मार्टिन लूथर किंग JR.

चित्र
मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

ब्रिटिश भारत में उपयोगितावादी विचारधारा और विस्तार

उपयोगितावादी विचारधारा:- उपयोगितावाद वह दार्शनिक सिद्धांत था जिसका विकास "जेरेमीं बेंथम" ने किया था। इसमें उपयोग की व्याख्या सुख या प्रसन्नता और हर उस चीज के रूप में की गई थी जो मानसिक संतोष देती हो। सुख के इन सिद्धांतों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों की पूर्ति या उनके उल्लंघन और जीवन की गुणवत्ता जैसे कई सरोकारों को नजरअंदाज किया गया था जो उपयोगिता के दायरे में नहीं आते थे। उन्होंने उपयोगिताओं के कुछ योग पर जोर दिया और उपयोगिताओं के वास्तविक वितरण के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। उनका जोर औसतन उपयोगिता पर या हर किसी के सुख को एक साथ मिलाने पर था। वे इस बात पर जोर देते थे -सबसे ज्यादा लोगों की सबसे ज्यादा खुशी।
"कई उपयोगितावादी विचारको का भारतीय मामलों से नजदीकी संबंध था। इसमें सबसे महत्वपूर्ण था जेम्स मिल और उसका बेटा जॉन स्टूअर्ट मिल। ये दोनों ईस्ट इंडिया कंपनी संस्थापक के अंग थे। जेम्स मिल प्राच्यवादियों के विपरीत प्राचीन भारतीय सभ्यता और समाज का गहरा आलोचक था। उसने भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि के विचार की धज्जियां उड़ाई, जिसे विलियम जॉन्स जैसे विद्वानों की कल्पनाशक्ति ने फैला रखा था।
जेम्स मिल ने 1817 में "हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया" प्रकाशित की। यह एक विस्तृत कृति थी जो तीन भागों में विभक्त थी: हिंदू सभ्यता, मुस्लिम सभ्यता और ब्रिटिश काल। जेम्स मिल की दृष्टि में संस्कृति का असली महत्व इस बात में नहीं था कि बुद्धिवाद और व्यक्तिवात को आगे बढ़ाने में उसने कितना योगदान दिया। हिंदू सभ्यता में इसमें से उसे कोई भी खूबी दिखाई नहीं पड़ी और इसलिए उसने उसकी कड़ी निंदा की। वह वैसी रियायतें देने को तैयार नहीं था जैसे प्राच्यविदों ने दी थी और दे रहे थे।
उसका विचार था कि अपने उद्भव काल से अंग्रेजों के आने से पूर्व तक भारत मूल्यत: अपरिवर्तित रहा है। इसके अलावा उसका यह भी मानना था कि भारतीय समाज को राजनीतिक मूल्यों की कोई खास परवाह नहीं थी, क्योंकि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तक भारत के जनमानस पर एक के बाद एक निरंकुश और अत्याचारी राजाओं का शासन रहा। मिल इस उपयोगितावादी सिद्धांत में विश्वास करता था कि कानून बनाकर समाज को बदला जा सकता है। भारत के संदर्भ में इस मान्यता का मतलब यह था कि ब्रिटिश प्रशासन कानून बनाकर भारत को आज से प्रगतिवादी और गतिशील समाज में बदल सकते हैं।
यहां परंपरा और प्रगति को उपयोगितावादी अर्थ में परिभाषित किया गया। जेम्स मिल के प्रयासों के कारण 1833 में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में एक विधि आयोग बनाया गया, जिसने 1835 में एक भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) तैयार की। 1835 में तैयार भारतीय दंड संहिता 1860 के बाद ही कानून का रूप ले सका। नए कानूनों की जड़ें भारत के समाजिक व्यवस्था में बिल्कुल नहीं थी, और उन्हें जबरन थोपा गया माना जाएगा, इस बात की मिल को कोई खास परवाह नहीं थी। मिल ब्रिटेन के संदर्भ में आमूल परिवर्तनवादी थे, और इस काल की कुछ अन्य आमूल परिवर्तनवादियों की तरह उनमें भी भारत की रूढ़िवादिता और पिछड़ेपन को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने की प्रवृत्ति थी।
