जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

यूरोप में मानवतावाद का विकास (पुनर्जागरण काल)

मानवतावाद का उदय यूरोप में हुए पुनर्जागरण काल के दौरान हुआ। यूरोप में मध्यकाल का अंत नए बौद्धिक विचारों के उदय से हुआ, जिसे पुनर्जागरण काल कहा जाता है। इसकी शुरुआत इटली से हुई और इसके बाद यह पूरे यूरोप में छा गया। उसने जीवन के सभी पक्षों समाज, चर्च, कर व्यवस्था, साहित्य और विज्ञान को प्रभावित किया। इसका केंद्रीय लक्ष्य मध्यकालीन मानसिकता का निषेध था। पुनर्जागरण काल से पूर्व मध्यकाल में ईसाई धर्म का बोलबाला था। मध्यकालीन ईसाई धर्म का विश्वास था कि मनुष्य का सांसारिक जीवन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसे अपनी आत्मा के उद्धार के लिए ईश्वर की कृपा की आवश्यकता होती है। अत: ईसाई धर्म में मनुष्य के सांसारिक सहज जीवन की जो उपेक्षा हुई, उसी के विरुद्ध पुनर्जागरणकालीन मानववादियों ने आवाज उठाई। उन्होंने यह बताया कि मृत्यु के पहले भी मानव जीवन की सार्थकता है, उसका मूल्य है, और उसमें अनंत संभावनाएं हैं।

शिक्षित अभिजात वर्ग के लोग और बौद्धिकों ने एक आंदोलन का रूप ले लिया, जो हूमैनिस्ट्स या मानववादी कहलाते थे। एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में मानववादियों ने प्राचीन ग्रीक और रोम की पुस्तकों का अध्ययन किया। इनकी रुचि पुरातात्विक अध्ययन, भाषाशास्त्रीय अध्ययन तथा अतीत के अध्ययन से लेकर महाकाव्यों, अनुवादों और मूल पांडुलिपियों तक में थी। इनके विषय के दायरे में दृश्यकला, नीतिशास्त्र, दवा और गणित आदि आते थे।

इटली के राज्यों की बहुत बड़ी आबादी शहरी थी। इसमें शिक्षित आम आदमी, वकील और नौकरशाह शामिल थे। इसी वर्ग के लोगों ने मानववाद के विचारों को बढ़ावा दिया। इटली के मानववादी प्राचीन साहित्य के ज्ञान का उपयोग अपने स्तर को बढ़ाने के लिए करते थे। अलंकार, ने सार्वजनिक भाषणों की कला, व्यावसायिक और सरकारी पत्रों के लिखने में, वकालत में और राजनय संबंधी बातचीत में काम आता था। क्योंकि कई मानववादी शिक्षकों, सचिवों या शासकों और नगर परिषदों के चांसलर, विदेशी दरबारों में राजदूत जैसे प्रभावशाली पद पर आसीन थे। राज्य के मामले में उनका बहुत बड़ा प्रभाव था। वह काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष थे।

फ्लोरेंस में मानववादी शिक्षा के कई केंद्र थे जैसे फ्लोरेंस, पादुवा, विसेंजा और वेरोना। मानववादी गतिविधियों का एक केंद्र फ्रांस में था। फ्रांस की विशेषता यह थी कि पोप ने विद्वानों और लेखकों को संरक्षण प्रदान किया। एक महत्वपूर्ण पुस्तकालय बनवाया जिसमें बहुत सारी पुस्तकें और पांडुलिपियां थी। उसके सबसे प्रख्यात बुद्धिजीवी "फ्रांसिस्को पेट्राक" थे, उन्हें "मानववाद का जनक" कहा जाता है। उन्होंने प्राचीन मूल्यों और शैलियों में परिवर्तन और सुधारों का सुझाव दिया। मध्ययुग की भत्सर्ना करने वाले वह पहले व्यक्ति थे। 

जियोवानी बोकाचियो एक अन्य मानववादी थे। इन्होंने प्राचीन मिथक, भूगोल और इतिहास पर पुस्तकें लिखी। उन्होंने विद्वानों, कलाकारों और संगीतकारों को एक नई अंतर्दृष्टि दी। पेट्रोक के समान वह भी मानते थे कि कविता एक साधन है जिसके जरिए सच्चाई को प्रस्तुत किया जा सकता है। इनके विचारों ने नागरिक मानववाद के विकास में प्रेरणा स्रोत का काम किया। यह लोग मानते थे कि अपने राज्य के लिए जीवन बिताना अनिवार्य है, और धन-दौलत तभी काम का है जब यह कार्य की शक्ति में वृद्धि करता हो।

मानववादी मानते थे कि नागरिक मामलों में सक्रिय जीवन बौद्धिक क्षमता के विकास को बढ़ावा देता है। राज्य के मामलों में भागीदारी से कोई व्यक्ति बौद्धिक और नैतिक दोनों रूप में परिपक्व होता है। नैतिक मूल्य सार्वजनिक जीवन के भीतर छिपे होते हैं, इसलिए सार्वजनिक जीवन में भागीदारी नैतिक कार्य माना जाता है। सार्वजनिक शुचीता को बढ़ावा देने के लिए लोगों को तैयार करना और गणराज्य विशेषताओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार और प्रशासन को चलाने में लोगों को समृद्ध बनाना मानववादी अपना काम समझते थे।

