अशोक का धम्म / शिलालेख

अशोक का धम्म / शिलालेख

 

सम्राट अशोक मौर्य साम्राज्य के महानतम सम्राट थे जिन्होंने अपने जीवन में बौद्ध धर्म के उपदेशों का पालन किया। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक एक महान सम्राट और बौद्ध उपासक था। अशोक ने महात्मा बुद्ध से जुड़े सभी स्थानों का भ्रमण किया और उन स्थानों पर स्मारर्को का निर्माण करवाया।


अभिलेखों में अशोक को देवानंप्रिय (देवताओं का जो प्रिय है) के नाम से संबोधित किया गया है।


अशोक का धम्म एक विचारधारा थी जिसका उद्देश्य समाज में नैतिकता, सहिष्णुता, और शांति को बढ़ावा देना था। अशोक का धम्म किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक सार्वभौमिक संहिता थी जिसका उद्देश्य समाज में शांति, सद्भाव, और नैतिकता को बढ़ावा देना था। अशोक ने अपने शिलालेखों में धम्म के इन सिद्धांतों को प्रचारित किया और लोगों को इनका पालन करने के लिए प्रेरित किया।


अशोक के अभिलेखों को पाँच समूहों में बाँटा गया है। जिसमें 14 शिलालेख, 6 स्तंभ अभिलेख, लघु शिलालेख, लघु स्तम्भलेख तथा गुफा अभिलेख शामिल है।


स्तंभलेख 2 तथा 7 में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है: धम्म है साधुता, कल्याणकारी कार्य करना, पापरहित होना, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता प्राणियों का वध और जीव हिंसा न करना, माता पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, मित्रों, संबंधियों, ब्राह्मणों, श्रमिकों तथा दासों के प्रति दानशीलता और उचित व्यवहार करना। इसके अलावा अशोक ने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है जैसे निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, पाप के लक्षण है प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।


इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि अशोक के शिलालेखों में जो बातें लिखी गई है वह बौद्ध ग्रंथों से ली गई है। बौद्ध ग्रंथ लक्खण सुत्त तथा चक्कवत्ती सीहनाद सुत्त में चक्रवर्ती सम्राट के लिए कहा गया है कि वह भौतिक तथा आध्यात्मिक कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहता है अथवा वह तलवार के बजाए धम्म से विजय प्राप्त करता है।


अशोक के शिलालेख 1 में विशेष उत्सवों और अवसरों पर पशुवध निषेध किया गया है। 


कंधार अभिलेख से मालूम पड़ता है की आशोक की इस नीति का प्रभाव बहेलियों और मछुआरों पर भी पड़ा और उन्होंने जीव हिंसा को त्यागकर खेतिहर जीवन को अपना लिया।


शिलालेख 2 में सम्राट द्वारा आयुर्वेदिक औषधियों तथा उससे जुड़े चिकित्सकीय उपयोग वाले फल-फूल, कंद मूल इत्यादि के रोपण करवाने की जानकारी मिलती है। इसमें हमें केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि जंतुओं की चिकित्सा और उनकी सुरक्षा की भी चिंता व्यक्त की गई है।


शिलालेख 3 से पता चलता है कि साम्राज्य के अधिकारी रजूक और प्रादेशिक को प्रत्येक पाँच वर्षों में साम्राज्य के विभिन्न भागों में घूम घूमकर धम्म के प्रचार प्रसार का दायित्व भी सौंपा गया। इसके अलावा अशोक ने इसमें अल्प व्यय और अल्प संग्रह को भी धम्म का अंग माना है।


शिलालेख 5 से पता चलता है कि अशोक ने अपने राज्यकाल के तेरह वर्ष बाद धम्ममहामात अधिकारीयों की नियुक्ति की गई। जिनका कार्य सीमांत प्रदेशों में रहने वाले योन, कंबोज, गांधार जैसे समुदायों में धर्म का प्रचार प्रसार करना था। उनसे अपेक्षा की गई की वे सभी संप्रदाय के सदस्यों से मिलना-जूलना करेंगे और लोक कल्याण के लिए व्यापारियों, ब्राह्मणों, कैदियों, वृद्धों, किसानों और असहाय लोगों और राजा के रिश्तेदारों में भी धम्म का संदेश पहुंचाएंगे।


स्तंभलेख 7 में सम्राट ने केवल अपने साम्राज्य में ही नहीं बल्कि अपने पड़ोसी राज्य में भी धम्म के प्रचार प्रसार की बात की है। जिसके लिए धम्म के प्रचार के संदेश उत्तर-पश्चिम में एंटीओकस और दक्षिण में चौल तथा पाण्ड्य साम्राज्य के पास भेजे गए।


शिलालेख 9 में शादी विवाह, जन्मोत्सव और यात्रा प्रारंभ करने में मनाया जाने वाले उत्सव और विशेष रूप से स्त्रियों की सहभागीता की आलोचना की गई है।


