जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया
प्रश्न:- सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बाजार नियंत्रण के लिए अपनाई गई नीतियों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
परिचय:- सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जब गद्दी पर बैठा तब दिल्ली सल्तनत की स्थिति काफी मजबूत थी। जिसकी बदौलत सुल्तान ने कुछ आंतरिक सुधार किए, जिनका उद्देश्य प्रशासन को बेहतर बनाना, सेना को मजबूत करना, मालगुजारी प्रशासन को दुरुस्त करना, कृषि के प्रसार और सुधार के उपाय करना तथा तेजी से फैलते नगरों के नागरिकों के कल्याण का प्रावधान करना था। बाजार पर नियंत्रण के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने जो कदम उठाए वे उसके समकालीनों की दृष्टि में दुनिया के महान अचंभो में से एक थे। अलाउद्दीन ने अनाज, शक्कर और भोजन पकाने के तेल से लेकर एक सुई तक और कीमती आयातित कपड़ों से लेकर घोड़ों, मवेशियों और गुलाम लड़के और लड़कियों तक सभी वस्तुओं के दाम तय करने की कोशिश की। इस मकसद से उसने दिल्ली में तीन बाजार स्थापित किए, एक अनाजों के लिए, दूसरा कीमती कपड़ों के लिए और तीसरा घोड़ों, गुलाम और मवेशियों के लिए। हर बाजार "शहना" नाम के एक उच्च अधिकारी के नियंत्रण में था जो सौदागरों का रजिस्टर रखता था और दुकानदारों व कीमतों पर सख्त नियंत्रण रखता था।
बाजार पर नियंत्रण के पीछे अलाउद्दीन के कुछ कारण थे। बलबन के काल में केंद्रीय सेना दो लाख थी, जो अलाउद्दीन ने बढ़ाकर तीन लाख कर दी। दिल्ली पर मंगोलो के हमलो ने उसे बड़ी सेना खड़ी रखने की आवश्यकता दिखा दी थी।
सुल्तान ने अनाजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए दोआब क्षेत्र की, यमुना किनारे स्थित मेरठ से लेकर इलाहाबाद तक की मालगुजारी सीधे राज्य को देने का ऐलान किया। मालगुजारी भी बढ़ाकर उपज की आधी कर दी गई। यह किसानों पर एक भारी बोझ था। जमाखोरी ना हो यह सुनिश्चित करने के लिए सभी बाजारों का पंजीकरण किया गया और उनके एजेंटों और परिवारवालों को कानून के किसी भी हनन के लिए सामूहिक रूप से उत्तरदाई ठहराया जाता था। इससे भी आगे बढ़कर राज्य ने अपने गोदाम भी बनाए और उन्हें अनाजों से भर दिया, जो अकाल पड़ने पर या आपूर्ति में कमी का डर पैदा होने पर खोले जाते थे। अलाउद्दीन स्वयं सभी बातों की खबर लेता रहता था। कोई दुकानदार अधिक दाम लेता या जाली भाटो का प्रयोग करके धोखाधड़ी का प्रयास करता था तो उसे बहुत कठोर दंड दिया जाता था।
"बरनी" के अनुसार अकाल तक के दिनों में कीमतों में एक पैसा बढ़ोतरी की भी इजाजत नहीं दी जाती थी। बरनी का कथन है कि "अनाज मंडी में कीमतों की स्थिरता इस युग की एक आश्चर्यजनक घटना है"।
घोड़ों की कीमतों पर नियंत्रण सुल्तान के लिए आवश्यकता था क्योंकि सेना को मुनासिब दामों पर घोड़ों की आपूर्ति के बिना उसकी दक्षता को बचाकर नहीं रखा जा सकता था। गुजरात की विजय के फलस्वरूप घोड़ों की आपूर्ति में सुधार आया। अच्छी नस्ल के घोड़े सिर्फ राज्य को बेचे जाते थे। अलाउद्दीन ने प्रथम श्रेणी के घोड़े की कीमत 100 से 120 टंके तय की थी, जबकि सेना के लिए अनुपयुक्त घोड़ों की कीमत 10 से 25 टंके थी। मवेशियों और गुलामों की कीमतों पर भी सख्त नियंत्रण था तथा बरनी ने विस्तार से उनके दाम दिए है। उम्दा किस्म के कपड़े देश के विभिन्न भागों से दिल्ली लाने के लिए मुल्तान व्यापारियों को बड़ी बड़ी पेशीगी दी जाती थी। फलस्वरूप, दिल्ली उम्दा कपड़ों का सबसे बड़ा बाजार बन गया; इनकी कीमतें तय की गई थी और तमाम स्थानों की व्यापारी दिल्ली से कपड़े खरीदकर ऊंची कीमतों पर कहीं और बेचते थे।
