पौराणिक धार्मिक परंपरा ( 300 ई• पू• से 700 ई• तक)
पौराणिक धार्मिक परंपरा ( 300 ई• पू• से 700 ई• तक)
भारतीय हिन्दू धर्म संसार के अन्य सभी धर्मों से भिन्न है। इसमें विविध प्रकार की आस्थाएँ, धार्मिक व्यवहार, संप्रदाय और धार्मिक परंपराएं मौजूद है। 200 ई• पू• से 300 ई• के बीच सर्वोच्च देवी-देवता की अवधारणा विकसित हुई, जिनकी प्रतिमाएं मंदिरों में स्थापित की गई। इस काल में शिव और विष्णु से जुड़े संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुए जिन्होंने देवी देवताओं को सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्वीकार किया। पुराणों में त्रिदेव के रूप में ब्रह्म, विष्णु और महेश की अवधारणा का विकास हुआ। ब्रह्म सृष्टि के रचयिता, विष्णु संसार के पालनकरता तथा शिव संसार के संहारकरता के रूप में स्थापित होने लगे। तीनों देवताओं के गुण को मिश्रित करके बहुदेवाद को एकदेववाद का रूप दिया गया। एक देवता को समर्पित मंदिर में अन्य देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी। जिसमें अन्य देवताओं द्वारा सर्वोच्च देवता को स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
इस काल में विभिन्न धार्मिक संप्रदाय के प्रतीक चिह्न मुहरो पर अंकित किए गए। उदाहरण के लिए लिंग, त्रिशूल, नंदी, बैल, ग़ज़लक्ष्मी, संख, चक्र इत्यादि। गुप्त शासक स्वयं को भागवत अर्थात् वासुदेव कृष्ण के उपासक मानते थे। वाकाटक शासको ने भी स्वयं को शिव और विष्णु का उपासक बताया।
शैव धर्म
शिव से संबंधित धर्म को शैव धर्म कहा गया और उनके अनुयायियों को शैव। पुराणों में उन्हें देवो में श्रेष्ठ महादेव कहा गया है। गुप्त काल में रचित वायु पुराण तथा मत्स्य पुराण में शिव की महिमा तथा पूजा का विस्तृत वर्णन मिलता है। कुमार गुप्त ने अपने सिक्कों पर मयूर पर बैठे कार्तिकेय की प्रतिमा अंकित करवाई जिससे पता चलता है की वह शिव के पुत्र कार्तिकेय का उपासक था। महाभाष्य में रुद्र-शिव विषय में कहा गया है की वे जड़ी- बूटियों से जुड़े देवता है और उनके समक्ष पशुबली दी जाति थी। इसी ग्रंथ में शिव भक्तों की भी चर्चा की गई है जो लोहे के त्रिशूल लेकर मृगछाला धारण करके घूमते थे।
गुप्त काल में शैव धर्म के अनेक संप्रदायों का विकास हुआ। वामन पुराण में इनकी संख्या चार बताई गई है - शैव, पाशुपत, कापालिक और कालामुख। शैव सांप्रदायो में सबसे प्रारंभिक सांप्रदाय पाशुपत माना जाता है जिनमें योगी और संन्यासी का वर्चस्व था। उनके अनुसार मोक्ष ऐसी अवस्था है जिसमें आत्मा का मिलन शिव से होता है और इस अवस्था की प्राप्ति के लिए ईश्वर का आशीर्वाद अनिवार्य है। पाशुपत संप्रदाय में योग क्रिया को काफ़ी महत्व दिया गया है तथा इसके संन्यासी अपने शरीर पर भस्म लपेटते थे।
कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे जो शिव के अवतार माने जाते हैं। यह सांप्रदाय अत्यंत भयंकर और असुर प्रवृत्ति का था। इसमें भैरव को सूरा और नरबली चढ़ाई जाति थी। इस संप्रदाय के लोग सिर पर जुड़ा बाँधना, कानों में हड्डियों की बड़ी बड़ी बालियाँ पहनना, गले में हड्डियों की माला पहनना तथा शमशान में रहते थे। कालामुख संप्रदाय भी भयंकर प्रवृत्ति के थे। नर कपाल में भोजन करना, जल पीना, सुरा पीना तथा मनुष्य के शव का भस्म शरीर पर लगाना तथा अपने मुंह को काला रखते थे।
