पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष

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  पैट्रीशियन तथा प्लीबियन का संघर्ष  “रोम में 510 ईसापूर्व में राजशाही का अंत हुआ तथा गणतंत्र की शुरुआत हुई। जिसमें राजनितिक सत्ता कुलीनों के हांथो में रही तथा उन्होंने इससे अकूत धन कमाया। जिसके चलते आमिर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती गयी तथा निम्न वर्ग इनसे नाराज रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन रोमन समाज दो वर्गो में विभाजित था - पैट्रिशियन और प्लीबियन । पैट्रिशियन में कुलीन वर्ग शामिल थे जो आर्थिक, राजनितिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे। प्लीबियन में आम लोग, किसान तथा मजदुर शामिल थे। इनके बीच होने वाले संघर्ष को "श्रेणियों का टकराव" तथा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ द ऑर्डर्स" के नाम से जाना जाता है जो लगभग 494 ई• पू• से 287 ई• पू• तक चला। रोमन इतिहासकार टाइटस लिवियस के अनुसार, प्लीबियन और पैट्रीशियन के बीच संघर्ष एक सामाजिक और आर्थिक संघर्ष था, जिसमें प्लीबियन ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार यह इतिहास का सबसे पहला 'वर्ग-संघर्ष' है जिसने बाद के सामाजिक बदलावों की नींव रखी। वैवाहिक प्रतिबंध - 445 ई• पू• के बाद पैट्रिशियन और प्लीबियन के ...

गुप्तकाल की मंदिर कला तथा स्थापत्य कला

गुप्तकाल की मंदिर कला तथा स्थापत्य कला


भरतिया स्थापत्य कला ने गुप्त काल में अपनी चरम सीमा प्राप्त की इसलिए गुप्त काल को कला के क्षेत्र में क्लासिक युग तथा स्वर्ण युग कहा जाता है। गुप्त राजा हिन्दू देवी-देवताओं की उपासना करते थे तथा उनकी मंदिर निर्माण में गहरी दिलचस्पी थी इसलिए उन्होंने कलाकारों और विद्वानों को संरक्षण प्रदान कियाl  जिसके फलस्वरूप उनके अधीन स्थापत्य कला का विकास हुआ।


विद्वान जे.सी हार्ल के अनुसार गुप्त काल की मूर्तिकला कला के क्षेत्र में उच्च कोटि को प्रदर्शित करती है। विद्वान जोएना विल्लियम्स के अनुसार गुप्त राजाओं को कला के विकास और प्रचार के लिए श्रेय देना चाहिए तथा इस काल की कला में बौद्धिक प्रेरणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 



मंदिर स्थापत्य कला


इस काल के अधिकांश मंदिर मध्यप्रदेश में स्थित है। इसमें तिगवा का विष्णु मंदिर, भूमर और खोह का शिव मंदिर, भीतरगांव का मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, मंदसौर का सूर्य मंदिर, ग्वालियर का यक्ष मंदिर, नचना-कुठारा का पारवती मंदिर तथा साँची का बौद्ध स्तूप शामिल है। इसके अलावा अन्य क्षेत्र में स्थापित बिहार का बोधि मंदिर और झाँसी जिले के देवगढ़ का दशावतार मंदिर इसी काल के है। इन सभी को पत्थरों से बनाया गया है।


इस काल के शुरूआती मंदिर काफी छोटे बनाये गए थे। मंदिर का गर्भग्रह वर्गाकार होता था। द्वार छोटे तथा छत समतल होती थे। मंदिर के प्रवेश द्वार अलंकृत होते थे। पांचवी और छठी शताब्दी में मंदिर की संरचना में परिवर्तन आया। मंदिर की कुर्सी ऊँची बनाई जाने लगी तथा मंदिरों में शिखर भी बनाये जाने लगे। देवगढ़ का दशावतार मंदिर तथा भीतरगांव का मंदिर इसका उदहारण है। 


