मार्टिन लूथर किंग JR.

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मार्टिन लूथर किंग JR. मार्टिन लूथर किंग का जन्म 15 जनवरी, 1929 को  अटलांटा, जॉर्जिया   में हुआ था। किंग ने  पेंसिल्वेनिया  के स्कूल में तीन साल तक पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने अहिंसक विरोध के बारे में सीखा। 15 साल की उम्र में उन्होंने अटलांटा के  मोरहाउस कॉलेज   में दाखिला लिया तथा 1948 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किंग ने 1955 में मैसाचुसेट्स में  बोस्टन विश्वविद्यालय  से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1954 में, किंग  मोंटगोमरी , अलबामा  में एक बैपटिस्ट चर्च के पादरी भी बने। कम उम्र में ही उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि अश्वेत होने से वे गोरों से अलग नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। उन्हें बचपन में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसलिए, उनका एक सपना था कि वे एक दिन बड़े होकर इसे रोकेंगे। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्हें अपने विचारों को दुनिया के सामने व्यक्त करने का अवसर मिला। मार्टिन लूथर किंग को नागरिक अधिकार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी-अमेरिकी नेताओं में से एक माना जाता है। वह अफ्रीकी-अमेरिकिय...

चीन में आसमान संधि प्रणाली

प्रश्न:- चीन में आसमान संधि प्रणाली का विस्तार से वर्णन कीजिए।

परिचय:- चीन से विदेशी ताकतों ने असमान संधि करके अपनी संप्रभुता स्थापित करने तथा चीन की संप्रभुता का उल्लंघन करने का अधिकार प्राप्त कर लिया। इन संधियों के अनुसार विभिन्न बंदरगाहों को खोल दिया गया। अब न केवल विदेशी जहाज आयात- निर्यात व्यापार के लिए चीन में प्रवेश करने लगे, बल्कि विदेशियों ने अपने निवास स्थान चीन में कायम किए, दूतावास और पश्चिमी न्यायालय खोलकर इन स्थानों पर नियंत्रण कर लिया। इन संधियों के जरिए विदेशियों ने वाणिज्य में चुंगी कर और सीमा शुल्क जैसी संस्थाओं को भी अपने नियंत्रण में कर लिया। जिसके जरिए संधिगत बंदरगाहों के द्वारा साम्राज्यवादी शक्तियां चीन पर शासन करने लगी। यह संधियां एकतरफा थी और पश्चिमी सभ्यता की प्रबलता का प्रतीक थी। इसलिए इन्हें आसमान संधियां कहा जाता है। असमान संधियों की शुरुआत चीन की अफीम युद्ध में अपमानजनक हार से हुई।

नानचिंग की संधि:- इस संधि के अनुसार चीन ने विदेशियों के लिए पांच बंदरगाह खोले। वे थे:- कुआंगचोउ, शियामन, फूचोउ, निंगपो और शंघाई। इसके बाद से विदेशियों पर कड़े नियंत्रण की चीनी नीति का अंत हो गया। अफीम युद्ध के साथ शुरू हुई विशेषाधिकारों और रियायतों को प्राप्त करने की प्रक्रिया अंधाधुन आगे बढ़ने लगी।

रॉबिंसन:-का कहना है कि ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी विस्तार में इन संधियों का प्रयोग राजनीतिक हथियार के रूप में किया।

नानचिंग की संधि के बाद "बोग की संधि" (8 अक्टूबर 1843) में सीमा शुल्क पहली बार निश्चित किया गया। अब व्यवहारिक रूप में चीन विदेशी तत्वों के लिए एक उपनिवेश में परिवर्तित हो गया था। ब्रिटेन के साथ हुई संधि को सिर्फ विस्तार में ही नहीं बल्कि कानूनी भाषा में भी रच दिया गया। आगे इस संधि ने बड़े महत्वपूर्ण तरीके से ब्रिटेन के दस्तावेजों की शेषपूर्ति की।