व्यक्तिवाद और धर्मनिरपेक्षवाद मानववाद के अन्य पहलू थे। व्यक्तिगत क्षमता पर बल दिए जाने से नए सामाजिक विचारों का जन्म हुआ। मानववादी मानते थे कि ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना की और हर दृश्य चीज में उस रचनाकार ने अपने चिन्ह छोड़े। ईश्वर को पूरी तरह समझने के लिए मनुष्य को बहुत कठिन श्रम करना होगा क्योंकि मनुष्य में ही इन चिन्हों को पहचानने की क्षमता है। मानववादियों ने मनुष्य को पृथ्वी पर ईश्वर के सृजन का सर्वोच्च रूप माना।

मानववादी मानते थे कि ईश्वर ने ब्रह्मांड के लिए निश्चित व्यवस्था दी है और मनुष्य अपने अच्छे और बुरे कामों के लिए खुद जिम्मेदार है। मानव इच्छा और मानवीय नैतिकता ईश्वर द्वारा नहीं बल्कि मनुष्य द्वारा नियंत्रित है। वे मानते थे कि व्यक्तिवादी जीवन की तुलना में सार्वजनिक जीवन दूसरों को अधिक लाभ पहुंचाता है और इसकी प्रशंसा भी होती है। मानववादी एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहते थे जिससे मनुष्य की क्षमता पूर्ण विकसित हो सके और उसकी मानसिक शक्ति अपनी संभावनाओं की ऊंचाई को प्राप्त कर सकें।

मानववादियों ने प्राचीन, मध्य और आधुनिक युग में इतिहास के काल विभाजन की अवधारणा शुरू की। उन्होंने इतिहास दोबारा लिखने में अहम भूमिका निभाई। उनका इतिहास धर्मनिरपेक्ष नजरिए पर आधारित था जिसमें इतिहास लेखन को देवी क्षेत्र की प्रक्रिया नहीं माना जाता था। उदार शिक्षा का विचार प्रस्तुत किया और उसे प्रचलन में लाए। किंतु मानववादी शिक्षा जनसाधारण के लिए नहीं बल्कि केवल अभिजात वर्ग तक सीमित थी। पुरालेखशास्त्र और मुद्राशास्त्र जैसे नए विषयों की स्थापना की गई।

इटली मानववाद का प्रभाव यूरोप देशों में एक समान नहीं था। स्पेन में मानववादी आंदोलन इसाई मानववाद का एक रूप था, जिसने वहां रूढ़िवादी रूप धारण कर लिया।इसका इस्तेमाल चर्च की प्रतिष्ठा को बढ़ाने और पादरियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता था। इंग्लैंड, फ्रांस और स्पेन में मानववाद मूल रूप से नई शिक्षा और शैक्षणिक सुधारों का आंदोलन रहा। इसका नेतृत्व महत्वपूर्ण विद्वानों और चर्च के नेताओं ने किया।

जर्मनी में मानववाद ने एक अलग विपरीत रूप लिया। जर्मनी में इसका रोम विरोधी चरित्र विकसित हुआ। जर्मनी में यह धार्मिक सुधारों तथा बंधुत्व-समुदायों के आंदोलन के रूप में आरंभ हुआ। मानववाद जर्मनी के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में प्रवेश कर चुका था। इसने मध्ययुगीन शैक्षिक प्रभुत्व को सफलतापूर्वक कम किया। इसे नगरों और शहरों के उन लोगों का समर्थन मिला जिन्होंने सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के कारण दुख झेला था। मानववादी विचारों को दरबारों में और बिशपों के बीच भी समर्थन मिला। मानववादियों ने राजनीतिक सुधारों और चर्च पर हमलोन पर ध्यान केंद्रित किया। जिससे धार्मिक-सुधार के अनुकूल वातावरण का निर्माण हुआ।

मानववाद की शुरुआत इटली के नगर राज्य से हुई। मनुष्य को बौद्धिक रूप से सक्षम बनाने के लिए इसकी शुरुआत हुई। इटली के बाद यह यूरोप के अन्य देशों में फैला। किंतु इटली के मानववाद के विपरीत इसने इसाई मानववाद का रूप धारण कर लिया। इटली के बाहर के क्षेत्रों में इसका ईसाई मतों के साथ मिश्रण हो गया। इसे इसाई मानववाद कहा जाने लगा क्योंकि अधिकांश स्थानों पर चर्च, पोप और इसाई विद्वानों ने इसे मंजूरी दी। यहां मनुष्य की खोज का मतलब ईश्वर का त्याग नहीं था। इसका उद्देश्य बाइबिल संबंधी अध्ययन के प्रसार और मध्यकालीन धर्मशास्त्र की आलोचना पर था। इटली के बाहर मानववादियों के अनुसार प्राचीन शिक्षा और बाइबिल के अध्ययन से धर्म और बौद्धिकता में बेहतर तालमेल बनाया जा सकता था।

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