जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

दिल्ली सल्तनत में फ़ारसी इतिहासकारों का इतिहासलेखन


फारसी इतिहास लेखन की प्रमुख विशेषताएं प्राचीन कथाओं, जीवन गाथाओं, परंपराओं, एवं वंशावलियों का विशुद्ध इतिहास प्रस्तुत करना था। फारसी इतिहास लेखन से अरब इतिहासकारों ने प्रेरणा ली। यह परंपरा मुगल काल में और विकसित हुई। अबूल फजल ने अनेक ग्रंथों की रचना की। उनकी रचना में फारसी इतिहास लेखन का प्रभाव दिखाई देता है। फारसी इतिहासकारों ने घटनाओं को तिथिक्रम के अनुसार लिखने का प्रयास किया। इसका स्वरूप राजतांत्रिक था और यह धर्म प्रभावित थी। क्योंकि लेखकों के इतिहास लेखन में निष्पक्षता का अभाव देखने को मिलता है। हमें कई इतिहासकारों का उल्लेख मिलता है जिसने दिल्ली सल्तनत की स्थापना, उत्थान और पतन के इतिहास को लिपिबद्ध किया है। इस दिशा में इतिहासकारों की एक श्रंखला मौजूद है, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में अपने लेखन के माध्यम से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

मिनहाज-उस्- सिराज़:- इन्होंने दिल्ली सल्तनत की स्थापना, उत्थान और पतन का इतिहास प्रस्तुत किया है। इनकी महत्वपूर्ण कृति तबक़ात-ए-नासिरी है। इस पुस्तक में दिल्ली सल्तनत का कालनुसार क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया गया है। इनकी रचना 23 अध्यायों में विभाजित है। जिसमें वे विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न राजवंशों का अलग-अलग विवरण देते हैं। अपनी रचना में इन्होंने अपने ही समय के 25 अमीरों की जीवनी शामिल की है। 

सुल्तान इल्तुतमिश के काल में इनका इतिहास अधिक विस्तृत हो गया। इन्होंने इल्तुतमिश के पुत्रों, अमीर वर्ग, काजियों तथा वजीरों का नाम शामिल किया है। अमीरों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान उलूग खां कहां पर दिया है। मिनहाज ने इस्लामी शासकों तथा सुल्तानों का इतिहास लिखने की योजना बनाई और आदम से आरंभ करके नसीरुद्दीन महमूद के शासन काल के 14 वर्ष तक अपने इतिहास को लिखो। यह राजनीतिक सत्ता के करीब थे। इसीलिए इनका इतिहास राजतंत्र के आसपास रहा। इन्होंने इतिहास लिखने के लिए वर्तमान में मौजूद सभी ऐतिहासिक ग्रंथों का अध्ययन किया और उसमें विश्वास रखा।

किंतु मिनहाज के इतिहास की यह कहकर निंदा की गई है कि,वह राजा और अमीरों के बारे में लिखते है जबकि आम आदमी की हालत पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया।

जियाउद्दीन बरनी:- यह दिल्ली सल्तनत के इतिहास को ग्यासुद्दीन बलबन से आरंभ करके उसे फिरोजशाह तुगलक के शासन काल के छठे वर्ष तक ले जाते हैं। इनकी महत्वपूर्ण कृति "तारीख-ए-फिरोजशाही" तथा "फतवा-ए-जहांदारी" है। बरनी की रचना कुलीन वर्ग और अमीर वर्ग के लिए लिखी गई है। क्योंकि उनका मानना था कि केवल वही इतिहास को समझ सकते हैं और उसका लाभ उठा सकते हैं। उनके अनुसार इतिहास लेखन एक ऐसा कार्य है जिसके द्वारा वह अपने सभी पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं। एक पाप जिसके लिए वे विशेष रूप से शर्मिंदा थे, वह था कि उन्होंने मोहम्मद तुगलक की उस समय आलोचना नहीं की जब उन्हें उसके अधार्मिक तथा क्रूर कार्य को देखा। बरनी ने फिरोजशाह तुगलक के शासन काल को 11 अध्याय में बांटा जिसमें उसके शासनकाल की सामान्य विशेषताओं का चित्रण किया गया है।

वह मानता था कि इतिहास लोगों को ईश्वरीय वचनों, पैगंबर के कार्यों तथा शासकों से परिचित कराता है। इनकी रचनाएं मध्यकालीन भारत के इतिहास लेखन के विकास को दर्शाती हैं।‌ उनकी तारीख-ए-फिरोजशाही का एक दोष यह था कि इसका कालानूक्रम दोषपूर्ण है। वे तिथि का संकेत कभी-कभार ही करते हैं और जब करते हैं तो वह हमेशा गलत होती है।

शम्स-ए-सिराज-अफीफ़:- बरनी की रचना के लगभग पचास वर्ष बाद अफीफ़ ने भी अपनी तारीख-ए-फिरोजशाही नाम की पुस्तक लिखी। इसने सल्तनत काल के अंतिम कुछ वर्षों का वर्णन किया है। किंतु इनकी रचना का कुछ अंश ही उपलब्ध है। जिसमें ग्यासुद्दीन तुगलक तथा मोहम्मद तुगलक के बारे में भी लिखा है। तैमूर के हाथों दिल्ली के विनाश के बारे में भी इन्होंने एक पुस्तक लिखी थी। यह फ़िरोजशाह तुगलक के शासनकाल को शांति एवं संपन्नता के युग के रूप में चित्रित करते हैं। यह शासनकाल के सकारात्मक पहलुओं पर बल देते हैं और नकारात्मक पहलुओं को ऐसे रूप में पेश करते हैं कि वह सकारात्मक लगने लगता है।