धम्म के उत्सव के लिए अशोक ने अपने आलोचकों के प्रति अच्छा व्यवहार, बुजुर्गों के प्रति सम्मानपूर्वक व्यवहार तथा किसी जीव के प्रति सहिष्णुता के भाव रखने की बात की है इसके अलावा उसने ग़रीबों,किसानों और ब्राह्मणों को दान देने की अपील की है।


शिलालेख 11 में धम्मदान को सर्वोत्तम दान बताया गया है। जिसमें शामिल है दास और नौकरों के प्रति दयालुता, माता पिता के प्रति आज्ञाकारिता, मित्रों, संबंधियों, ब्राह्मणों व किसानों के प्रति उदारता और सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा।


स्तंभलेख 2 में वर्णन किया गया है कि धम्म के पालन में पाप का समावेश नगण्य हैं और इसके विपरीत सहिष्णुता, सहानुभूति जैसे अनेक भावों का इसमें समावेश है। अशोक के धम्म के अनुसार विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच सहिष्णुता का भाव रखना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि अशोक ने किसी भी संप्रदाय विशेष के प्रचार-प्रसार पर बल नहीं दिया है।


शिलालेख 12 में सम्राट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि लोगों को दूसरे संप्रदायों की आलोचना नहीं करनी चाहिए और न ही अपने धर्म के प्रति विशेष बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए। इस माध्यम से राजा अपनी प्रजा से अपील कर रहा है कि वे अपने संप्रदायों के अलावा दूसरे सम्प्रदायों और धर्मों को समझने का प्रयास करें और उनका सम्मान करें। अशोक का मानना था कि उसकी धर्म नीति के द्वारा इन सभी संप्रदायों और धर्मो को अपने जीवन में उतारा जा सकता है।


अशोक के धम्म संबंधी विचारों में एक बात समान है कि वह इनके द्वारा युद्ध विजय का परित्याग करता है और धम्म विजय की नीति का अनुसरण करता है। धम्म आदर्शों को अपनाकर अशोक अपने साम्राज्य की चारों दिशाओं पर नियंत्रण रखता है। यहाँ तक कि उसके प्रतिद्वंदी उसके साथ संघर्ष नहीं करते थे बल्कि उसकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार कर लेते थे। यह क्षेत्र विस्तार की बात नहीं बल्कि धम्म के स्वीकार करने की बात है।


शिलालेख 13 में अशोक के कलिंग युद्ध का वर्णन है जिसमें बताया गया है कि युद्ध के परिणामों से अशोक को बहुत गहरा दुख पहुँचा। जिसके बाद अशोक ने युद्ध की आलोचना की और कहा कि युद्ध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सभी को होनी ही होती है और सभी को दुख पहुँचता है। इसलिए उसने धम्म विजय की नीति की शुरुआत की और उसके आधार पर यवनों, कंबोजो, चोल, पांडेयो और पुलिंदों जैसे सभी राज्यों पर अपना प्रभाव बढ़ाया।


अपने अभिलेखों के अंत में अशोक एक सम्राट के रूप में आशा करता है कि उसके उत्तराधिकारी इसी तरह धम्म का अनुपालन करते रहेंगे और युद्ध नीति का सहारा नहीं लेंगे। यदि युद्ध का सहारा भी लेना पड़े तो हारे हुए अपने शत्रुओं के प्रति वे सहानुभूतिपूर्वक विचार रखेंगे।


अशोक ने धम्म यात्रा का प्रचलन शुरू किया जिसमें ब्राह्मणों, श्रमिकों और ग्रामीणों से मिलना-जुलना, उनको दान देना तथा धम्म की शिक्षा देना शामिल था।


अशोक के अभिलेख प्राकृत, ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक और अरामेइक भाष में पाए गए हैं


इतिहासकार बी. एन. मुखर्जी ने कहा कि अशोक के अभिलेखों में सभी स्थानों पर समानता का बोध होता है किंतु जहाँ से ग्रीक और अरामेइक अभिलेख मिले हैं वहाँ पर भिन्नता देखने को मिलती है। जैसे ग्रीक और अरामेइक अभिलेखों में स्वर्ग की प्राप्ति धम्म के उद्देश्यों में शामिल नहीं हैं किन्तु प्राकृत अभिलेखों में अनिवार्य रूप से इसका वर्णन किया गया है।


इतिहासकार रोमिला थापर ने धम्म के प्रचार-प्रसार को राजनीतिक आवश्यकता के रूप में देखने की कोशिश की है। उनके अनुसार धम्म सम्राट अशोक का एक सैद्धांतिक और वैचारिक माध्यम था जिसके द्वारा उसने विस्तृत साम्राज्य को एक सूत्र में पिरोने का आधार बनाया।


Bibliography 

Upinder Singh: प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास

D. N Jha: प्राचीन भारत का इतिहास

R. S Sharma: प्रारंभिक भारत का परिचय














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