पल्लव स्थापत्य कला

 पल्लव स्थापत्य कला


पल्लव शासनकाल की स्थापत्य शैली को द्रविड़ शैली” कहा जाता है। पल्लव राजाओं ने सातवीं तथा आठवीं शताब्दी में अपने आराध्य देवताओं की प्रतिमा स्थापित करने के लिए मंदिरो का निर्माण करवाया। पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन l, नरसिंहवर्मन l तथा नरसिंहवर्मन ll कला के महान संरक्षाक थे। इनके स्थापत्यकला के उदाहरण कांचीपुरम तथा महाबलीपुरम से अधिक मिलते है। इनमे गुफा मंदिर, चट्टान को तराश कर बनाये गए मंदिर तथा स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर शामिल है। इस काल के मानव आकृतियों के चेहरे गोल, ठुड्डी ऊँची तथा शरीर पतले बनाये गए है।  



विद्वान पर्सी ब्राउन (Percy Brown) ने पल्लव स्थापत्य कला को ‘द्रविड़ शैली की प्रयोगशाला’ कहा है।


पल्लव स्तापत्य कला को चार शैलियों में विभाजित किया जा सकता है।

l) महेन्द्रवर्मन शैली ( 610 - 640 ई•)

ll) माम्मल शैली ( 640 - 674 ई•)

lll) राजसिंह शैली ( 674 - 800 ई•)

lV) नंदिवर्मन शैली ( 800 - 900 ई•)


इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री (K. A. Nilakanta Sastri) ने पल्लव स्थापत्य कला को चार चरणों में विभाजित कर उसे व्यवस्थित रूप दिया है।


1)  महेन्द्रवर्मन शैली - इस शैली के मंदिर को मंडप कहा जाता है। इन्हे पत्थरों को काटकर गुफा मंदिर के रूप में बनाया गया है। मंडप के बाहर द्वार पर द्वारपालों की मूर्तियां बनाई गयी है। इसके स्तम्भ चौकौर है। महेंद्रशैली के मंडपों में मंडगपट्टू का त्रिमूर्ति मंडप, पल्लावरम का पंचपांडव मंडप, महेंद्रवाड़ी का महेन्द्रविष्णु ग्रहमण्डप तथा मामंडूर का विष्णुमंडप उल्लेखनीय है।


2) माम्मल शैली - नरसिंहवर्मन प्रथम ने माम्मल (महानायक) की उपाधि धारण की थी इसलिए उनकी स्थापत्य शैली को माम्मल शैली कहा जाता है। इन्होने महाबलीपुरम नगर की स्थापना की। इस शैली में दो प्रकार के मंदिरो का निर्माण हुआ प्रथम मंडप शैली के मंदिर तथा दूसरा रथ के अकार के मंदिर। इस काल के मंडप शैली के मंदिर पहले की तुलना में ज्यादा अलकृत है। इसके स्तम्भ काफी पतले तथा अनेक आकारो के बने है जो सिंह के शीर्ष पर स्थित है। इनमें पौराणिक गाथाओं के दृश्य उत्कीर्ण है जैसे - धरती का उद्धार करते विष्णु, विष्णु के तीन डेग, गजलक्ष्मी, दुर्गा तथा गोवर्धन पर्वत उठाते कृष्ण। उनके केशसज्जा तथा मुकुट सादगीपूर्ण है, तथा इनको कम गहने पहनाये गए है। इन मंदिरो में आदिवराहमण्डप, महिषिमर्दिनिमंडप, पंचपांडवमंडप तथा रामानुजमंडप उल्लेखनीय है।


विद्वान सी. शिवराममूर्ति (C. Sivaramamurti) के अनुसार पल्लव मूर्तिकला अपनी ‘लय और गतिशीलता’ के लिए प्रसिद्ध है।


