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मुगल काल में संस्कृत

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  मुगल काल में संस्कृत मुग़ल साम्राज्य के इतिहास को आमतौर पर फ़ारसी ग्रंथों जैसे अकबरनामा, आइन-ए-अकबरी और पादशाहनामा के ज़रिए पढ़ा जाता है। चूँकि फ़ारसी प्रशासन की सरकारी भाषा थी, इसलिए लंबे समय तक इतिहासकार यह मानते रहे कि मुग़ल राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन को केवल फ़ारसी स्रोतों से ही समझा जा सकता है। लेकिन आधुनिक इतिहासकारों ने इस सीमित नज़रिए को चुनौती दी है और मुग़ल भारत के इतिहास को समझने में संस्कृत तथा स्थानीय भाषाओं के ग्रंथों के महत्व को उजागर किया है। ऑड्रे ट्रश्के, कुमकुम चटर्जी, डेविड शुलमन, क्रिस्टोफ़र मिन्कोव्स्की और संजय सुब्रह्मण्यम जैसे विद्वानों का तर्क है कि संस्कृत स्रोत मुग़ल इतिहास के उन पहलुओं को सामने लाते हैं जिन्हें फ़ारसी दरबारी इतिहास अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ये ग्रंथ क्षेत्रीय राजनीति, धार्मिक समझौतों, बौद्धिक आदान-प्रदान, सामाजिक जीवन और मुग़ल शासकों तथा भारतीय परंपराओं के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की जानकारी देते हैं। संस्कृत और मुग़ल दरबार संस्कृत विद्वानों को संरक्षण देकर और बड़े पैमाने पर अनुवाद करके, मुग़ल शासक राजनीतिक वैधता हासिल करना...

पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष

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  पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष  “रोम में 510 ईसापूर्व में राजशाही का अंत हुआ तथा गणतंत्र की शुरुआत हुई। जिसमें राजनितिक सत्ता कुलीनों के हांथो में रही तथा उन्होंने इससे अकूत धन कमाया। जिसके चलते आमिर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती गयी तथा निम्न वर्ग इनसे नाराज रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन रोमन समाज दो वर्गो में विभाजित था - पैट्रिशियन और प्लीबियन । पैट्रिशियन में कुलीन वर्ग शामिल थे जो आर्थिक, राजनितिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे। प्लीबियन में आम लोग, किसान तथा मजदुर शामिल थे। इनके बीच होने वाले संघर्ष को "श्रेणियों का टकराव" तथा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ द ऑर्डर्स" के नाम से जाना जाता है जो लगभग 494 ई• पू• से 287 ई• पू• तक चला। रोमन इतिहासकार टाइटस लिवियस के अनुसार, प्लीबियन और पैट्रीशियन के बीच संघर्ष एक सामाजिक और आर्थिक संघर्ष था, जिसमें प्लीबियन ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार यह इतिहास का सबसे पहला 'वर्ग-संघर्ष' है जिसने बाद के सामाजिक बदलावों की नींव रखी। वैवाहिक प्रतिबंध - 445 ई• पू• के बाद पैट्रिशियन और प्लीबियन के ...

पल्लव स्थापत्य कला

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  पल्लव स्थापत्य कला पल्लव शासनकाल की स्थापत्य शैली को “ द्रविड़ शैली” कहा जाता है। पल्लव राजाओं ने सातवीं तथा आठवीं शताब्दी में अपने आराध्य देवताओं की प्रतिमा स्थापित करने के लिए मंदिरो का निर्माण करवाया। पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन l, नरसिंहवर्मन l तथा नरसिंहवर्मन ll कला के महान संरक्षाक थे। इनके स्थापत्यकला के उदाहरण कांचीपुरम तथा महाबलीपुरम से अधिक मिलते है। इनमे गुफा मंदिर, चट्टान को तराश कर बनाये गए मंदिर तथा स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर शामिल है। इस काल के मानव आकृतियों के चेहरे गोल, ठुड्डी ऊँची तथा शरीर पतले बनाये गए है।   विद्वान पर्सी ब्राउन (Percy Brown) ने पल्लव स्थापत्य कला को ‘द्रविड़ शैली की प्रयोगशाला’ कहा है। पल्लव स्तापत्य कला को चार शैलियों में विभाजित किया जा सकता है। l) महेन्द्रवर्मन शैली ( 610 - 640 ई•) ll) माम्मल शैली ( 640 - 674 ई•) lll) राजसिंह शैली ( 674 - 800 ई•) lV) नंदिवर्मन शैली ( 800 - 900 ई•) इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री (K. A. Nilakanta Sastri) ने पल्लव स्थापत्य कला को चार चरणों में विभाजित कर उसे व्यवस्थित रूप दिया है। 1)  महेन्...