देवगढ़ का दशावतार मंदिर: इस मंदिर के चौकोर कक्ष में मुख्या देवता की प्रतिमा है। इसके चबूतरे के चारो कोनो पर एक सहायक मंदिर है जिसमें गौण देवता की मूर्ति को रखा गया है। यह मंदिर पंचायतन शैली (पांच मंदिर) का पहला प्रमाण है। मंदिरों के पत्थरों को गिट्टों की सहायता से जोड़ा गया है। इसकी दीवारों पर मूर्ति की पट्टिकाएं बनायी गई है जिनमें मुख्य देवता को केंद्रीय स्थिति में दिखाया गया है व अन्य गौण देवता उसे घेरे हुए है। इसके प्रवेशद्वार पर पक्षी, मिथुन, स्वास्तिक, पुष्प और बोने लोगो की प्रतिमाएं बानी है। दरवाजो के चौखट पर शंख और कमल बनाया गया है। इस मंदिर के शिखर की ऊंचाई 40 फ़ीट है।


मंदिर में विष्णु को शेषनाग की शैया पर विराजमान दिखाया है। वे कुण्डल, मुकुट, माला तथा हार आदि से सुशोभित है। इसमें शिव और इंद्र आदि की प्रतिमाएं है। इनके समीप दो शस्त्रधारी पुरुष है। कार्तिकेय मयूर पर आसीन है तथा चार मुख वाले ब्रह्मा कमल पर विराजमान है। लक्ष्मी उनके चरण दबा रही है। गोबर्धन पर्वत उठाये कृष्ण की मूर्ति भी काफी सुन्दर है।


भीतरगांव का मंदिर: यह पक्की ईंटों और टेराकोटा से बना है। इसकी बाहरी दीवारों पर टेराकोटा की पट्टिकाएं लगी है। इस मंदिर में पहली बार मेहराब का निर्माण किया गया। 


तिगवा का विष्णु मंदिर: यह मंदिर सादा बना हुआ है। इसके समक्ष एक मंडप है। इसके स्तम्भों के ऊपर सिंह तथा कलश की आकृतियां है। गर्भग्रह के द्वार पर यमुना और गंगा की आकृतियां बानी हुई है। गुप्त काल में ही पहली बार यमुना और गंगा को मूर्त रूप दिया गया।



नचना-कुठारा का पार्वती मंदिर: यह मंदिर 'गांधार शैली' के मंदिरों का सबसे प्राचीन उदाहरण है। यह दो-मंजिला संरचना है जो एक ऊँचे चबूतरे पर टिकी हुई है। मंदिर का प्रवेश द्वार, जिसका मुख पश्चिम दिशा की ओर है, काफ़ी अच्छी तरह से अलंकृत है।


वराह अवतार: गुप्त काल में वराह अवतार की अनेक मूर्तियां बनाई गयी। उदयगिरि से प्राप्त मूर्ति में शरीर मनुष्य का है तथा मुख वराह का। वराह के कंधे के ऊपर भूमि देवी की आकृति है। पृथ्वी को प्रलय से बचने के लिए वराह पृथ्वी को अपने दांतो पर उठाये हुए है जिसे नारी रूप में बनाया गया है। वराह का बायां पैर शेषनाग के मस्तक पर है तथा तरंगित रेखाओं से समुद्र बनाया गया है। गंगा और यमुना दोनों नारी रूप में वराह भगवान का अभिषेक करने के लिए जल-कलश लिए हुए है। वराह के बायीं और अप्सराएं तथा दाईं और ब्रह्मा, शिव, ऋषि तथा आदि देवता है। 


गुप्त काल को बुद्ध कला के लिए भी स्वर्ण युग कहा जाता है। गुप्त काल के कारीगरों ने बुद्ध की प्रतिमाओं में नए तत्वों को प्रस्तुत किया। बुद्ध के बालो को घुँगराला दिखाया गया। उनकी मुद्राओं के विभिन्न प्रकार दिखये गए है जिसमें हस्तमुद्रा प्रमुख है। सारनाथ से प्राप्त बुद्ध की असंख्य मूर्तियों में सबसे अद्भुत सिंहासन पर बैठे अपना पहला उपदेश देते हुए बुद्ध की है।



