जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया
सोलवीं सदी में यूरोप में व्यापक आर्थिक विस्तार हुआ। यह विस्तार व्यापार के विकास, औपनिवेशिक साम्राज्य के उदय और वाणिज्यिक संपन्नता से जुड़ा था। जनसंख्या बढ़ने से उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ी। इससे बाजार में कारोबार बढ़ा। इन बढ़ते आर्थिक कारोबारों को चलाने के लिए वाणिज्यिक उपकरणों का महत्व महसूस किया गया। इस दौरान वाणिज्यिक उपकरणों का उपयोग बढ़ गया। इससे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज हुई और सामंतवाद से पूंजीवाद में परिवर्तन हुआ। कई विद्वानों ने इसे "वाणिज्यक क्रांति" कहा है। इस वाणिज्यिक क्रांति का असर शहरी जीवन के हर क्षेत्र में हुआ। वाणिज्य क्रांति के बारे में दो अलग-अलग विचार प्रचलित है। पहले के अनुसार 16वीं सदी का समय वित्त के इतिहास में निर्णायक था। दूसरे विद्वानों के अनुसार ऋण, बैंकिंग और दोहरा खाता पद्धति जैसी महत्वपूर्ण वित्तीय तकनीक काफी पहले विकसित हो चुकी थी लेकिन 16वीं सदी में इनका प्रचलन बढ़ गया।
यूरोप में व्यापार का विस्तार वाणिज्यिक उन्नति का एक प्रमुख कारण था। कई देश और क्षेत्र व्यापार के कारण एक दूसरे से जुड़ गए। यूरोप में बढ़ते धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक हलचल के कारण समुद्री मार्ग लोकप्रिय हो गए। समुद्री व्यापार न केवल सस्ता बल्कि अधिक तेज और आसान था। बढ़ती आबादी के कारण खाद पदार्थों की मांग बढ़ने लगी।
आबादी बढ़ने के कारण उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ी। मध्यवर्ग के उदय से व्यापार और उद्योग को बढ़ावा मिला। अनेक शहरी केंद्र उभर आए और शहरों का आकार बड़ा होने लगा। उपभोक्ता वस्तुओं की शहरी मांग और व्यवसाय के बड़े पैमाने के लिए अधिक कौशल और निपुणता की आवश्यकता थी। यह स्थिति नए वाणिज्यिक उपकरणों की स्वीकृति के लिए अनुकूल थी। सरकार और उद्यमियों ने नई संस्थाएं बनाई और पुरानी संस्थाओं को निष्क्रिय कर दिया। जनसंख्या दबाव और चांदी की अधिक मात्रा के कारण मूल्यों में वृद्धि हुई। मूल्य वृद्धि से व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी और मुद्रा अर्थव्यवस्था का तेजी से विस्तार हुआ।
बड़े वाणिज्यिक उद्यमों के लिए नए अवसर खुले क्योंकि मुद्रास्फीति अधिक लाभ की संभावना प्रदान करती है। बढ़ते व्यापार को सुगम बनाने के लिए मौद्रिक लेन-देन को सरल बनाया गया। व्यावसायिक संस्थाओं का पुनर्गठन किया गया।
वाणिज्यिक जगत की मूलभूत आवश्यकता पूंजी थी। 15 वीं सदी के औपनिवेशिक उघम व्यापारी बैंकरो जैसे इतावली राज्यों के व्यवसायिक घराने जेनोवा, वेनेशिया और फ्लोरेंस के परिवारों और जर्मनी के फ्यूगर परिवार आदि द्वारा मुहैया कराए गए वित्त से चलते थे। व्यापार के विस्तार के लिए पूंजी निवेश की आवश्यकता महसूस हुई। कई बैंकरो और उद्यमियों को निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया। सोलवीं सदी के दौरान फ्रांस, हालैंड और इंग्लैंड में अनेक नए बैंकर उभरे। धीरे-धीरे सार्वजनिक और निजी बैंक अलग होने लगे। पहला सार्वजनिक बैंक 15वीं सदी में बार्सिलोना और जेनोवा में बना। सोलवीं सदी के उत्तरार्ध में सार्वजनिक बैंक उभरने लगे। 1587 में वेनिस की सरकार ने "बैंक ऑफ रियल्टो" की स्थापना की। यह बैंक धन जमा और मुद्रा का हस्तांतरण करता था।
यह बैंक अतिरिक्त धन को जमा करने के लिए एक सुरक्षित स्थान मुहैया कराकर धन एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। बैंकिंग प्रणाली के उदय के साथ वित्तीय लेन-देन की नई पद्धति भी अपनाई गई। वाणिज्य क्रांति में नए क्रेडिट उपकरणों और सुविधाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
बिल्स ऑफ एक्सचेंज:- घरेलू और भारी व्यापारिक कार्यों में बिल्स ऑफ एक्सचेंज का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाने लगा। इसका फायदा यह हुआ कि अब भुगतान करने के लिए बड़ी मात्रा में धन एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की आवश्यकता नहीं थी। अब व्यापारी एंटवर्प के बैंकर द्वारा जारी हुंडी के जरिए लिस्बन में वस्तुएं खरीद सकता था। बाद में बैंकर और उसके एजेंट के बीच लेखों का निपटान किया जाता था। यह हुंडी अंतिम रूप से जमा करने के पहले कई लोगों को दी जा सकती थी। यह मंजूरी की रिवायत पर आधारित थी और जिस व्यक्ति के नाम पर हुंडी जारी होती थी वह इसे स्वीकार करता था। इसके अलावा कई क्रेडिट उपकरण थे। इनमें वचन पत्र शामिल थे जो धारक को देय होते थे। 17वीं सदी के दौरान बैंक नोट्स जारी करने की प्रथा इसी से निकली।
