औद्योगीकरण ( Debate) "महान विभाजन" || Great Divergence

 औद्योगीकरण ( Debate)

"महान विभाजन" ||  Great Divergence



"ग्रेट डाइवर्जेस" यानी "महान विभाजन" की बहस ने औद्योगिक क्रांति को समझने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। यह बहस मूल रूप से इस सवाल पर है: आधुनिक आर्थिक तरक्की यूरोप में ही क्यों शुरू हुई, चीन जैसे देशों में क्यों नहीं, जबकि पहले चीन भी आर्थिक रूप से यूरोप जितना ही आगे था, बल्कि कहीं-कहीं उससे भी बेहतर था। अरविंद सिन्हा अपने लेख "यूरोप इन ट्रांज़िशन" में बताते हैं कि इस बहस ने तीन बड़े काम किए हैं- पहला, यूरोप को हमेशा सही और आगे मानने वाली पुरानी सोच को चुनौती दी; दूसरा, यह दिखाया कि यूरोप का विकास पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अकेले नहीं हुआ; और तीसरा, यह साबित किया कि यूरोप का आगे निकलना कोई तय बात नहीं थी, बल्कि हालात और मौकों का नतीजा था। इस लेख में हम देखेंगे कि अलग-अलग विद्वानों की राय से यह समझ कैसे और गहरी हुई।



पुरानी सोच और उसकी कमियाँ


यह समझने से पहले कि नई बहस ने क्या बदला, पहले यह जानना ज़रूरी है कि पुरानी सोच क्या कहती थी। पहले के इतिहासकार मानते थे कि औद्योगिक क्रांति सिर्फ यूरोप में हुई क्योंकि वहाँ के लोगों में कुछ खास बातें थीं- जैसे वैज्ञानिक सोच, पूँजीवादी व्यवस्था, मेहनत करने की आदत, लोकतंत्र, और तकनीकी होशियारी। इस सोच के मुताबिक बाकी दुनिया के देश पिछड़े हुए और पुरानी परंपराओं में जकड़े हुए थे, इसलिए वहाँ तरक्की नहीं हो सकी।


सिन्हा ताते हैं कि इस पुरानी सोच में कई गलतियाँ थीं। पहली गलती यह मान लिया गया कि यूरोप का रास्ता ही सही रास्ता है और सबको उसी तरह आगे बढ़ना है। दूसरी गलती यूरोप की तरक्की को अकेले देखा गया, बाकी दुनिया से उसकी तुलना नहीं की गई। तीसरी गलती - यह भुला दिया गया कि यूरोप ने अपनी तरक्की के लिए दूसरे देशों को गुलाम बनाया, वहाँ से संसाधन लूटे और दुनिया भर में व्यापार का जाल बिछाया। नई बहस ने इन्हीं गलतियों को सामने रखा और औद्योगिक क्रांति की कहानी को नए सिरे से समझाया।


केनेथ पोमेरांज़ की किताब "द ग्रेट डाइवर्जेस"


केनेथ पोमेरांज़ की साल 2000 में आई किताब "द ग्रेट डाइवर्जेस" इस पूरी बहस की सबसे अहम कड़ी है। पोमेरांज़ ने पुरानी बात को गलत साबित किया कि यूरोप हमेशा से चीन से आगे था। उन्होंने दिखाया कि सन 1800 तक चीन के कुछ हिस्से और यूरोप, दोनों में लोगों का रहन-सहन, व्यापार और आर्थिक हालत लगभग एक जैसी ही थी।


सिन्हा के मुताबिक, पोमेरांज़ कहते हैं कि यूरोप (खासकर इंग्लैंड) और चीन के बीच फर्क 1800 के बाद ही आया, और इसकी दो बड़ी वजहें थीं- पहली, इंग्लैंड को कोयला आसानी से मिल गया, वो भी उन जगहों के पास जहाँ फैक्ट्रियाँ थीं। दूसरी, इंग्लैंड के पास अमेरिका में उपनिवेश (कॉलोनी) थे, जहाँ से उसे कपास जैसी चीजें आसानी से मिल गईं। इन दोनों चीज़ों ने इंग्लैंड को उस समस्या से बचा लिया जो बाकी जगहों को पीछे रखती थी यानी संसाधनों की कमी ।


इसका मतलब यह है कि पोमेरांज़ ने औद्योगिक क्रांति को यूरोप की किसी खास काबिलियत का नतीजा नहीं, बल्कि किस्मत और मौके का नतीजा बताया कोयला पास में मिल गया और उपनिवेशों से फायदा हुआ। इससे यह सोच टूट गई कि यूरोप हमेशा से बाकी दुनिया से बेहतर था ।


रॉबर्ट एलेन : मज़दूरी और तकनीक का रिश्ता


रॉबर्ट एलेन ने बताया कि इंग्लैंड में मज़दूरी ज़्यादा थी, इसलिए मालिकों को ऐसी मशीनें बनाने का फायदा था जो मज़दूरों की जगह ले सकें। लेकिन चीन और भारत जैसे देशों में मज़दूरी कम थी, इसलिए वहाँ मशीनों में पैसा लगाने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई इंसानों से काम करवाना सस्ता था।