वह बताते हैं कि दरबार के धार्मिक उत्सवों में हिंदू भी शामिल होते थे और मुसलमानों के सामाजिक व्यवहार में बहुत से हिंदू रीति-रिवाजों का समावेश था। मिनहाज और बरनी की तुलना में यह सामाजिक हालातों पर अधिक प्रकाश डालते हैं। उनकी रचनाओं में पहली बार किसी मध्यकालीन इतिहासकार ने दरबारी क्षेत्र से निकलकर आम लोगों की समस्याओं की झलक दिखाई है।

मोरकोवासी इब्नबतूता:- यह मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में 1333 ई• में दिल्ली पहुंचा। इसकी विख्यात रचना "रेहला" है। इस युग की राजनीतिक गतिविधियों तथा सामाजिक हालातों के बारे में इस पुस्तक में जो जानकारी दी गई है उसकी वजह से इसे एक दिलचस्प दस्तावेज माना जाता है। किंतु इसकी पुस्तक मुहम्मद तुगलक के प्रति घोर दोष भावना से ग्रस्त है। किंतु उनका विवरण चीजों की ऊपरी जानकारी भर देकर रह जाता हैं। इसके बावजूद भी उनकी रचना को उचित सूचनाओं की खान के रूप में माना गया है।

ख्वाजा अब्दुल मलिक इसामी:- इनकी कृति फुतूह-अस-सलातीन है, जिसमें बादशाह की कटु आलोचना की गई है। यह मोहम्मद तुगलक के काफी विरोधी थे। इन्होंने अपनी रचना बहमनशाह के दरबार में की। बहमनशाह बहमनी राज्य का संस्थापक था और उसने स्वयं मोहम्मद तुगलक के खिलाफ विद्रोह किया था। इसलिए मुहम्मद तुगलक के बारे में उसका विवरण विरोधी था। फिर भी इसका अपना महत्व है क्योंकि यह बादशाह के बारे में कुछ अतिरिक्त सूचनाएं प्रदान करता है।

अमीर खुसरो:- खुसरो को छह सुल्तानों के अंतर्गत सेवा का मौका मिला। जिसमें जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मुबारकशाह तथा ग्यासुद्दीन तुगलक शामिल है। उन्होंने कई रचनाएं लिखी, जिसमें से कुछ रचनाओं के लिए इन्हें खास तौर पर कहा गया था जबकि कुछ रचनाएं उन्होंने शाही संरक्षकों को खुश करने के लिए लिखी। उनकी पहली रचना किरान-उस-सादेन है। इसमें दिल्ली, उसकी इमारतें, शाही दरबार, अमीरों और अफसरों के सामाजिक जीवन का विवरण दिया गया है। इस रचना के द्वारा उन्होंने मंगोलो के प्रति अपनी घृणा भी प्रकट की है।

उनकी दूसरी पुस्तक "मिफता-उल-फुतूह" थी। इसमें जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों, विद्रोह और उसका दमन तथा रणथंभोर पर सुल्तान की चढ़ाई और झायन पर विचार किया गया है। उनकी अगली पुस्तक खजाइन-उल-फुतूह है। जिसे तारीख-ए- अलाई के नाम से भी जाना जाता है। अलाउद्दीन खिलजी की समकालीन गतिविधियों का विवरण केवल इसी पुस्तक से मिलता है। इसमें हमें मलिक काफूर के दक्कन अभियानों का आंखों देखा विवरण देखने को मिलता है। इसमें भारत का बड़ा ही अच्छा चित्रण और साथ ही अलाउद्दीन के भवनों तथा प्रशासनिक सुधारों का वर्णन भी किया गया है।

खुसरो की अंतिम रचना "तुगलकनामा" है। इसमे ग्यासुद्दीन तुगलक की विजय का चित्रण किया गया है। अमीर खुसरो की एक विशेषता यह है कि उन्होंने बहुत सी तिथियां दी है और उनके द्वारा दिया गया कालक्रम बरनी की अपेक्षा कहीं अधिक विश्वसनीय है। इनकी रचनाएं भी तत्कालीन सामाजिक स्थितियों पर काफी प्रकाश डालती है। जैसे सैन्य अभियानों के विवरण, शहरों, व्यवसायों, खेल-खिलाड़ियों तथा संगीत एवं नृत्य का वर्णन भी इनकी रचनाओं से मिलता है।

याहया बिन अहमद सिरहिंदी:- इनकी प्रमुख रचना "तारीख-ए-मुबारकशाही" है। फिरोजशाह तुगलक के बाद जो युग आया उसकी जानकारी इनकी रचना से मिलती है। अपनी रचनाओं में उन्होंने मिनहाज और बरनी के विवरण का सहारा लिया। उनकी दिलचस्पी सैनिक एवं राजनीतिक इतिहास में थी और उन्होंने कालक्रमानुसार अपनी रचनाएं की। मुबारक शाह से उनकी घनिष्ठता थी और सैयद शासक को उन्होंने अपनी रचना समर्पित की।

निष्कर्ष:- फारसी इतिहास लेखन की परंपरा वहां की संस्कृति की उपज थी जो यूनान और इस्लाम के संपर्क में आने से और समृद्ध हो गई। फारसी इतिहासकारों ने मध्यकाल के प्रारंभ में इतिहास लेखन की परंपरा स्थापित कर दी थी। फारसी इतिहासकार इतिहास को बादशाहों की कहानी मानते थे इसलिए उनके इतिहास का दायरा राजतंत्र तक सीमित रहा। फारसी इतिहासलेखन में धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

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