व्यापारी को उसके मुद्रा समय से पहले मिल जाती थी और इससे बैंकरों को आए होती थी। क्रेडिट उपकरणों की एक महत्वपूर्ण विशेषता हुंडीयों का एक व्यक्ति से दूसरे के पास हस्तांतरण और नकदी में इसका रूपांतरण होना था। व्यापार की मात्रा बढ़ाने में नकदी के बदले हुंडी, साख पत्र, वचन पत्र और बैंक नोट्स के जरिए ऋण व्यापार का काफी महत्व था।
बैंकिंग प्रणाली के गाने और क्रेडिट उपकरण के बढ़ते उपयोग से बीमा की अवधारणा मजबूत हुई। समुद्रपार उद्यमों में खतरे बहुत अधिक थे। लंबी दूरी के व्यापार में लगे फर्म और व्यक्तियों को समुद्री पार यात्रा के दौरान न केवल प्राकृतिक आपदाओं बल्कि समुद्री लुटेरों का भी सामना करना पड़ता था। इस खतरे को कवर करने के लिए बीमा अनिवार्य हो गया। 15वीं सदी के आरंभ से नौपरिवहन निर्माण शुरू हो गया। यह बैंकरो या व्यापारियों द्वारा किए जाते थे। वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था के विस्तार से नगरों में स्थाई बाजार उभरने लगे। वस्तुओं को बेचने और इसका भंडारण करने के लिए नीलामी की प्रथा मजबूत हुई। इससे बिचौलियों का उदय हुआ। जो इस नई विनिमय प्रणाली से लाभ कमाते थे।
विनियमित कंपनी:- यह कंपनी एक विशिष्ट प्रकार के व्यापार पर एकाधिकार और नियंत्रण के लिए व्यापारियों का संघ थी। इसके सदस्य कुछ विशिष्ट नियमों का पालन करने के लिए सहमत होते थे, लेकिन वह अपने संसाधनों को एक साथ नहीं मिलाते थे। वे लाभ के लिए परस्पर सहीयोगी रहते थे। यह कंपनियां चार्टर्ड थी। इन्हें अपनी अपनी सरकारों से एकाधिकार प्राप्त थे। यह विदेशों में व्यापार केंद्र रखती थी और एकाधिकार का लाभ उठाते थी। इस कंपनी को "ज्वाइंट स्टॉक कंपनी" में तब्दील कर दिया गया। यह अधिक संगठित थी और इसका दायरा भी बड़ा था।
ज्वाइंट स्टॉक कंपनी की विशेषता पूंजी का यूनियन था। अनेक लोग निवेशकों को दिए जाने वाले शेयर खरीदते थे। वास्तविक शेयरधारक कंपनी का कार्य चुने हुए निर्देशकों को सौंप देते थे और अपने निवेश के अनुपात में लाभ या हानि प्राप्त करते थे। यह कंपनी कई प्रकार के लाभ देती थी। किसी सदस्य की मृत्यु या इससे हटना से एक कंपनी विघटित या पुनर्गठन नहीं की जाती थी। समय बीतने के साथ यह कंपनी स्थाई स्वरूप की बनती गई। इसने शेयरधारकों को सुझाव दिया कि वह अपने शेयर स्टॉक एक्सचेंज में बेच कर अपने लाभ प्राप्त कर ले।
इसे स्टॉक बाजार में कंपनी शेयर बेचने की प्रथा चल पड़ी। ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में साधारण लोग भी अपनी बचत इन बड़े उद्योगों में निवेश करके लाभ प्राप्त कर सकते थे। बाद में यह औद्योगिक उद्यमों में शामिल हो गई। वाणिज्यिक क्रांति का एक रोचक पहलू यूरोप के वाणिज्यिक नगरों में स्टॉक एक्सचेंज का निर्माण था। स्टॉक एक्सचेंज "केंद्र सर्राफा" भी कहलाते थे। "फर्नेंद ब्रोदेल" के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बैंकरो, व्यापारियों और व्यवसायियों, मुद्रा व्यापारी और बैंकर्स एजेंट्स, दलालों और निवेशकों का मिलन स्थल था।
वाणिज्यिक क्रांति से मुद्रा अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। उद्योग के विकास से एक समान मौद्रिक प्रणाली और वित्तीय स्थिरता का उदय हुआ। क्रेडिट और वाणिज्य कारोबार के नए उपकरणों को लोकप्रिय बनाकर वाणिज्य क्रांति ने सोलवीं सदी के अंत में मुद्रास्फीति की स्थिति पैदा कर दी। सट्टेबाजी के कारण इसमें और वृद्धि हुई। लेकिन व्यापार के विस्तार, ऋण के उपकरणों के विकास, बीमा योजना और सट्टा बाजारों से प्रतिस्पर्धा का माहौल बना और अधिक बेहतर संगठन बने। यह प्रवृतियां बाद में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण पहलू बन गई।
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