सिन्हा कहते हैं कि एलेन के इस विचार ने यह दिखाया कि तकनीक का आना संस्कृति की वजह से नहीं, बल्कि पैसे के हिसाब-किताब की वजह से हुआ। यही वजह है कि इंग्लैंड में बनी मशीनें कम मज़दूरी वाले देशों में आसानी से नहीं अपनाई गईं, क्योंकि वहाँ उनका कोई फायदा नहीं था।


प्रसन्नन पार्थसारथी : भारत और ब्रिटेन की तुलना


प्रसन्नन पार्थसारथी ने दिखाया कि अठारहवीं सदी में भारत का कपड़ा उद्योग बहुत उन्नत था और भारतीय कपड़े दुनिया भर के बाज़ारों में छाए हुए थे - यह ब्रिटेन के औद्योगीकरण से भी पहले की बात है। बाद में ब्रिटेन आगे निकला, तो इसकी वजह उसकी तकनीक की श्रेष्ठता नहीं थी, बल्कि यह थी कि ब्रिटेन ने अपने उद्योगों को बचाने वाली नीतियाँ बनाईं, उपनिवेशों से संसाधन लूटे, और सरकार ने उद्योगों की पूरी मदद की।


सिन्हा के मुताबिक, पार्थसारथी के काम ने यह दिखाया कि औद्योगिक तरक्की सिर्फ तकनीक या संस्कृति की बात नहीं थी, बल्कि इसमें सरकार की नीतियों और राजनीति का भी बड़ा हाथ था।


कपास और दुनिया भर का जुडाव


स्वेन बेकर्ट ने अपनी किताब "एम्पायर ऑफ कॉटन" में बताया कि कपास औद्योगिक क्रांति के केंद्र में था। कपास की खेती, व्यापार और उससे कपड़ा बनाना यह सब एक ऐसी व्यवस्था से जुड़ा था जिसमें ज़बरदस्ती, गुलामी और बाज़ार तीनों शामिल थे। बेकर्ट इसे "युद्ध- पूँजीवाद" कहते हैं।


इस नज़रिए ने दिखाया कि यूरोप की तरक्की सिर्फ यूरोप की अपनी मेहनत का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसमें अमेरिका के बागान, भारत और मिस्र में कपास की खेती, और दुनिया भर के ग्राहक - सब जुड़े हुए थे। यानी औद्योगिक क्रांति अकेले यूरोप की कहानी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की कहानी है।


डगलस नॉर्थ और एसेमोग्लू-रॉबिन्सन : अच्छी व्यवस्था की भूमिका


डगलस नॉर्थ और बाद में एसेमोग्लू-रॉबिन्सन ने कहा कि यूरोप में सरकार पर लगाम, संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा, और सबके लिए बराबर मौके इन सब वजहों से वहाँ निवेश और नए-नए विचारों को बढ़ावा मिला।


सिन्हा कहते हैं कि इस विचार ने यह दिखाया कि अच्छी व्यवस्था और सही नियम-कानून तरक्की में कितना मदद करते हैं। लेकिन साथ ही, नई रिसर्च यह भी बताती है कि चीन और बाकी गैर-यूरोपीय देशों की व्यवस्था भी उतनी कमज़ोर नहीं थी जितना पहले सोचा जाता था।


रॉबर्ट ब्रेनर : खेती में बदलाव


रॉबर्ट ब्रेनर ने बताया कि इंग्लैंड की खेती में एक खास बदलाव आया था - किसान अब ज़मीन किराए पर लेकर खेती करने लगे और मज़दूर काम पर रखे जाने लगे। इस नए तरीके ने खेती को बेहतर बनाया, जिससे आगे चलकर औद्योगिक क्रांति में मदद मिली। यह बदलाव किसी संस्कृति या भूगोल की वजह से नहीं, बल्कि समाज में हुए संघर्षों की वजह से आया।


सिन्हा कहते हैं कि ब्रेनर के विचार ने यह याद दिलाया कि आर्थिक तरक्की सिर्फ बाज़ार या तकनीक की बात नहीं है, बल्कि इसमें समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच के रिश्ते और संघर्ष भी बहुत मायने रखते हैं।


पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की भूमिका


बाद में आंद्रेयास माल्म जैसे विद्वानों ने कहा कि कोयले का इस्तेमाल सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं था, बल्कि इससे समाज में ताकत का बंटवारा भी बदल गया - मालिकों को मज़दूरों पर काबू पाने का एक नया तरीका मिल गया।


सिन्हा कहते हैं कि इस नज़रिए ने दिखाया कि कोयले के आने से सिर्फ मशीनें ही नहीं बदलीं, बल्कि समाज में किसकी कितनी ताकत है, यह भी बदल गया। यह कोई सीधा-सादा तकनीकी बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीति और वर्गों के हित भी छिपे थे।


