जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया
इस काल में जर्मनी में बदनाम पादरियों की मोक्ष दिलाने की भूमिका का प्रभाव कम हो रहा था। मानववादी आंदोलन के द्वारा पादरी विरोधी भावनाएं काफी सुदृढ़ हो गई थी। जिसने पादरी सत्ता को नष्ट करने में मदद की। विकसित हो रही है राष्ट्रवादी भावनाओं से भी धर्म सुधार आंदोलन के सफल होने में सहायता मिली। जर्मनी की राजनीति और सामाजिक-आर्थिक हालात प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आंदोलन के उदय और प्रसार के अनुकूल थे। यह धर्म सुधार आंदोलन जर्मनी के कैथोलिक चर्च के खिलाफ आरंभ हुआ। इस आंदोलन में मार्टिन लूथर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मानववाद के विकास से ऐसी अभिरुचि जागी जिसमें मनुष्य ईश्वर के साथ संबंध स्थापित कर सकता था। इस विचारधारा को मध्यम वर्ग एवं सामान्य वर्ग का समर्थन मिला। "दोषमुक्ति" की बिक्री की प्रथा ने मार्टिन लूथर के नेतृत्व में धर्म सुधार आंदोलन की चिंगारी जला दी।
दोषमुक्ति की प्रथा ईश्वर से क्षमा मांगने के बदले में धन या दान देने के रूप में आरंभ हुई। बाद में यह चर्च की आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया। शुरुआत में इसका अभिप्राय किसी किए गए पाप के लिए चर्च द्वारा दिए जाने वाले दंड से माफी होता था। किंतु बाद में यह ईश्वर द्वारा दिए जाने वाले दंड से माफी बन गई। इस प्रकार ईश्वर की दया और क्षमा को पोप के एजेंटों द्वारा बेचा जा रहा था। मार्टिन लूथर ने इस प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाया। जो चर्च द्वारा किए जा रहे शोषण और धार्मिक सिद्धांत को गलत ढंग से प्रस्तुत किए जाने के विरुद्ध सीधा हमला था।
मार्टिन लूथर ने एक संत जीवन अपनाया था। लूथर के धर्म सुधार आंदोलन की शुरुआत एक साधारण से प्रश्न से हुई जो अक्सर ईसाई प्रजा द्वारा पूछा जाता था- ईश्वर से क्षमा याचना के लिए क्या किया जाना चाहिए? लूथर का उत्तर चर्च की पारंपरिक रिवायतों में फिट नहीं बैठा और इसलिए उन्हें चर्च से अलग होना पड़ा। वह तुरंत एक समाज सुधारक बन गए।
मोक्ष प्राप्ति की प्रचलित मान्यताओं से लूथर संतुष्ट नहीं थे। 1517 में मार्टिन लूथर का सामना दोषमुक्ति की बिक्री की प्रथा से हुआ। उन्होंने इसकी कटु आलोचना की। उन्होंने विटेनबर्ग में चर्च के दरवाजे पर "नाइंटी फाइव थीसिस" चिपका दिया और उनसे असहमत सभी लोगों को इसका खंडन करने की चुनौती दी। इस कार्रवाई से लोग तुरंत उनकी ओर आकर्षित हुए। लूथर का विरोध उस धर्म सिद्धांत के खिलाफ था जो विवादास्पद था।
इसके बाद के 3 वर्षों में उनकी धार्मिक गतिविधियों में तेजी आई। उन्होंने धर्मग्रंथों की व्याख्या करने की एकमात्र संस्था होने के चर्च के दावे को खारिज किया। उन्होंने पुस्तकें प्रकाशित की जिनमें पोप और उसके संगठन का खुलेआम विरोध किया। अपनी पुस्तक "द फ्रीडम आफ दि क्रिश्चियन मैन"(1520) मे लूथर ने यह कहा कि सच्ची आध्यात्मिक मुक्ति ईसा में आस्था के जरिए संभव है। लूथर पर मुकदमा भी चलाया गया और कानून विरोधी करार दे दिया गया। उन्हें जीवनपर्यंत मृत्युदंड की सजा हुई।
लूथर का मानना था कि मनुष्य ईश्वर की आवश्यकता महसूस कर कर उसका स्मरण करता है। ईश्वर उसे क्षमा दान देने के लिए बाद है। इसे पैसों से बेचा खरीदा नहीं जा सकता। "एलिस्टर ई. मैक्ग्राथ" कहते हैं कि या क्षमादान एक नया धर्म शास्त्र था। जो पोप, पादरियों और कई अन्य के निहित स्वार्थ के लिए खतरा पैदा हो गया।