इस शैली के दूसरे मंदिर रथ के अकार के बने है। इन्हे विशाल चट्टानों को काटकर बनाया गया है। इनमें पांच मंदिरों का नाम पांडवो और उनकी पत्नी द्रोपदी के नाम पर रखा गया है। यह मंदिर पांच रथो के रूप में भी जाने जाते है। प्रमुख रथ मंदिरो में द्रोपदी रथ, अर्जुन रथ, नकुल - सहदेव रथ, भीमरथ, धर्मराज रथ तथा गणेश रथ शामिल है। ये सभी शैव मंदिर है। धर्मराज रथ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और भव्य है क्योंकि यह वर्गाकार है तथा इसमें खुले आँगन है। इसके स्तम्भों के आधार को मजबूती देने के लिए बैठे हुए सिंह बनाये गए है। इनका शिखर ढोलाकार आकृति का है। इन रथों पर दुर्गा, इंद्र, गंगा, पार्वती, हरिहर, ब्रह्मा आदि की मूर्तियां बनी है।


विद्वान ए. एच. लांगहर्स्ट (A. H. Longhurst) के अनुसार मामल्ल शैली के रथ ‘वास्तुकला का विश्वकोश’ है क्योंकि हर रथ एक अलग शैली दिखाता है।


3) राजसिंह शैली - नरसिंहवर्मन ll ने राजसिंह की उपाधि धारण की थी। इनके शासनकाल में भिन्न तथा स्वतंत्र शैली का विकास हुआ जिसे राजसिंह शैली कहते है। महाबलीपुरम में स्थित तटीय मंदिर, कांची में कैलाशनाथ मंदिर तथा बैकुंठ पेरुमल मंदिर इस शैली के प्रमुख मंदिर है। इनमे महाबलीपुरम के तट पर स्थित शिव मंदिर पल्लव स्थापत्य का प्रमुख उदाहरण है। इसकी दीवारों पर गणेश, गज, स्कन्द तथा शार्दुल आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण है। इसके अलावा इसका गर्भग्रह वर्गाकार है तथा इसमें शिवलिंग स्थापित है।


कांची के कैलाशनाथ मंदिर में राजसिंह शैली का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। द्रवीड़ शैली की सभी विशेषताएं इस मंदिर में दिखाई देती है। मंदिर में शिव क्रीड़ाओं की अनेक मूर्तियां है। इस मंदिर के निर्माण के कुछ समय बाद ही बैकुंठ पेरुमल का मंदिर बना है। इस मंदिर की ऊंचाई साठ फिट है। यह मंदिर चार मंजिला है। प्रथम मंजिल में विष्णु की विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियां है। इसकी दीवारों पर राज्याभिषेक, उत्तराधकारी चयन, अश्वमेघ, युद्ध और नगर जीवन के दृश्यों को उत्कीर्ण किया गया है। यह मंदिर पल्लव वास्तुकला का पूर्ण विकसित रूप प्रस्तुत करता है।


4) नंदिवर्मन शैली - इस शैली के मंदिरों में वास्तुकला का कोई नवीन उदाहरण देखने को नहीं मिलता। इस काल के मंदिर आकर में छोटे थे। इस काल में मंदिरो में कांची का मुक्तेश्वर तथा मातंगेश्वर मंदिर तथा गुद्दीमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर उल्लेखनीय है।



गुफा मंदिर 


पल्लवों के गुफा मंदिर छोटे होते थे, इसमें मंदगापट्टू का लक्षितायतन मंदिर, तिरुचिरपल्ली का ललितांकूर गुफा मंदिर तथा माम्मलपुराम का गुफा मंदिर शामिल है। इन गुफा मंदिरों के स्तंम्भ का ऊपरी और निचला भाग वर्गाकार है। इनके प्रवेश द्वार पर द्वारपाल बने है। इनके गर्भग्रह में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव तथा अन्य देवताओं की प्रतिमाएं दीवारो पर बनाई गयी है। तिरुचिरपल्ली गुफा मंदिर में गंगा को सर पर धारण करते शिवे की प्रतिमा उल्लेखनीय है।


निष्कर्ष - इस प्रकार पल्लव वास्तुकला का भारतीय इतिहास में अधिक महत्त्व है। पल्लवों ने विरासत में प्राप्त कला का विकास करके नविन शैलियों को जन्म दिया, जो चोल और पाण्ड्य काल में पूर्ण विकसित हुई। पल्लव कला की विशेषताएं दक्षिणपूर्व एशिया तक विस्तृत हुई। 



Bibliography 

Upinder Singh: प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास

Kaluram Sharma and Prakash Vyas: भारत के सांस्कृतिक इतिहास की मुख्य प्रवृतियाँ

R.S Sharma: प्रारंभिक भारत का परिचय








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