उपनिवेशों से मिली ज़मीन और संसाधन


सिन्हा बताते हैं कि यूरोप की तरक्की के पीछे एक बड़ी वजह यह भी थी कि उसे उपनिवेशों में बहुत सारी ज़मीन मिल गई थी, जहाँ से कच्चा माल आता था और जहाँ यूरोप का बना हुआ सामान बेचा जाता था। इसे "घोस्ट एकरेज" यानी "छिपी हुई ज़मीन" कहा जाता है। इससे यूरोप को अपने यहाँ की ज़मीन और संसाधनों पर दबाव नहीं झेलना पड़ा, क्योंकि दबाव उपनिवेशों पर डाल दिया गया।


इस नज़रिए ने यह दिखाया कि यूरोप की तरक्की का पर्यावरण पर भी असर पड़ा, और यह असर ज़्यादातर उपनिवेशों पर पड़ा, यूरोप पर कम । इसने इस पुरानी सोच को चुनौती दी कि यूरोप की तरक्की सिर्फ उसकी अपनी काबिलियत की वजह से हुई।


सिन्हा यह भी बताते हैं कि इस बहस पर कुछ सवाल भी उठे हैं। कुछ विद्वान कहते हैं कि यूरोप और एशिया के बीच फर्क 1800 से पहले ही शुरू हो गया था, न कि पोमेरांज़ के कहे मुताबिक बाद में। कुछ और विद्वानों का कहना है कि पोमेरांज़ ने यूरोप के सबसे अच्छे इलाकों की तुलना एशिया के सबसे अच्छे इलाकों से की, जिससे पूरी तस्वीर साफ नहीं आती।


सिन्हा कहते हैं कि इन सवालों से बहस कमज़ोर नहीं हुई, बल्कि और मज़बूत हुई है। इन सवालों की वजह से इस विषय पर और गहरी रिसर्च हुई, जिससे औद्योगिक क्रांति को समझना और आसान हो गया।


इस बहस ने हमारी सोच को कैसे बदला कुछ मुख्य बातें


1. सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब औद्योगिक क्रांति को सिर्फ यूरोप की कहानी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की कहानी माना जाता है। यूरोप की तरक्की में उपनिवेशों के संसाधन, दुनिया भर का व्यापार और अलग-अलग देशों के बीच का जुडाव शामिल था।


2. पहले माना जाता था कि यूरोप का आगे निकलना तय ही था। अब यह माना जाता है कि यह सिर्फ कुछ खास हालात, मौकों और फैसलों का नतीजा था कोई पहले से तय रास्ता नहीं था।


3. तकनीक नहीं, राजनीति भी अहम पहले माना जाता था कि तकनीक ही सब कुछ है। अब यह भी समझा जाता है कि सरकार की नीतियाँ, उपनिवेशों से मिला फायदा, और समाज के अलग-अलग वर्गों के हित भी उतने ही ज़रूरी थे।


4. अब औद्योगिक क्रांति को समझने के लिए सिर्फ एक देश को नहीं देखा जाता, बल्कि यह देखा जाता है कि अमेरिका के खेत, यूरोप के कारखाने और एशिया के बाज़ार - ये सब आपस में कैसे जुड़े थे।


5. पहले औद्योगिक क्रांति को सीधी-सादी तरक्की माना जाता था। अब यह भी माना जाता है कि इससे कुछ देश आगे बढ़े और कुछ पीछे रह गए, यानी तरक्की सबके लिए बराबर नहीं थी ।


निष्कर्ष


सिंह के मुताबिक, डाइवर्जेंस बहस ने औद्योगिक क्रांति की पुरानी, यूरोप-केंद्रित कहानी को चुनौती दी है। इसने दिखाया कि यूरोप की तरक्की दुनिया भर से जुड़ी थी, यह कोई तय बात नहीं थी, और इसमें राजनीति व पर्यावरण दोनों का बड़ा हाथ था। यूरोप को दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ रखकर देखने से औद्योगिक क्रांति की एक ज़्यादा सच्ची और पूरी तस्वीर सामने आई है। इससे औद्योगिक क्रांति की अहमियत कम नहीं होती, बल्कि और बढ़ जाती है- क्योंकि अब हम जानते हैं कि यह किसी एक देश की अकेली


कामयाबी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की जुडी हुई कहानी है। यह बहस आज भी जारी है, और यह दिखाती है कि पुराने और जाने-पहचाने विषयों को भी नए नज़रिए से देखकर हम उन्हें और बेहतर समझ सकते हैं।


Bibliography 


Arvind Sinha  -  Europe in Transition : From Feudalism to Industrialization


Kenneth Pomeranz - The Great Divergence: China, Europe, and the Making of the Modern World Economy


Sven Beckert -  Empire of Cotton: A Global History

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भारतीय सामंतवाद (Debate)

उमरा वर्ग /अभिजात वर्ग

रोमन इतिहासलेखन परंपरा