वांगशिया की संधि (1844):- ब्रिटेन का अनुसरण करते हुए अमेरिका और फ्रांस ने भी चीन से उसी प्रकार की संधि के लिए आग्रह किया। परिणामस्वरूप अमेरिका और चीन के बीच 1844 में वांगशिया की संधि हुई। इस संधि के अनुसार विदेशियों को विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए चीनी नौकर रखने का अधिकार बिना चीनी दखलंदाजी के मिल गया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कानून तथा अपनी प्रथा स्थापित करने का अधिकार अमेरिका के बाद अन्य विदेशीयों के लिए भी लागू कर दिया गया। नानचिंग की संधि की तरह वांगशिया की संधि के अनुसार उपरोक्त पांच बंदरगाहों को अमेरिकी व्यापार के लिए खोल दिया गया। साथ ही उन बंदरगाहों पर अस्पताल और चर्च खोलने की इजाजत दे दी गई।

हुआंगफु की चीनी-फ्रांसीसी संधि (1844):- इसी वर्ष फ्रांस ने भी ब्रिटेन और अमेरिका का अनुसरण करते हुए चीन से हुआंगफू की संधि की। फ्रांस का व्यापार ब्रिटेन और अमेरिका की तरह बड़े स्तर पर नहीं फैला था, इसलिए उसने व्यापार के साथ-साथ ईसाई धर्म के प्रचार की भी स्वतंत्रता हासिल की। मांचू सरकार ने प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक धर्म के प्रचार प्रसार को भी मान्यता दे दी। इसके साथ ही व्यापारी वर्ग और धार्मिक प्रचारक दोनों की संख्या चीन में बढ़ने लगी। इस प्रकार से 1842 और 1844 की संधियों के परिणामस्वरूप साम्राज्यवादी देशों ने चीनी सरकार से तरह-तरह की रियायतें प्राप्त की, जिसके फलस्वरूप चीन में साम्राज्यवाद की नींव मजबूत हो गई।

1845 में ब्रिटिश दूतावास ने शंघाई क्षेत्रीय अधिकारी के साथ समझौता किया, जिसके तहत एक क्षेत्र निश्चित किया गया, जहां ब्रिटेन को भूमि क्रय-विक्रय करने का अधिकार प्राप्त हो गया। फ्रांस और अमेरिका ने भी यही रियायतें मांगी। 1854 तक ब्रिटेन ने अपने रियायती क्षेत्र में एक स्वतंत्र राजनीतिक संस्था नगर परिषद बना ली। इस परिषद का अपना बजट था। यह करो का निर्धारण करती थी, एक पुलिस फोर्स रखती थी और स्वयं ही नगर निगम के बहुत सारे कार्य और शहरी निर्माण की प्रक्रिया की देखरेख करती थी। चीनी जब रियायती क्षेत्रों में पहुंचते थे, तो अपनी सरकार के कानूनों और दण्डों से मुक्त हो जाते थे।

थिएनचिन(1858) और पेइचिंग(1860) की संधियां:- किंतु अभी तक की संधियों के जरिए केवल बंदरगाह को ही विदेशियों के लिए खोला गया था। अंत: अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने चीन के विरुद्ध दूसरा युद्ध छेड़ा, जो द्वितीय अफीम युद्ध के नाम से जाना जाता है। परिणामस्वरूप अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के साथ चीन ने थिएनचिन और पेइचिंग की संधियों पर हस्ताक्षर किए। अब पांच पुराने बंदरगाहों के अलावा 11 और बंदरगाह विदेशी व्यापार के लिए खोल दिए गए। इस संधि के पश्चात चीन को पहले से अधिक रियायतें विदेशियों को देनी पड़ी। विदेशी जहाजों को चीन की आंतरिक नदियों में प्रवेश की इजाजत मिल गई। पश्चिमी धर्म प्रचारको तथा व्यापारियों को चीन में भ्रमण और जमीन खरीदने की इजाजत मिल गई। विदेशी वस्तुएं खुलेआम बाजारों में बिकने लगी। चीन के सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक सीमा शुल्क "लिचीन" को समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर सिर्फ 2.5% का टैक्स रखा गया। जो सभी विदेशी वस्तुओं के लिए समान था। 

फ्रांस और ब्रिटेन दोनों देशों को 80 लाख तायलें धन युद्ध के हर्जाने के रूप में दिया गया और साथ ही पेइचिंग में स्थाई दूतावास कायम करने की स्वीकृति भी इन देशों ने प्राप्त की।