पुराणों में शिव के बहूआयामी गुणों और रूपों को दर्शाया गया है। जैसे शिव चंद्रशेखर है जिनकी जटाओं में चंद्रमा विराजमान है। शिव गंगाधर है जो गंगा को धारण करता है। शिव वैधनाथ है जो वैधों के देव है। शिव कालसंहारक है जो काल का भी नाश कर देते हैं। शिव पशुपति है जो पशुओं के ईश्वर है, शिव शंकर है जो मंगलकारी है। इनके रूपों में अर्धनारीश्वर विख्यात है जिसे आधा स्त्री और आधा पुरुष दिखलाया गया है। शिव के इन सभी रूपों को प्रतिमाओं में उतारा गया है।
शिव की लोकप्रियता का वर्णन संगम साहित्य में भी मिलता है। अकनानूरू में शिव को तीन नेत्र वाले भगवान के रूप में वर्णित किया गया है जो अर्धचंद्र तथा जटाएं धारण करते हैं। 200 ई•पू• से 200 ई• के बीच लिंग पूजन को शिव की उपासना से जोड़ा गया। रामायण में यह वर्णन मिलता है की रावण रुद्र की पूजा लिंग के रूप में करता था। माहभारत में भी कहा गया है की ऋषियों और देवताओं द्वारा लिंग की पूजा की जाति थी। 300 से 600 ई• में शिव की उपासना की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ी। शिव को गणेश, कार्तिकेय, नंदी और देवी गंगा के साथ जोड़ा गया।
हरिहर के रूप में शिव को विष्णु के साथ दर्शाया गया है जो वैष्णव व शैव धर्म के सामन्वय का परिणाम था। गुप्त काल में हरिहर की अनेक मूर्तियां बनायी गई तथा एक ही मूर्ति के मध्यम से दोनों संप्रदाय के विचारों को व्यक्त किया गया। मूर्ति के दाएँ भाग में शिव के लक्षण थे जैसे जटा और त्रिशूल आदि तथा बाएँ भाग में विष्णु थे जिनके हाथ में शंख और चक्र बनाया गया।
वैष्णव पंथ
वैष्णव उन लोगों को कहते हैं जो विष्णु की पूजा करते हैं। वैष्णव धर्म के देवताओं में नारायण, वासुदेव, कृष्ण शामिल है। वासुदेव कृष्ण की भक्ति का प्रचलन सबसे पहले मथुरा क्षेत्र में शुरू हुआ। विष्णु पुराण, पद्म पुराण तथा भागवत पुराण में वृंदावन में बिताए गए कृष्ण की जीवन की घटनाओं का वर्णन किया गया है।
प्रथम शताब्दी मथुरा में वैष्णव प्रतिमाओं का बड़ी संख्या में निर्माण किया गया। जिसमें सबसे ज़्यादा प्रतिमाएं वासुदेव कृष्ण की थी। इसके आलवा विष्णु की गारूड़ पर सवार तथा वराह रूप में प्रतिमाएं भी बड़ी संख्या में बनायी गई। चौथी शताब्दी ई• पू• में मेगस्थनीज़ ने मथुरा में श्रीकृष्ण की पूजा का वर्णन किया है। इसके अलावा झाँसी के देवगढ़ में स्थित दशावतार मंदिर की दीवार पर वासुदेव कृष्ण, नरसिंह और वामन अवतार से जुड़ी गाथाओं को चित्रित किया गया है। विद्वान सुवीरा जैसवाल के अनुसार वैष्णव धर्म गुप्त काल में भारत के प्रत्येक प्रांत में फैला तथा दक्षिण पूर्व एशिया, कंबोडिया और इंडोनेशिया तक इसका प्रचार हुआ।
तिसरी तथा चौथी शताब्दी में लक्ष्मी को विष्णु की पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया। लक्ष्मी का ग़ज़ालक्ष्मी स्वरूप सब से लोकप्रिय था। इसमें वह कमल के आसान पर बैठी है और दो गजो द्वार कलश से उनपर जल छिड़काव किया जा रहा है। संगम साहित्य पत्तुपाटु में वर्णन किया गया है की घर के दरवाज़े पर लक्ष्मी के रूप को बनाया जाता था। जिससे पता चलता है की दक्षिण भारत में भी यह समृद्धि और मंगलकारी देवी के रूप में लोकप्रिय थी।
अवतारवाद वैष्णव पंथ का महत्वपूर्ण अंग था। इसका तात्पर्य विष्णु के अवतार से है जो धर्म की रक्षा तथा अधर्म के विनाश के लिए अवतार लेते हैं। वायु पूराण में नारायण, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण और कल्कि के अवतार के बारे में बताया गया है। मथुरा से प्राप्त प्रतिमाएं अवतारवाद की पुष्टि करती है।
