जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया
जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945)
कोरिया और मंचूरिया
मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की।
दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विरुद्ध था। चीन साफ़ तौर पर दुश्मन था, और कोरिया को जापान के दिल की ओर तनी हुई कटार माना जाता था, जिसे किसी तीसरी शक्ति के हाथ में नहीं जाने देना था।
1871 में जापान ने चीन के साथ मैत्री संधि (Treaty of Amity) की, जिसके अनुसार दोनों देश पश्चिम के विरुद्ध मिलकर प्रयास करने पर सहमत हुए। यह बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि अब तक चीन जापान को अपना करदाता राज्य मानता था, पर अब जापान को बराबरी का दर्जा मिल गया। जल्दी ही र्यूक्यू (Ryukyu) द्वीपों पर नियंत्रण को लेकर विवाद खड़ा हो गया। र्यूक्यू द्वीपों को 17वीं सदी में सत्सुमा कबीले ने जीता था। चीन ने विरोध किया और अमेरिका से दखल देने की माँग की, पर अमेरिका ने मना कर दिया। समझौते के तौर पर जापान ने इन द्वीपों का सबसे दक्षिणी समूह देने की पेशकश की, बदले में उसने अपने लिए 'सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र' (Most Favoured Nation) का दर्जा माँगा। 1881 में चीन ने प्रस्ताव रखा कि चीन और जापान दोनों र्यूक्यू द्वीपों पर अपना दावा छोड़ दें। लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका, और इसके बाद चीन-जापान संबंध कभी मधुर नहीं रहे।
कोरिया के सवाल ने चीन और जापान को सीधे टकराव में ला दिया। कोरिया में जापान के बड़े व्यापारिक, राजनीतिक और रणनीतिक हित थे। जापान का तर्क था कि वह आधुनिक बनने वाला पहला एशियाई देश है, इसलिए कम विकसित पड़ोसियों को राह दिखाना उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी है। विद्वान मारियस जैनसेन के अनुसार पड़ोसियों की मदद करने का जापानी तर्क बाहरी भी था और भीतरी भी। बाहरी इस मायने में कि पश्चिमी साम्राज्यवाद एशिया की आत्मनिर्णय की सारी शक्ति और जापान की आर्थिक-राजनीतिक 'लेबेंसराउम' (यानी फैलने-बढ़ने की जगह) छीन लेने का खतरा पैदा कर रहा था। भीतरी इस मायने में कि जापान का यह पक्का विश्वास था कि पूर्व और पश्चिम का उसका आज़माया हुआ मेल ही आधुनिकीकरण का सबसे भरोसेमंद रास्ता है।
कोरिया, चीन और जापान, दोनों को कर देता था, पर चीन के ज़्यादा करीब था और मेजी जापान का विरोधी था। 1872 में जापान ने कोरिया के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने की कोशिश की, पर उसे ठुकरा दिया गया।
1876 में चीन की सलाह पर कोरिया जापान से कूटनीतिक बातचीत के लिए राज़ी हुआ। विद्वान फेयरबैंक के अनुसार, कांगहवा की संधि (1876) एक असमान संधि थी, जो चीन और जापान के साथ की गई पश्चिमी संधियों के ढर्रे पर बनी थी। इसने जापानी व्यापार के लिए तीन बंदरगाह खोले - पुसान, इंचोन और वोनसान और कोरिया को 'स्वतंत्र राज्य' घोषित किया। अगस्त 1882 में एक और संधि हुई, जिसने कोरिया में जापानी सैनिक रखने की अनुमति दे दी।