येनथाए की चीनी-ब्रिटिश संधि(1876):- 1876 में एक और संधि की गई जो येनथाए की चीनी-ब्रिटिश संधि के नाम से जानी जाती है। इस संधि के जरिए चार और बंदरगाह व्यापार के लिए खोल दिए गए। इस प्रकार कुल मिलाकर संधिगत बंदरगाहों की संख्या 20 हो गई।

जे.के फेयरबैंक:- के अनुसार आसमान संधियां पश्चिमी देशों की कोई नई खोज नहीं थी, बल्कि यह चीन की उस पुराने प्रणाली का ही प्रारूप थी जिसकी जड़ें चीनी सरकार की परंपरागत स्वरूप में मौजूद थी। उनके विचार में संधिगत बंदरगाह चीनी और विदेशियों के मध्य गठबंधन था जिससे दोनों ही फायदा उठा रहे थे।

थान चुंग:- फेयरबैंक के मत से सहमत नहीं है। उनका मानना है कि हालांकि अतीत में भी विदेशी चीनी धरती पर अपना व्यापार करते रहे थे, लेकिन चीनी सरकार पर उनका दबाव नहीं था। अब यह विदेशी बंदूक की नोक पर अपनी शर्तें मंनवाते थे।

संधिगत बंदरगाह पर व्यापार का नियंत्रण विदेशी हाथों में चला गया और सभी व्यापारी जहाज उन्हीं के थे। समुद्री किनारों पर परिवहन और संचार व्यवस्था भी उनके नियंत्रण में चली गई। चीन की बैंक प्रणाली भी विदेशी हाथों में चली गई। विदेशी बैंक कागजी मुद्राओं का प्रयोग करने लगे और संधिगत बंदरगाहों पर उन्ही मुद्राओं का प्रचलन था। इस तरह विदेशियों ने चीन की अर्थव्यवस्था पर पूरा नियंत्रण कर लिया। जमीदारों और सूदखोर व्यापारियों के सहायता से विदेशियों ने चीन के वाणिज्यक और आर्थिक जीवन पर भी अपना अधिकार स्थापित किया। उन्होंने चीन के 80-90% भारी उद्योगों, परिवहन एवं संचार और वस्तु बाजार पर नियंत्रण कर लिया। 1891 में 30 से भी अधिक विदेशी कंपनियां संधिगत बंदरगाहों के बीच सामान ढोने का काम करवा रही थी, अर्थात 70% परिवहन उनके हाथ में थे। उनकी सेनाओं की टुकड़ियां चीन के छोटे बड़े शहरों में फैल चुकी थी। यहां तक की राजधानी पेइचिंग में भी।

संधिगत बंदरगाह प्रथा की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी। इसके अनुसार विदेशी अपने दूतावास के न्याय के प्रभुत्व के सामने ही प्रस्तुत किए जा सकते थे। दूसरे, चीनी नागरिकों को रियायती क्षेत्र में बसने की अधिकार नहीं था। सिर्फ विदेशियों के नौकर के रूप में ही वे वहां रह सकते थे। विदेशियों ने चीन के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी की। चीनी सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाले लोग उनकी शरण में आ जाते थे और वे उनका बचाव करते थे। उन क्षेत्रों में विदेशी कानून लागू होते थे, अतएव चीनी सरकार उनको सजा नहीं दे सकती थी। इसाई मिशनरी को भी यहां ईसाई बन चुके और गैर ईसाई चीनियों के बीच के झगड़ों का निपटारा करने का अधिकार था।

निष्कर्ष:- संधिगत बंदरगाह पश्चिमी साम्राज्यवाद की आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक सर्वोच्चता दर्शाते हैं। इनके जरिए पश्चिमी देशों ने न केवल चीन का शोषण किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उद्योगों को बढ़ावा दिया। असमान संधियों के सहारे पश्चिमी देश चीन पर शासन करने लगे। "माइकल एडवर्डज" के शब्दों में चीन बिना विजित हुए ही साम्राज्यवाद का शिकार हो गया।

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