वैष्णव परंपराओ में पंचरात्र, वैखानस तथा संकर्षण संप्रदाय का महत्वपूर्ण स्थान है। पंचरात्र तथा वैखानस संप्रदाय में विष्णु की भक्ति के साथ साथ संन्यास, योग, अहिंसा और कर्मकांड में पशुवध निषेध पर विशेष बाल दिया गया है। संकर्षण सांप्रदाय कृष्ण के बड़े भाई बलराम से जुड़ा संप्रदाय था। इनको सर्प पूजन से जोड़ा गया क्योंकि महाभारत में संकर्षण को शेषनाग का अवतार माना गया है जिसकी शैया पर विष्णु विराजमान है। संकर्षण को कृषि से जुड़े देवता भी माना गया है क्योंकि इनका दूसरा अर्थ हाल चलना है। विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में कहा गया है की संकर्षण बलराम ने अपनी हल के द्वार यमुना की धारा की दिशा को बदल दिया था।
शक्ति की उपासना
पुराणों में देवीयों का उग्रस्वरूप दिखाया गया है। इन देवीयों को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है जैसे आर्या, नारायणी, रात्रि, श्री, कातयायनी और कौशिकी। इन देवियों को नादियों से, गुफाओं से, जंगलों से, पशुओं आदि से जोड़ा गया है। कई बार इन्हें मदिरा, मांस और बलि से प्रसन्न होने वाली देवीयों के रूप में दिखाया गया है। इनकी पूजा विभिन्न प्रकार के संकटों से उबारने वाली के रूप में की जाति थी।
200 ई• पू• से 300 ई• के बीच मथुरा में दुर्गा की कई प्रतिमाएं स्थापित की गई जिसमें महिषासुरमर्दिनी सबसे लोकप्रिय था। मार्कण्डेय पुराण में उन्हें महिषासुर, रक्तबीज़, शुंभ और निशुंभ, चंड और मुंड जैसे राक्षसो की संहारकर्ता के रूप में वर्णित किया गया है। लक्ष्मी की पूजा भी गुप्त काल में अत्यधिक प्रचलित थी। वे धन, ऐश्वर्य एवं समृद्धि की देवी माने जाने लगी।
कुछ अतिवादी मनुष्य बलि द्वार देवी को प्रसन्न करने में भी विश्वास रखते थे। कहा जाता है की चीनी यात्री हूनात्सांग दुर्गा की मूर्ति के सामने अग्नि में समर्पित किया जाने वाला था की उसी समय एक तूफ़ान आ गया जिसका वजह से वह बच गया।
अन्य देवी देवता
ब्रह्म पुराण में ब्रह्मा का वर्णन किया गया है। अन्य देवी देवताओं की तुलना में ब्रह्मा की प्रतिमाएं संख्या में कम है। सामान्य रूप से इनके तीन मुखों को दिखलाया गया है तथा इनका वाहन हंस है।
भविष्य, साम्ब, वराह पुराण में सूर्या की उपासना की जानकारी मिलती है। इनमें
दिखाया गया है की सूर्य एक महानतम देवता है तथा अन्य सभी देवता उन्हीं से प्रकट हुए हैं।
गणेश को एक उदार और गजमुख वाले देवता के रूप में दिखाया गया है जिसकी लोकप्रियता इस काल में काफ़ी बढ़ी। गणेश अपने भक्तों को उनके कार्य में सफलता दिलाते हैं और उनके मार्ग में आ रही बाधाओं को दूर करते हैं। गुप्त काल में उनकी प्रतिमाओं को बैठा हुआ, खड़े मुद्रा में तथा नृत्य करते हुए दिखाया गया है।
निष्कर्ष: 200 ई.पू. से 600 ईस्वी के मध्य भारतीय हिंदू धर्म में भक्ति और अवतारवाद का उदय हुआ। इस काल में शिव, विष्णु और शक्ति को सर्वोच्च सत्ता मानकर विभिन्न संप्रदायों का विकास हुआ। पुराणों ने त्रिदेव की अवधारणा और मूर्ति पूजा को सुदृढ़ किया, जिससे मंदिरों का महत्व बढ़ा। जहाँ शैव धर्म में पाशुपत और कापालिक जैसे विविध रूप उभरे, वहीं वैष्णव धर्म में 'अवतारवाद' और 'हरिहर' की संकल्पना लोकप्रिय हुई। अंततः यह युग बहुदेववाद को एकदेववाद में पिरोने और धार्मिक प्रतीकों, कर्मकांडों तथा कला के माध्यम से धर्म को जन-जन तक पहुँचाने का साक्षी बना।
Bibliography
Upinder Singh: प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास
D.N. Jha: प्राचीन भारत का इतिहास
R.S Sharma: प्रारंभिक भारत का परिचय
IGNOU:- प्राचीनतम काल से 300 ई• तक
Kaluram Sharma and Prakash Vyas :- भारत के सांस्कृतिक इतिहास की मुख्य प्रवृतियाँ
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