इतिहासकार बरनी का विचार है कि बाजारों पर अलाउद्दीन के नियंत्रण का प्रमुख उद्देश्य हिंदुओं को दंड देना था, क्योंकि अधिकांश व्यापारी हिंदू थे तथा अनाज और दूसरी वस्तुओं में मुनाफाखोरी वही करते थे। अलाउद्दीन खिलजी ने मालगुजारी जमीन की माप के आधार पर तय की। इसका मतलब यह था कि गांव के अमीर और ताकतवर व्यक्ति जिनके पास अधिक जमीने थी, अपना बोझ गरीबों के सर नहीं डाल सकते थे। इसलिए उन्हें दूसरों की तरह दूध देने वाले पशु और घरों पर कर देने पड़े तथा दूसरे गैरकानूनी तरीके त्यागने पड़े जिनको वसूल करने की उन्हे आदत थी।
सराय-ए-अदल:- यह निर्मित वस्तुओं तथा बाहर के प्रदेशों तथा विदेशों से आने वाले माल का बाजार था। सुल्तान के आदेश पर प्रत्येक वस्तु को व्यापारी द्वारा इस बाजार में लाया जाता था। एक टंके से लेकर दस हजार तक के मूल्य की वस्तु इसमें लाई जाती थी। जो इन नियमों का उल्लंघन करता था उसे कठोर दंड दिया जाता था और उसकी वस्तुएं जब्त कर ली जाती थी। दिल्ली में व्यापार करने वाले व्यापारियों को अपना नाम दीवान-ए- रियासत में दर्ज कराने का आदेश दिया गया।
व्यापारियों को एक करारनामें पर हस्ताक्षर भी करने पड़ते थे कि वह निश्चित मात्रा में नगर में माल लाएगा और उसे नियंत्रित दरों पर बेचेगा। सुल्तान ने राजकीय कोष से व्यापारियों को धन मुहैया करवाया, जिससे वे माल खरीदकर नियंत्रित दरों पर सराय-ए-अद में बेंच सकें। "इब्नबतूता" कहते हैं कि सुल्तान ने व्यापारिक मार्ग पर सभी कर समाप्त कर दिए और व्यापारियों को धन मुहैया करवाया। सुल्तान ने कहा कि "इस धन से बैल और भेड़े खरीदो और उन्हें बेंचों, उनसे जो धन प्राप्त होगा वह कोषागार में चुका दिया जाना चाहिए और बेचने के उपलक्ष में तुम्हें भत्ता मिलेगा"।
सुल्तान का एक और नियम परवानानवीस(परमिट देने वाले अधिकारी) की नियुक्ति और अधिकार से संबंधित था। अलाउद्दीन ने आदेश दिया कि बहुमूल्य वस्त्र बेचे नहीं जा सकते जब तक कि परवानानवीस से परवाना लेने वाले अमीरों, मालिकों और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों के परिचय पत्र से वह संतुष्ट ना हो और उनकी आय के आधार पर परमिट न दे। खरीदार को खरीदी हुई वस्तु की प्राप्ति-स्वीकृति के रूप में एक लिखित रसीद देनी पड़ती थी। ऐसा कालाबाजारी रोकने के लिए किया गया था।
बरनी की सूची के अनुसार घर में काम करने वाली दासी का मूल्य 5 से 12 टंके, सुंदर युवा दास 20 से 30 टंके, अपने कार्य में दक्ष दास की कीमत 10 से 15 टंके तथा अयोग्य दास की कीमत 7 से 8 टंके रखी थी।
अलाउद्दीन ने मूल्य नियंत्रण संबंधी आदेशों के उल्लंघन के लिए कठोर दंड देने का आदेश दिया और वाणिज्य मंत्री नजीर याकूब ने उन्हें कार्यान्वित किया। उसकी मान मर्यादा बढ़ाने के लिए उसे साम्राज्य का नाजिर (नाप-तौल अधिकारी) भी नियुक्त किया। नाजिर याकूब की कठोर देखभाल के बावजूद भी व्यापारी ग्राहकों को छलते थे, खोटे बाट रखते थे और अच्छी किस्म की वस्तुएं अलग रखते थे। परिणामस्वरूप अलाउद्दीन अपने छोटे गुलाम लड़कों को कुछ पैसे देकर भिन्न-भिन्न वस्तुएं खरीदने को भेजता था। याकूब इन लड़कों द्वारा लाए गए सामान की जांच करता था और यदि कोई दुकानदार कम तौलता था, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था। इस कड़े नियंत्रण का प्रभाव यह पड़ा कि बाजार व्यवस्थित हो गया।
निष्कर्ष:- अलाउद्दीन की बाजार संबंधी नियम उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गए, पर इससे अनेक लाभ भी अवश्य प्राप्त हुए। बरनी हमें बतलाता है कि इन नियमों के सहारे अलाउद्दीन ने एक विशाल सवार सेना खड़ी की जिसके बलबूते उसने बाद के मंगोल हमलो को भारी नरसंहार करके नाकाम कर दिया और उनको सिधुं नदी के पार खदेड़ दिया। अलाउद्दीन के मालगुजारी संबंधी सुधार देहाती क्षेत्रों के साथ अधिक घनिष्ठ संबंध स्थापित करने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था। आगे चलकर इन सुधारों ने शेरशाह और अकबर के खेतिहर सुधारों के लिए आधार का काम किया।
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