संगम साहित्य
संगम साहित्य
तमिल साहित्य को संगम साहित्य कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना संगम कवियों द्वारा की गई। संगम विद्वानों की एक संस्था थी। इन ग्रंथों से हमें तमिल संस्कृति, इतिहास और जीवन शैली की जानकारी मिलती है। तमिल इतिहास में तीन संगम हुए है जिसमें लगभग 8,598 कवियों ने भाग लिया। मदुरै में हुए संगम को प्रमुख संगम माना जाता है तथा पाण्डेय राजाओं द्वारा इसे संरक्षण प्रदान किया गया। इसमें प्रमुख रूप से तीन राज्यों चेर, चोल और पाण्डेय के इतिहास की जानकारी मिलती है। संगम कवियों द्वारा राजा (अरशर) ,व्यवसायी (वेश्यार) , किसान (वेलालर) शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कई नगरों का उल्लेख है जैसे कांची, कोरकई, मदुरै, पुहार और उरैयूर।
संगम कविताओं में युद्धों की गाथाएँ कूट कूट कर भरी हुई है। वीरगति को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। माना जाता था की वीरगति प्राप्त योद्धा को स्वर्ग में स्थान मिलता है। पुरनानूरु की एक कविता में बताया गया है कि यदि किसी योद्धा की मृत्यु युद्ध के मैदान में नहीं हुई हो तो अंतिम क्रिया के पहले उसके शरीर को तलवार से काट दिया जाता था। वतकिरुतल के अनुसार पराजित राजा अपने जीवनकाल के अंतिम समय में आनुष्ठानिक (उपवास के द्वारा) आत्महत्या करते थे।
प्रशासनिक व्यवस्था
इस युग में वंशानुगत राजतंत्र का प्रचलन था। उत्तराधिकार के लिए युद्ध होते थे। राजा सर्वशक्तिमान होता था। राजा को कला, साहित्य और धर्म का संरक्षक माना जाता था। राजा का आदर्श कर्तव्य था प्रजा को संतान रूप में मानना तथा पक्षपात रहित होकर शासन करना। राजा प्रतिदिन अपनी सभा में प्रजा के कष्टों को सुनता था और न्यायकार्य सम्पन्न करता था। राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा थी जिसे मनरम कहा जाता था।
राजा अपने राजकार्य के संचालन में ब्राह्मणों की सहायता लेता था। ब्राह्मणों को राजा और शाही कुलीनों का संरक्षण प्राप्त था। ब्राह्मणों द्वारा युद्धभूमि में विजय सुनिश्चित करने के लिए यज्ञ किए जाते थे। जिससे दरबारों में ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा स्थापित हो गई थी। राजाओं द्वारा ब्राह्मणों को स्वर्ण मुद्राएँ, भूमि, हाथी-घोड़े तथा रथ दान में दिए जाते थे। विद्वान राजन गुरुकल के अनुसार ब्राह्मणों को दिए जाने वाले भूमि अनुदानों ने आगे चलकर जाति व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हुआ।
राजा पेशेवर सैनिक रखते थे। सेना के कप्तान की उपाधि एनाड़ी थी। सैनिकों के आह्वान के लिए नगाड़े तथा शंख की आवाज़ का प्रयोग किया जाता था। सड़कों पर सैनिक पेहरा देते थे। राजा के आवास पर सशस्त्र महिलाएँ रक्षक के रूप में रहती थी। युद्ध में मृत सैनिकों की पत्थर की मूर्तियां बनायी जाती थी।
सामाजिक व्यवस्था
तमिल समाज में जाति व्यवस्था मौजूद नहीं थी। सामाजिक विभाजन का आधार कुटी था। यह वंशानुगत रिश्तों और पैतृक पेशे से जुड़े लोगो का समूह था। संगम रचनाओं में कृषि में संलग्न लोगों को वेलालर कहा गया है। उनके प्रमुखों को वेलीर कहा जाता था। वेलीर कृषि भूमि के बढ़े भाग के स्वामी थे। वेलालर दो वर्गों में विभाजित था - एक ज़मींदार तथा दूसरा भूमिहीन खेतिहर मज़दूर वर्ग। धनी वेलालर की नियुक्ति राज्य के ऊँचे पदों पर होती थी। यह सैनिकों के रूप में कार्य करते थे तथा युद्ध और शिकार में राज्यों के साथ जाते थे। इसके अलावा राजपरिवारों से इनके वैवाहिक संबंध होते थे।
समाज में अनेक व्यावसायिक वर्ग मौजूद थे। पुलैयन नामक समूह के लोग रस्सी की चारपाई बनाते थे। चरवाहा वर्ग बिक्री के लिए प्रचुर मात्रा में दही तथा घी तैयार करते थे। एनियर शिकारियों के जाति थी जो अपने घरों में बड़ी संख्या में धनुष तथा ढाल रखते थे। इसके अलावा परियन, तुतियन, पानन और वेलन समूहों द्वारा चमत्कारिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान किए जाते थे। यह समूह गान, नृत्य, चिता की अग्नि की सहायता से पूजा उपासना करते थे।