1884 में कोरिया में सियोल विद्रोह हुआ, यह विद्रोह सुधारवादियों द्वारा किया गया जो कोरिया में प्रबोधन विचरो का समर्थन करते थे। इन्हें जापान का समर्थन हासिल था। युआन शिकाई कोरिया में चीन का प्रतिनिधि था, उसने तीन दिन में इस विद्रोह को कुचल दिया। 1885 में तिएनत्सिन समझौता हुआ, जिसे ली-इतो समझौता भी कहा जाता है। दोनों देश कोरिया से अपनी सेनाएँ हटाने और कोरियाई सेना को प्रशिक्षण देना बंद करने पर सहमत हुए। वे इस पर भी राज़ी हुए कि एक-दूसरे को लिखित सूचना दिए बिना कोरिया में दोबारा सेना नहीं भेजेंगे। विद्वान जेम्स मैक्क्लेन का कहना है कि इस समझौते से स्थायी स्थिरता नहीं आई, क्योंकि जापान की नज़र में कोरिया की घरेलू नीतियाँ बेहद अव्यवस्थित बनी रहीं।
1894 में कोरिया के राजा कोजोंग ने देश की अंदरूनी अशांति दबाने के लिए चीन से सैन्य मदद माँगी। जिसके जवाब में चीन ने करीब 3000 चीनी सैनिक कोरिया भेजे। जापान ने इस घटना को तिएनत्सिन समझौते का उल्लंघन माना। परिणामस्वरूप जापान ने 1 अगस्त 1894 को चीन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध में जापान ने प्योंगयांग में चीनी रक्षकों को हराया, अगले दिन यालू नदी के पास चीनी युद्धपोतों के खिलाफ़ नौसैनिक लड़ाई जीती, 21 नवंबर को पोर्ट आर्थर पर कब्ज़ा कर लिया और 12 फरवरी 1895 को वेइहाईवेई में चीनी बेड़े को नष्ट कर दिया।
17 अप्रैल 1895 को शिमोनोसेकी की संधि ने चीन-जापान युद्ध का अंत किया। जापान ने ये माँगें रखीं: "कोरिया की पूर्ण और संपूर्ण स्वतंत्रता और स्वायत्तता", मंचूरिया के लियाओनिंग प्रांत के साथ-साथ ताइवान और उसके पास के पेस्काडोर द्वीपों का हस्तांतरण, लगभग 50 करोड़ येन का युद्ध हर्जाना, चार नए संधि बंदरगाह खोलना, व्यापारिक विशेषाधिकार जिनमें यांग्त्ज़ी नदी के ऊपरी हिस्से में जहाज़ चलाने का अधिकार, मशीनें आयात करने और चीन के संधि बंदरगाहों में कारखाने चलाने का अधिकार शामिल था। इतो हिरोबूमी हर्जाने में एक-तिहाई की कमी करने और मंचूरिया में जापान के क्षेत्रीय दावों को लियाओतुंग प्रायद्वीप तक सीमित रखने पर राज़ी हो गए। हर्जाना पूरा चुकाए जाने तक वेइहाईवेई बंदरगाह पर जापान का कब्ज़ा रहा।
1894-95 की घटनाओं ने जापान को दुनिया की पहली गैर-पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्ति बना दिया। इससे जापान आधुनिक विश्व राजनीति से परिचित हुआ। चीन को हराने के बाद जापान को एक औपनिवेशिक साम्राज्य की शुरुआत मिली। उस समय वह अभी उभरती हुई ताकत ही था। चीन पर जीत से जापान की सैन्य शाखा को भी बढ़ावा मिला।
5 मई 1895 को रूस, फ़्रांस और जर्मनी के त्रिपक्षीय हस्तक्षेप के दबाव में जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन के नियंत्रण में वापस लौटाना पड़ा। इसके बाद 8 अक्टूबर को सियोल में मौजूद जापानी दल ने महल में घुसकर रानी मिन को चाकुओं से मार डाला और फिर उनके शव को आग लगा दी। कोरिया के राजा ने रूस से सुरक्षा माँगी और उसके करीब हो गए।
विद्वान मोरिनोसुके काजिमा के अनुसार कोरिया और मंचूरिया में अपनी स्थिति को अजेय बनाने के लिए जापान के सामने दो रास्ते थे: या तो वह बुनियादी सिद्धांतों पर रूस के साथ समझौता कर ले, या रूस का विस्तार रोकने के लिए ब्रिटेन का सहयोग ले। 1890 के दशक में रूस की "अहंकारी और आक्रामक नीति" के कारण जापान रूस से दूर होने लगा और ग्रेट ब्रिटेन के करीब आ गया। जापानी सेना और यहाँ तक कि सम्राट भी ग्रेट ब्रिटेन के साथ गठबंधन के पक्ष में थे, जो 1902 में साकार हुआ। 1902 का एंग्लो-जापानी गठबंधन पहला मौका था जब किसी 'श्वेत' पश्चिमी शक्ति ने किसी 'अश्वेत' देश को बराबरी का दर्जा दिया।
