300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन

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300 ई• और 750 ई• के बीच कृषि और सामाजिक परिवर्तन पृष्ठभूमि :- प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था विद्यमान् थी। यह व्यवस्था वैश्य कहलाने वाले किसानों, व्यवसायियों तथा शूद्र कहलाने वाले मज़दूरों पर आधारित थी। राजा के अधिकारी वैश्य से कर वसूलते थे जिससे वह अधिकारियों का वेतन चुकाते तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे, और स्वयं के लिए भोग-विलास की वस्तुएँ ख़रीदते थे। तीसरी तथा चौथी सदी में यह व्यवस्था चरमराने लगी। निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे। अर्थात वह कर चुकाना और सेवा कार्य छोड़ने लगे, जिसने सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वह वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने लगे क्योंकि उत्पादक वर्ग कारों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था। इस स्थिति से निपटने के लिए राजाओं द्वारा एक कारगर क़दम उठाया गया। जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि अनुदान दिया जाने लगा। जिससे राजकीय भूमि से कर वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार भूमि अनुदान प्राप्तकर्ता के ऊपर चला गया। साथ ही उन्हें वहाँ के मूलनिवासियों को वर्ण व्यवस्था को ...

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वेद में वर्ण शब्द का प्रयोग रंग के अर्थ में होता था। प्रतीत होता है कि आर्य भाषा भाषी गौर वर्ण के थे और मूलनिवासी लोग काले रंग के। आर्य द्वारा जीते गए दास, गुलाम और शूद्र कहलाए। जीती गई वस्तुओं में कबीले के सरदारों और पुरोहितों को अधिक हिस्सा मिलता था। वह अपने भाई बंधुओं को वंचित करते हुए अधिकाधिक संपन्न होते गये। इससे कबीले में सामाजिक असमानता का उदय हुआ। धीरे धीरे कबायली समाज तीन वर्गों में बट गया योद्धा, पुरोहित और जनसामान्य। चौथा वर्ग जो शूद्र कहलाता था, ऋग्वेद काल के अंत में दिखाई पड़ता है क्योंकि इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल में है, जो सबसे बाद में जोड़ा गया।

पुरोहितों को दक्षिणा में मुख्य रूप से दासिया दी जाती थी जिनसे घरेलू काम कराया जाता था। ऋग्वेद के काल में ही व्यवसाय के आधार पर समाज में विभेदीकरण आरंभ हुआ। गाय, रथ, घोड़े, दास-दासीयां दान में दिए जाते थे। युद्ध में जीते गई संपत्ति का असमान वितरण होने के कारण समाज में असमानता आई और इससे सामान्य कबायली लोगों को वंचित करते हुए राजाओं और पुरोहितों को आगे बढ़ने में सहायता मिली।

ऋग्वेद में उस काल की सामाजिक व्यवस्था, लोगों के रहन-सहन, खान-पान का वर्णन मिलता है। मांसाहारी भोजन अथवा कुछ देवताओं को भेड़-बकरी, बैल जैसे पशुओं की बलि चढ़ाने का भी उल्लेख मिलता है। यह लोग अनाज बना सुरा नाम के नशीले पेय का भी सेवन करते थे। वे सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, वृक्षछाल और इत्यादि पहनते थे और विविध प्रकार के आभूषणों का भी प्रयोग करते थे। संगीत और नृत्य में भी इनकी रुचि थी। साथ में रथो की दौड़, चौपड़ के रूप में जुआ भी लोकप्रिय था।

यह कोई आदर्श समाज नहीं था। यहां मुख्यतः गायों की चोरी विशेष रूप से होती थी। ऐसे समाज विरोधी हरकतों को रोकने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। पित्तृतंत्रात्मक समाज में लोग हमेशा वीर पुत्रों की प्राप्ति के लिए देवता से प्रार्थना करते थे। ऋग्वेद में बेटी के लिए कामना कहीं व्यक्त नहीं की गई। स्त्रियां सभा समितियों में भाग ले सकती थी, वे पतियों के साथ यज्ञ में आहुतियां दे सकती थी, औरतें भी रथो की दौड़ में हिस्सा लेती थी। इसलिए 19वीं शताब्दी तथा बीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधारको तथा राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने वैदिक काल को भारतीय नारी के स्वर्ण युग के रूप में चित्रित किया है।

ऋग्वेद में एकल विवाह, बहुपत्नी विवाह तथा बहुपति विवाह का उल्लेख है। स्त्रियों को स्वयंबर का भी अधिकार था। पति की मृत्यु के बाद या उसके लुप्त हो जाने की अवस्था में पुनर्विवाह किया जा सकता था। वैदिक काल की जिन स्त्रियों की चर्चा की जाती रही है वे संभवत कुलीन वर्ग की थी। आम नारियों के विषय को प्राय: नजरअंदाज किया गया है।

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