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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

समाज सुधारकों का महिला शिक्षा में योगदान

समाज सुधारकों का महिला शिक्षा में योगदान  उन्नीसवीं शताब्दी में महिला शिक्षा के लिए समाज सुधारको ने साथ मिलकर संघर्ष किया। जिनमें प्रमुख रूप से ज्योतिबाराव फुले, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, राजा राम मोहन रॉय, सावित्री बाई फुले, सर सैयद अहमद खान, पंडिता रमाबाई और अन्य समाज सुधारक शामिल है। जिन्होंने महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन सुधारकों ने देखा कि कई मानदंड और परंपराएं महिलाओं को अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने से रोक रहे थे, इसलिए भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन शुरू हुआ जिसके लिए महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया गया। भारत में उस दौरान कई क्षेत्रों में बाल विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा और अन्य सामाजिक बुराइयाँ व्याप्त थीं। इसलिए, समाज सुधारकों ने महिलाओं की शिक्षा को, उन्हें सामाजिक बुराइयों से मुक्त कराने और उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के तरीके के रूप में देखा। सुधारकों ने समकालीन ज्ञान, विज्ञान, ईसाई धर्म की समतावादी और मानवतावादी शिक्षाओं और उदारवाद का उपयोग करके अंधविश्वास, रूढ़िवाद और क्रूर परंपराओं का विरोध किया। लेकिन सांस्कृतिक पुनरु...