ब्रिटेन में आमूल- परिवर्तनवादी रेडिकल समझे जाने वाले यह उपयोगितावाद विचारक भारत के संदर्भ में कठोर शासन के समर्थकों में से थे। वे राज्य की भूमिका केवल व्यक्तियों के अधिकारों और उनकी निजी संपत्ति की रक्षा करने तक सीमित मानते थे। उपयोगितावादियों ने शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया। वे चाहते थे कि सर्वोपरि संस्था व्यवस्थापिका हो और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका उसकी इच्छा को मात्र लागू करनेवाले हो।
वास्तव में उपयोगितावादी विचारों का यह विचार औपनिवेशिक संस्थापना के अनुरूप बैठता था कि सरकार का लक्ष्य सुख में निहित है न कि स्वतंत्रता में और सुख को प्रोत्साहन केवल व्यक्ति के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा से मिलता है।
यह उस सिद्धांत में अभिव्यक्त होता था कि स्वराज के स्थान पर अच्छी सरकार और कानून बेहतर है। "शेखर बंदोपाध्याय" के अनुसार यह नीति उस "प्राच्य निरंकुशता के प्रति, जिससे भारतीय को मुक्त कराना आवश्यक था, एक सुसंगत घृणा से पैदा हुई। यह निरंकुशता एक ऐसी चीज थी जो पूर्वी राज्यों को यूरोपीय राज्यों से अलग और हीन बताती थी। लेकिन विडंबना यह है कि इसी तर्क ने 'औपनिवेशिक राज्य की पितावृत्ति' को एक निहित औचित्य प्रदान किया। "वास्तव में लॉर्ड वेलेजली द्वारा फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना का मकसद स्वतंत्रता के उन विचारों को भारत में फैलने से रोकना भी था, जिसकी प्रेरणा फ्रांसीसी क्रांति ने दी थी। यह रूढ़िवाद जिस के प्रतिपादक ऐडमंड वर्क थे, जैकोबिनवाद के खतरे से दो-चार हो रहे, इंग्लैंड के घरेलू राजनीति से भी संबंधित था।
एरिक स्टॉक ने अपनी पुस्तक "इंग्लिश यूटिलिटेरियंस इन इंडिया" में दिखाया है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत के प्रशासन में दो स्पष्ट प्रवृतियां धीरे-धीरे उभर रही थी। एक और तो प्राच्यवाद पर आधारित लॉर्ड कॉर्नवालिस की व्यवस्था थी जो बंगाल में मुख्यतः स्थाई बंदोबस्त पर आधारित थी। लॉर्ड कॉर्नवालिस ने इस बंदोबस्त का आरंभ इस उम्मीद से किया था कि कानून का शासन और निजी संपत्ति का अधिकार व्यक्तिगत उद्यमशीलता को रीति-रिवाजों के बंधन से मुक्त करेंगे और समाज वह अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाएंगे, जबकि दूसरी ओर उपयोगितावाद पर आधारित टॉमस मुनरो की रैयतवाड़ी व्यवस्था थी जिसमें जमीदारों को दरकिनार कर सीधे किसानों से भूमि बंदोबस्त किया गया था। लेकिन इसका मकसद दक्षिण भारत में राजस्व के आधार को व्यापक बनाकर कंपनी के शासन को मजबूत बनाना ही था, यहां ब्रिटिश अफसरों की एक बड़ी संख्या सीधे किसानों से भूमि संबंधी कर वसूला करती थी। लॉर्ड कॉर्नवालिस के विपरीत टॉमस मुनरो, माउंटस्टूअर्ट एलफिंस्टन, जॉन मैल्कम आदि का मानना था कि जमीदार एक परजीवी वर्ग है जो कोई उपयोगी काम नहीं करता।
मुनरो का मानना था कि भारत के कुछ भागों पर अप्रत्यक्ष शासन होना चाहिए हालांकि उसका आग्रह था कि शासन के परंपरागत भारतीय रूप तभी अच्छी तरह काम करेंगे, जबकि उसके जैसे जानकार और हमदर्द लोग भारी और केंद्रीकृत सत्ता के साथ उसको निर्देशित करें। शेखर बंदोपाध्याय के अनुसार एक एकाधिकारवादी पितावृत्ति भारतीयों के प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी के विचार को अस्वीकार करती थी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

18वीं शताब्दी “अंधकार युग”

रोमन इतिहासलेखन परंपरा

उमरा वर्ग /अभिजात वर्ग