रूस-जापान युद्ध (1904-05) जापानी साम्राज्यवाद के इतिहास का एक और बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव था। युद्ध की घोषणा 10 फरवरी 1904 को हुई। जिसमे रूसी बाल्टिक बेड़े की हार से जापान की नौसैनिक श्रेष्ठता साबित हो गई, जिसने रूस को जापान के साथ समझौता करने के लिए विवश कर दिया। जापान ने अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट से समझौता कराने को कहा। कठिन वार्ताओं के बाद जापान ने 5 सितंबर 1905 को रूस के साथ पोर्ट्समाउथ की संधि पर हस्ताक्षर किए। रूस ने कोरिया में जापान के प्रमुख हितों को मान लिया और वहाँ जापान जो भी कदम उठाए, उनका विरोध न करने पर सहमत हुआ। इसके अतिरिक्त प्रावधानों में जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप पर रूस का पट्टा (leasehold), दक्षिणी मंचूरिया में ज़ार के रेलमार्ग और खनन के अधिकार।
उसी 1905 में कोरिया के रेज़िडेंट जनरल इतो हिरोबूमी ने कोरिया-जापान समझौता किया, जिसने कोरिया को जापान का संरक्षित राज्य बना दिया। जुलाई 1907 में कोरिया में आंतरिक अराजकता फेल गई, जिसके बाद कोजोंग को हेग में अपना दूत भेजने के लिए गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया और अगस्त में कोरियाई सेना भंग कर दी, जिससे व्यापक असंतोष और हिंसा फैल गई। इतो हिरोबूमी की 26 अक्टूबर 1909 को हत्या कर दी गई। इससे क्रोधित होकर जापान ने कोरिया को पूरी तरह हड़प लेने का निश्चय किया। 22 अगस्त 1910 को विलय की संधि पर हस्ताक्षर हुए। कोरिया का नाम बदलकर चोसेन कर दिया गया, उसे जापान की कॉलोनी बना दिया गया, और नागरिक तथा सैन्य, दोनों तरह के मामलों का पूरा अधिकार कोरिया के गवर्नर-जनरल को सौंप दिया गया।
विद्वान जॉन के. फेयरबैंक के अनुसार 1874 के ताइवान अभियान से लेकर 1910 में कोरिया के विलय तक जापान की विदेश नीति एक जैसी रही; उसके उद्देश्य थे सुरक्षा, स्वायत्तता और बड़ी शक्ति का दर्जा।
जापानी साम्राज्यवाद के इतिहास का दूसरा दौर प्रथम विश्व युद्ध से 1922 तक का था। ब्रिटेन के सहयोगी के रूप में जापान ने जर्मनी के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा की और शानतुंग में जर्मनी की जगह ले ली। जापान ने 18 जनवरी 1915 को चीन के सामने मशहूर 21 माँगें रखीं। ये माँगें पाँच समूहों में थीं। समूह I शानतुंग में जर्मन आर्थिक अधिकारों के निपटारे से जुड़ा था। समूह II का मकसद दक्षिणी मंचूरिया और पूर्वी भीतरी मंगोलिया में जापान की स्थिति मज़बूत करना था। समूह III का उद्देश्य मध्य चीन में खनन और रेलवे की रियायतें पक्की करना और हान-येह-पिंग कंपनी को चीन-जापान संयुक्त उद्यम में बदलना था। समूह IV का मकसद चीन को किसी तीसरी शक्ति को चीनी तट का कोई बंदरगाह, खाड़ी या द्वीप सौंपने या पट्टे पर देने से रोकना था। समूह V में सात अनुच्छेद थे, जिन्हें 'इच्छाएँ' कहा गया; ये अलग-अलग तरह के मामलों को शामिल करने के लिए बनाए गए थे, जैसे चीनी सरकार द्वारा जापानी सलाहकार रखना।