लूथर ने ईसाई परमसंस्कारों में बपतिस्मा और यूखारिस्त को मान्य ठहराया। बपतिस्मा किसी बच्चे या गैरईसाई को ईसाई धर्म में शामिल करने और इसाई नाम देने का उत्सव है जबकि यूखारिस्त ईसाइयों का पवित्र भोज है जहां अपने बीच ईशा की उपस्थिति करने के लिए ब्रेड और वाइन लिया जाता है। वह मानते थे कि मध्यकालीन परम संस्कार पादरियों को अनुचित श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। लूथरा ने घोषणा की प्रत्येक ईसाई अपना पादरी स्वयं है। मुक्ति एक अंदरूनी आस्था है न कि सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता। उन्होंने बाइबल का जर्मन में अनुवाद किया ताकि सभी लोग इसे आसानी से समझ सके। लूथर ने मठों को और पादरियों द्वारा ब्रह्मचर्य पालन की प्रथा को समाप्त किया।
प्रभाव:- लूथर के विचारों का तेजी से प्रसार हुआ और जर्मनी का अधिकांश कॉलिंग वर्ग उनके विचारों को स्वीकार करने लगा। स्वतंत्र नगर छापेखाने और मानववादी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन गए। लूथर द्वारा पादरी वर्ग और जनसामान्य की समानता पर जोर दिए जाने से धर्मनिरपेक्षता की प्रधानता स्थापित करने का अच्छा अवसर मिला। शहरों का मध्यमवर्ग, छोटे व्यापारियों, और दस्तकार इसकी ओर आकर्षित हुए। शहर की सरकार ने आर्थिक लाभ और सामाजिक संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करके चर्च पर अपनी सत्ता हासिल करना आरंभ कर दिया।
1525 में किसानों ने लूथर के विचारों से प्रेरित होकर खुलेआम विद्रोह किया। इसमें लगभग 40,000 किसान शामिल थे। यह सभी सामंत और चर्च के शोषण के विरुद्ध संगठित हुए। इस दौरान महलो और मठों को जलाया, भूमि पर कब्जा की और कैथोलिक चर्च के अधिकारियों पर हमले किए जा रहे थे। साथ ही साथ करो की समाप्ति की मांग भी की गई। उस समय एक समस्या उत्पन्न हो गई, जब किसान वर्ग कूलीन वर्ग पर हमला कर रहा था और लूथर कुलीन वर्ग का समर्थन नहीं खोना चाहते थे।
इस समस्या का समाधान उन्होंने अपने "दो राज्य" के सिद्धांत को परिचित करके पाया। उन्होंने बताया कि ईश्वर का सांसारिक शासन राजा और राजकुमार और मजिस्ट्रेट के माध्यम से चलता है। वे धर्मनिरपेक्ष सता की तलवार से इसे चलाते हैं। उनका तर्क था कि सच्चे इसाई को राजा के सत्ता के खिलाफ लड़ने के बजाय अत्याचार और बुराई को सहन करना चाहिए। इसलिए लूथर के विचारों को शासक वर्ग के एक बड़े भाग का समर्थन मिला।
मार्क्सवादी लेखको के अनुसार किसान युद्ध सामाजिक आर्थिक द्वंद की अभिव्यक्ति था और इसने बुर्जुआ क्रांति के आरंभिक दौर का निर्माण किया। "स्टिनमेज" के अनुसार यह एक राष्ट्रीय आंदोलन था जो मार्टिन लूथर द्वारा आरंभ किया गया। इसमें सभी वर्गों को चर्च के खिलाफ माध्यम बुर्जुआ के नेतृत्व के अधीन ला दिया। "पिटल बीकल्स" कहते हैं कि किसान युद्ध "ईसाइयत धर्मसिद्धांत" के आधार पर सामाजिक और सामंती संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन के जरिए सामंतवाद के संकट पर काबू पाने का प्रयास था। इस क्रांति के वाहक सामान्य जन थे।
इस प्रकार लूथर के आंदोलन ने यूरोप चर्च में विभाजन कर दिया और लोकतंत्र के वर्चस्व को समाप्त कर दिया। अनेक जर्मन राजकुमारों ने चर्च से स्वतंत्रता प्राप्त करने का अवसर देखा। लूथर का धर्म निरपेक्ष आंदोलन नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों में तेजी से फैला। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट अनुयायियों के बीच चली लंबी लड़ाई का अंत 1555 में आग्सबर्ग शांति समझौते के साथ हुआ। सभी जर्मन राजकुमारों को अपना धर्म चुनने का अधिकार मिला। उनकी प्रजा को उनके द्वारा चुने गए धर्म का पालन करना पड़ता था। लूथर ने धार्मिक और सामाजिक-राजनीतिक मामलों के बीच भेद को स्पष्ट किया और धर्म की सर्वव्यापी भूमिका को नष्ट कर दिया।
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