मार्टिन लूथर किंग JR.

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मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

इंग्लैंड की क्रांति,अंग्रेजी क्रांति ,गौरवपूर्ण क्रांति!

प्रश्न:- इंग्लैंड की क्रांति का विस्तार से वर्णन कीजिए।
परिचय:- 1603 में एलिजाबेथ की मृत्यु के पश्चात इंग्लैंड कि सत्ता का हस्तांतरण स्टुअर्ट वंश के हाथों में हुआ। पहले स्टुअर्ट राजा जेम्स प्रथम थे। वह पहले से ही स्कॉटलैंड के शासक थे। जेम्स ने पाया कि इंग्लैंड की सांसद को जिस तरह ट्यूडर राजाओं ने चलाया था उस तरह इसे चलाना बहुत कठिन है। चार दशकों तक जेम्स प्रथम (1603-25) और चार्ल्स प्रथम(1625-49) को राज्यों के मामले में तनाव का सामना करना पड़ा। उनके शासनकाल में 1642 में इंग्लैंड में गृहयुद्ध छिड़ गया जो 1649 तक चला। चार्ल्स प्रथम की हार हुई और उन्हें फांसी दे दी गई। इतिहासकारों ने इस अवधि को क्रांति काल कहा है। विद्वानों और इतिहासकारों ने इसमें गहरी दिलचस्पी ली है और इसके कारणों और प्रकृति पर आज भी बहस जारी है। आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक परिवर्तनों के कारण इस दौरान इंग्लैंड का सामाजिक वातावरण बहुत तेजी से बदल रहा था।
इस क्रांति का प्रमुख कारण राजा और संसद के बीच कुछ प्रमुख मुद्दों को लेकर असहमति थी। यह असहमति कराधान, राज्य के विशेषाधिकार, धार्मिक और विदेश नीति को लेकर थी। जेम्स ने अपने शासनकाल में संसद की चार बैठकें बुलाई लेकिन हर बैठक में असमंजस्य बढ़ता गया।
जेम्स प्रथम की विदेश नीति के कारण राजशाही का कर्ज बढ़ गया। राजा ने आय पर अधिक शुल्क लगाया जिसका 1606 में विरोध किया गया। जेम्स स्पेन के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहते थे जबकि उनकी सांसद स्पेन के खिलाफ विद्रोह की मांग कर रही थी। सांसद को राजा के मंत्रियों पर विश्वास नहीं था और सांसद ने उन्हें शाही आर्थिक सहायता देने में भी अड़चनें पैदा की। संसद ने राज्य के गंभीर मामलों में हस्तक्षेप करने और राज्य की नीतियों पर परामर्श करने के अधिकार की मांग शुरू कर दी, जो राजा को मंजूर नहीं था। 1624 में इंग्लैंड की विदेश नीति असफल रही जिसने जेम्स और संसद के बीच के संबंध में दरार पैदा की।
चार्ल्स प्रथम के शासनकाल में राजा और संसद के बीच का संबंध टूट गया। राजा उन लोगों के सलाह पर काम करता था जो संसद द्वारा पसंद नहीं किए जाते थे और उनका शासन ऐसा था जिनका विरोध संसद का हर एक वर्ग कर रहा था। चार्ल्स फ्रांस और डेनमार्क की सहायता से स्पेन के खिलाफ युद्ध करना चाहता था जिसके लिए उसे धन की आवश्यकता थी। संसद ने जो राशि दी वह मांगी गई राशि का सातवां हिस्सा था। संसद ने राजा के नजदीकी सलाहकार की जबरदस्त आलोचना की। परिणामस्वरूप चार्ल्स ने गुस्से में आकर संसद भंग कर दी।
चार्ल्स ने जबरन ऋण लाद दिया और जब मुख्य न्यायाधीश ने इसकी वैधता की पुष्टि करने से मना किया तो राजा ने उसे बर्खास्त कर दिया। 76 लोगों ने जबरन ऋण देने से इनकार किया। ऐसा करने पर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप मशहूर फाइव नाइट्स केस (1626) हुआ जिसमें राजा के दरबार में उनकी गिरफ्तारी को वैध बताया। दूसरी महत्वपूर्ण घटना संसद द्वारा 1628 में पिटीशन ऑफ राइट पारित करना था। इसके द्वारा मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई।
चार्ल्स के समय चर्च संबंधी उठाए गए कदम झगड़े का कारण बन गए। प्युरिटंस आर्मीनियंस के विरोधी थे। आर्मीनियंस प्रोटेस्टेंटवादियों की एक शाखा थी जिसे चार्ल्स प्रथम का संरक्षण प्राप्त था। उनके विचार भिन्न थे और पूजा को लेकर उनमें झगड़ा था। आर्मीनियंस इंग्लैंड के चर्च पर शाही सत्ता देखना चाहते थे क्योंकि वे उन पर आश्रित थे। उनके विचार निरंकुशतावाद के पक्ष में थे जबकि प्युरिटंस इस विचार के विरोधी थे। 1633 में आर्मेनियंस को इंग्लैंड का धर्माधिपति बना दिया गया जिसे प्युरिटंस संदेह की दृष्टि से देखते थे।
इन सभी मुद्दों के कारण चार्ल्स ने 1640 में संसद का एक सत्र बुलाया। इसे इतिहासकारों द्वारा "दीर्घ संसद" कहा जाता है। इसके सदस्य ने जोर दिया कि इसके पहले कि संसद अपना कार्य पुनः आरंभ करें और इंग्लैंड के संविधान और राजा और संसद के बीच संबंधों को पुनपरिभाषित किया जाए। संसद ने यह भी निर्णय लिया कि गैर-संसदीय शासन करने के लिए जिम्मेदार मंत्रियों को दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन 1641 में आयरलैंड में एक बड़ा विद्रोह हुआ। जिसने इंग्लैंड के शासक और संसद के बीच नया मनमुटाव पैदा कर दिया।
