतिहासकार टाइटस लिवियस के अनुसार, प्लीबियन और पैट्रीशियन के बीच संघर्ष एक सामाजिक और आर्थिक संघर्ष था, जिसमें प्लीबियन ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार यह इतिहास का सबसे पहला 'वर्ग-संघर्ष' है जिसने बाद के सामाजिक बदलावों की नींव रखी। वैवाहिक प्रतिबंध - 445 ई• पू• के बाद पैट्रिशियन और प्लीबियन के ...

ऋग्वैदिक काल की अर्थव्यवस्था

श्रगवैदिक लोग कृषि और पशुपालन दोनों करते थे। पशुपालन इनका प्रमुख आर्थिक आधार था, इसके बाद कृषि महत्व रखता था। इन लोगों को खेती की बेहतर जानकारी थी। हल के लिए यह फाल, लांगल तथा सिरा का प्रयोग करते थे। इन्हें बोवाई, कटाई और दावनी का ज्ञान था। इन्हें विभिन्न ऋतुओं के बारे में भी जानकारी थी। यह लोग अच्छी वर्षा तथा अच्छी उपज इत्यादि के लिए प्रार्थना करते थे। यह कृषि भूमि के लिए इंद्र की उपासना करते थे। इंद्र को फसलों का संरक्षक तथा उर्वर भूमि को अर्जित करने वाला देवता के रूप में उल्लेख किया गया है।

ऋग्वेद में गाय और सांड की इतनी चर्चा है कि ऋगवैदिक आर्यों को मुख्य रूप से पशुचारक कहा जाता है। गाय सबसे उत्तम धन मानी जाती थी। पुरोहितो को दी जाने वाली दक्षिणा में गाय दी जाती थी। ऋग्वेद में रथ बनाने वाले, बैलगाड़ी बनाने वाले, बढ़ाई, धातु के कारीगर, रंगाई करने वाले, धनुष बनाने वाले तथा चटाई बनाने वालों की चर्चा की गई है।

एक समुदाय दूसरे समुदाय से उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। यज्ञ और अनुष्ठानों के बदले पुरोहित दान और दक्षिणा लेता था। श्रगवैदिक ग्रंथों में वाणिज्य और व्यापार काफी गौंण प्रतीत होता है। विनिमय वस्तु पर आधारित होता था और ऐसी अर्थव्यवस्था में पशुधन सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक इकाई था। पण, धन, राई इत्यादि युद्ध में जीते हुए धन के नाम दिए गए हैं, जो धन का एक प्रमुख स्रोत प्रतीत होता है।

व्यक्तिगत संपत्ति अथवा व्यक्तिगत स्वामित्व की अवधारणा पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई थी। भूमि के क्रय-विक्रय अथवा उन को गिरवी रखने का प्रचलन नहीं था। श्रगवैदिक लोग प्रार्थनाओं में घर, घोड़े, सोना, उपजाऊ खेत, खाद्य पदार्थ, संपत्ति, जेवर, रथ, यश और संतान की कामना करते थे। समाज में दास प्रथा मौजूद थी। एक दास को, पुरुष अथवा महिला, किसी प्रकार का अधिकार नहीं था। वह अपने स्वामी की निजी संपत्ति की तरह था, जिससे वह किसी भी प्रकार की सेवा ले सकता था। युद्ध में पराजित होने अथवा श्रणी होने की अवस्था में दासता स्वीकार करनी पड़ती थी।


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