समाज में आर्थिक वर्गीकरण मौजूद था। धनी लोग ईंट तथा गारे के पक्के मकानों में रहते थे। नगरों में धनी लोग उपरी मंज़िल में रहते थे और नीचे का भाग व्यापार के प्रयोग में आता था। निर्धन लोगों के घर कच्चे होते थे तथा जंगली जातियाँ झोपड़ियों में जीवन निर्वाह करती थी।
महिलाएँ - औरतें पशुपालन, दुग्ध उत्पादन तथा सूत काटना के कार्यों में शामिल थी। इतिहासकार विजया रामास्वामी के अनुसार साहित्य में औरतों द्वारा धान बोने और कृषि कार्य किए जाने का वर्णन शामिल है। छोटी बच्चियां पक्षी और जानवरों से खेतों की रखवाली करती थी। संगम ग्रंथों में सूत काटने वाली स्त्रियों को परूट्टी पेंटूकल कहा जाता था।
मछुआरिन औरते मछली पकड़ने, मछली बेचने, मछली का तेल निकालने का कार्य करती थी। अकनानूरू से पता चलता है कि समुद्र किनारे रहने वाली स्त्रियां खेतिहर स्त्रियों के साथ नमक के बदले धान का विनिमय करती थी। इनके अन्य कार्य भी थे जैसे शराब बनाना और उनको बेचना, माला गूँथना तथा फल बेचना। इसके अलावा महिलाओं को संतानोत्पत्ति के बाद लंबे समय तक अपवित्र माना जाता था और विधवाओं को अशुभ और अहितकारी मानते थे।
आर्थिक जीवन
तमिल राज्यों का मिस्र, अरब तथा चीन के साथ प्राचीन काल से ही व्यापारिक संबंध थे। कृषि तथा व्यापार राज्य की आय के मुख्य साधन थे। विदेशी व्यापार से सीमा शुल्क तथा आंतरिक व्यापार से चुंगी ली जाती थी। ग़ैरक़ानूनी व्यापार को रोकने के लिए सड़कों पर सैनिकों की तैनाती की जाती थी। युद्धों में लूट की सामग्री भी आय का एक स्रोत थी।
संगम साहित्य के अनुसार दक्षिण भारत की भूमि बहूत उपजाऊ थी। चेर (केरल) राज्य कटहल, काली मिर्च तथा हल्दी के लिए प्रसिद्ध था। चोल राज्य में कावेरी के जल का प्रयोग सिंचाई के लिए होता था। संगम कविताओं में गन्ने के उत्पादन तथा गन्ने से शकर बनाने का वर्णन मिलता है।
आंतरिक तथा विदेशी व्यापार विकसित था। बड़े बंदरगाह वाले नगर व्यापारिक केन्द्र थे। पुहार बंदरगाह सबसे लोकप्रिय था। विदेशी व्यापार के कारण यहाँ के लोग बहु धनी हो गए। इस नगर में अनेक ऊँचे तथा भव्य भवन थे। यह भवन कई मंज़िल वाले थे जिनमें अनेक कमरे थे। इन भवनों में ऊपर व्यापारियों का परिवार रहता था और नीचे की मंज़िल का उपयोग व्यापार के लिए होता था।
संगम साहित्य के अनुसार थालियार पाण्डेय तथा बंदर चेर राज्य के महत्वपूर्ण बंदरगाह थे। जहाज़ों को संकेत देने के लिए जलदीपो की स्थापना की गई थी। पाण्डेय तथा अन्य राज्यों में विदेशी घोड़ों का आयात किया जाता था। तोंडी, मुशिरी तथा पुहार नगरो में यवन (ग्रीक) बड़ी संख्या में मौजूद थे। यह लोग अपने साथ शराब, चित्रित दीपक तथा सोना भरकर लाते थे जिसकी माँग धनी परिवारों में अधिक थी।
आंतरिक व्यापार भी विकसित था। अधिकांश आंतरिक व्यापार विनिमय द्वारा होता था। पशु, जड़ी- बूटी, मछली के तेल, ताड़ी, गन्ना आदि सामानों के विनिमय का उल्लेख साहित्य से मिलता है। उरैयूर सूती कपड़ों का प्रमुख केंद्र था।
निष्कर्षत: संगम साहित्य से हमें तमिल संस्कृति, समाज, राजनीति, और अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी मिलती है। यह साहित्य तमिल इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें वर्णित जीवन शैली, व्यापार, और सामाजिक व्यवस्था उस समय के तमिल समाज की झलक प्रस्तुत करती है।
Bibliography
Upinder Singh:- प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास
D.N Jha :- प्राचीन भारत का इतिहास
R. S Sharma :- प्रारंभिक भारत का परिचय
IGNOU :- प्राचीन काल से 300 ई॰ तक
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