1920 के दशक के अंत में जापानी सरकार के नागरिक और सैन्य अधिकारी दो गुटों में बंट गए। सैन्यवादी 'सकारात्मक चीन नीति' के पक्षधर थे, यानी चीन की मुख्य भूमि में विस्तार और उस पर नियंत्रण। लेकिन सरकार अंतर्राष्ट्रीयतावाद की विदेश नीति अपना चुकी थी और वह उस नीति पर चल रही थी जो 'नरम चीन नीति' कहलाई। 1929 के बाद के नए बाहरी प्रभावों - महामंदी, चीनी राष्ट्रवाद का उदय और हिटलर तथा मुसोलिनी का सत्ता में आना ने इस नीति में बदलाव ला दिया।
मंचूरिया ध्यान देने का सबसे स्वाभाविक क्षेत्र था, क्योंकि उसकी रणनीतिक स्थिति अहम थी, वहाँ की खेती उपजाऊ थी, बंदरगाह बर्फ़ से मुक्त थे और प्राकृतिक संसाधन भरपूर थे। 1931 में मंचूरिया में लड़ाई भड़क उठी। जापान के रेलवे हितों की रक्षा के बहाने क्वांतुंग सेना सितंबर में आक्रामक हो गई। 20 सितंबर तक क्वांतुंग सेना ने पूरे मंचूरिया को रौंद डाला और राजधानी मुकदेन पर कब्ज़ा कर लिया। 18 फरवरी 1932 को मांचूकुओ सरकार स्थापित कर दी गई।
चीन ने राष्ट्रसंघ से अपील की, और संघ ने जापान के इस दावे को साफ़ तौर पर ठुकरा दिया कि मंचूरिया में सैन्य हस्तक्षेप आत्मरक्षा में उठाया था। राष्ट्र संघ ने इसकेलिए जापान की निंदा की। 27 मार्च 1933 को जापान राष्ट्र संघ से बाहर हो गया।
दूसरा चीन-जापान युद्ध 7 जुलाई 1937 को मार्को पोलो पुल पर हुई झड़प से शुरू हुआ। जापान को चीनी कम्युनिस्टों का कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा, जबकि कुओमिनतांग की सेनाएँ जापानी हमलावरों से लड़ने से ज़्यादा कम्युनिस्टों को कुचलने की चिंता में थीं। जापान ने नानकिंग, पेकिंग, कैंटन, हांकाउ और शंघाई जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर कब्ज़ा कर लिया, और आर्थिक सहयोग, मित्रता और साम्यवाद के विरुद्ध संयुक्त मोर्चे के आधार पर जापान, चीन और मांचूकुओ के संघ की घोषणा की।
जापान द्वितीय विश्व युद्ध में फ़ासीवादी जर्मनी और इटली के सहयोगी के रूप में शामिल हुआ। आधुनिक बनने वाला पहला एशियाई देश होने के कारण जापान खुद को बाकी सभी एशियाई देशों का नेता मानता था। विद्वान एफ. सी. जोन्स का तर्क है कि सह-समृद्धि क्षेत्र का बनना जितना साम्राज्यवादी नीतियों की वजह से था, उतना ही एशियाई एकजुटता की इच्छा की वजह से भी।
जापान के औपचारिक साम्राज्य में ताइवान, कोरिया, सखालिन, क्वांतुंग क्षेत्र और प्रशांत द्वीप शामिल थे। जब जापान की हार हुई, तब तक वह दक्षिण-पूर्व एशिया के ज़्यादातर हिस्से पर कब्ज़ा कर चुका था और बर्मा तक पहुँच गया था। 14 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण और 1952 तक मित्र राष्ट्रों के कब्ज़े ने जापानी साम्राज्यवाद को ऐसा घातक झटका दिया, जिससे वह फिर कभी उबर नहीं सका। इस तरह 80 साल से भी कम समय में जापान एक अर्ध-सामंती राज्य से आधुनिक, औद्योगिक और अपने आप में एक साम्राज्यवादी शक्ति बन गया। 1945 में साम्राज्यवाद का अचानक अंत हो गया। फिर भी जापान आधुनिकीकरण की राह पर चलता रहा और आज भी एक ऐसी आर्थिक ताकत है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
(Bibliography)
James L. McClain – Japan: A Modern History
J. K. Fairbank – East Asia
Morinosuke Kajima – The Emergence of Japan as a World Power 1895–1925
Marlene J. Mayo – The Emergence of Imperial Japan
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