गुप्तकाल में निर्मित बौद्ध स्थलों में स्तूप, चैत्य और विहार शामिल है। इनके साक्ष्य हमें सारनाथ, नालंदा, राजगीर, जौलिया, चारसदा और गंधार के तक्षिला में पाए गए है। गुप्त काल की सर्वोच्च बौद्ध प्रतिमाएं सारनाथ में पायी गई है। जिसका एक प्रमुख उहाहरण 128 फ़ीट ऊँचा स्तूप है। जो ईंटों का बना है। इसका आधार गोलाकार है तथा इसका निर्माण धरातल पर किया गया है।  


गुफा स्थापत्यकला 


इस काल की कला में गुफा स्थापत्य भी शामिल है जिसमें अजंता और बाघ की गुफाएं प्रसिद्ध है। अजंता में कुल 28 गुफाएं है। इसमें से गुफा संख्या 19 और 26 चैत्य थे। अन्य सभी गुफाएं विहार थी। विद्वान वाल्टर स्पिंक के अनुसार गुफा संख्या 1 भारत में अब तक बनाये गुफा स्थापत्य का सबसे बेहतरीन उहाहरण है। 


गुफा संख्या 19 में एक आयातकार हॉल है। इस हाल को स्तम्भों के माध्यम से कई भागो में बांटा गया है। स्तम्भों पर कई प्रतिमाएं उकेरी गयी है। मुख्य प्रतिमा के चारो ओर भी स्तम्भ बनाये गए है। इसका स्तूप काफी ऊँचा है जिसपर एक खड़े हुए बुध की प्रतिमा बनाई गयी है। गुफा का अग्रभाग भी अलंकृत किया गया है जिसपर बुद्ध तथा उसके अनुयायियों की प्रतिमाओं को दिखाया गया है।  


गुफा संख्या 26 में एक विशाल स्तूप मौजूद है। जिसमें बुद्ध का भित्ति चित्र बनाया गया है। इसमें बुद्ध को बैठा हुआ दिखाया गया है जिसके पैर नीचे लटके हुए है। इसमें सात मीटर लेटे हुए बुद्ध की प्रतिमा उल्लेखनीय है जो गुफा की बायीं दिवार पर स्थित है। यह बुद्ध के परनिर्वाण का दृश्य है जिसके चारो ओर अनुयायी मौजूद है। 


निष्कर्ष: गुप्त काल के मंदिरों में गर्भग्रह होते थे जिसके भीतर देवमूर्ति स्थापित की जाती थी। यहां तक पहुँचने के लिए एक दालान होता था जिसमें एक सभाभवन से होकर प्रवेश किया जाता था। मंदिर का निर्माण चबूतरों के ऊपर किया जाता था और ऊपर जाने के लिए चारो तरफ सीढ़ियां बनाई जाती थी। मंदिर के द्वार और स्तम्भ अलंकृत और सुसज्जित होते थे लेकिन मंदिरो का भीतरी भाग सादा होता था। द्वारपाल के स्थान पर गंगा और जमुना की प्रतिमाएं बानी होती थी। चौखट पर शंख या कमल बनाये जाते थे। गुप्त मंदिर ईंट या पत्थर से बने होते थे। पत्थर के मंदिरों को उभारदार मूर्तियों से बड़े पैमाने पर सजाया जाता था। इसके अलावा मकर पर विराजमान नदी-देवियों की मूर्तियाँ भी यहाँ देखने को मिलती हैं। इन मंदिरों के स्तंभों के शीर्ष पर 'पूर्ण-कलश' के आकार की आकृतियाँ बनी होती थीं।


Bibliography

Upinder Singh: प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास

D.N. Jha: प्राचीन भारत का इतिहास

R.S Sharma: प्रारंभिक भारत का परिचय

IGNOU:- प्राचीनतम काल से 300 ई• तक

Kaluram Sharma and Prakash Vyas :- भारत के सांस्कृतिक इतिहास की मुख्य प्रवृतियाँ










 












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