चार्ल्स ने 4 जनवरी 1642 को संसद पर हमला कर दिया और पांच नेताओं को गिरफ्तार करने का निर्णय किया। नतीजतन ग्रहयुद्ध छिड़ गया। इसकी परिणति चार्ल्स प्रथम की पराजय और 1649 में उसकी फांसी के रूप में हुई। 1660 का समय इंग्लैंड में पुनर्स्थापना का समय था। इस दौरान स्टुअर्ट शासकों के शासनकाल में इंग्लैंड में जिस प्रकार की निरंकुशता देखी गई, वह गृहयुद्ध के दौरान समाप्त हुई। दो दशको की जबरदस्त राजनीतिक उठापटक के बाद इंग्लैंड राजतंत्र के पुराने रूप में वापस लौटा था।
पुनस्थापना के बाद जेम्स द्वितीय ने धर्म के प्रति अड़ियल रुख अपनाया। जेम्स ने कैथोलिक और भिन्न मतावलंबियों के खिलाफ दंड संबंधी कानून को निरस्त कर दिया। उन्होंने धर्म और अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर मामूली लोगों की नियुक्तियां की। इसे निरंकुशता को पुनः बहाल करने के रूप में देखा गया। जिसके विरुद्ध व्यापक प्रतिक्रिया हुई। धार्मिक परिवर्तन लाने के तरीके से स्थिति में तेजी से बदलाव आया और 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति हुई।
आगे चलकर रानी को लड़का पैदा होने से संकट और गहरा गया क्योंकि लोगों को डर हो गया की एक और कैथोलिक उत्तराधिकारी आ गया। इसका जोरदार विरोध हुआ। संसद ने इसके समाधान में जेम्स द्वितीय की प्रोटेस्टेंट बेटी मेरी और उसके पति विलियम को इंग्लैंड में धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता बहाल करने और उनका शासक बनने के लिए अपनी सेना के साथ आने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जेम्स भाग खड़ा हुआ और विलियम ने रक्तहीन तख्तापलट में इंग्लैंड की गद्दी संभाली।
संसद ने विलियम और मेरी को इंग्लैंड का संयुक्त शासक बनाया। यह घटना गौरवपूर्ण क्रांति के नाम से जानी जाती है। इसे गौरवपूर्ण क्रांति इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें कोई खून खराबा नहीं हुआ और आधी सदी से चल रहे संघर्ष का अंत हुआ। इसके बाद संसद द्वारा अनेक अधिनियम पारित किए गए और ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर संविधान में व्यवस्थाएं की गई ताकि पुनस्थापन व्यवस्था की कमियों को दूर किया जा सके। गृहयुद्ध का खतरा टल गया क्योंकि नई व्यवस्था में संसदीय विशेषाधिकार की सफलतापूर्वक रक्षा की गई थी।
इंग्लैंड की क्रांति के बारे में इतिहासकारों ने अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे यूरोपीय समाज में सामंतवाद से पूंजीवाद दिशा में पहला बड़ा परिवर्तन माना है। इ.जे. हाब्सबाम और मॉरिस डॉब इसे ऐसी क्रांति बताते हैं जिसका लक्ष्य इंग्लैंड में सामंती ढांचे को नष्ट करना और इसके स्थान पर पूंजीवादी व्यवस्था का निर्माण करना था।
"क्रिस्टोफर हिल" के अनुसार इंग्लैंड की क्रांति 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के समान ही एक महान सामाजिक आंदोलन खासतौर पर बुर्जुआ क्रांति थी। उनके अनुसार इसमें चर्च और रूढ़िवादी जमीदारों जैसी प्रतिक्रियावादी ताकतों ने चार्ल्स की निरंकुशता का पक्ष लिया, वही भद्र लोगों बड़े किसानों, व्यापारियों और निर्माता वर्गो आदि जैसी प्रगतिशील ताकतों ने संसद का समर्थन किया। उनके अनुसार मध्य वर्ग ने गृह युद्ध को क्रांति में बदल दिया। इसी प्रकार ट्वर रोपर, लॉरेंस स्टोन जैसे अनेक जाने-माने लेखकों ने इसकी व्याख्या प्रस्तुत की है जिन्हें इंग्लैंड की क्रांति के सामाजिक व्याख्या कहा जाता है।
निष्कर्ष:- धर्म, कर और राजाओं की बढ़ती शक्तियों के मुद्दे यूरोप के सभी राज्यों में समान थे लेकिन इंग्लैंड में इसने संवैधानिक संघर्ष का रूप ले लिया। यह मुख्य रूप से संसद के संस्थाओं के रूप में अभ्युदय के कारण हुआ जिसे जन समर्थन प्राप्त था। संघर्ष का वास्तविक कारण इंग्लैंड के समाज का पूंजीवादी दिशा में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन था। इस क्रांति ने इंग्लैंड के सांसद को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया और साथ ही इंग्लैंड के शासक को जनता की कठिनाइयों से परिचित करवाया। इसके बाद शासक ने धर्म के प्रति उदार नीतियों का पालन किया।

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