जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

भूमध्यसागर अर्थव्यवस्था के पतन के कारक (Modern West)

15वीं सदी की शुरुआत में जो व्यापारिक विस्तार आरंभ हुआ था वह 17वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में यूरोप के कई भागों में समाप्त होने लगा। कुछ क्षेत्रों में विकास की गति धीमी पड़ गई, कहीं उसमें ठहराव आया और कई क्षेत्रों में इसमें निरंतर गिरावट आई। 16वीं शताब्दी में आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बदल गया और व्यापार की चहल-पहल भूमध्यसागर के इतावली राज्यों से हटकर आईबेरियन राज्यों में होने लगी। 1600 के बाद कृषि क्षेत्र के अभाव का वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यूरोप के कई हिस्सों में विद्रोह, संघर्ष और युद्ध और राजनीतिक अव्यवस्था देखी गई। कई भागों में जनसंख्या में कमी नजर आई। यूरोपीय अर्थव्यवस्था का विकास इस सदी के अंतिम दशक में भूमध्यसागर क्षेत्र में और बाद में अन्य भागों में रुक सा गया। यूरोप के संकट के इस काल में भूमध्यसागर राज्यों का पतन होने लगा।

"फर्नेंद ब्रोदेल" ने 16वीं सदी के भूमध्यसागर को विश्व मंच या विश्व अर्थव्यवस्था कहा है। भूमध्यसागर से उनका अभिप्राय केवल समुद्र नहीं था बल्कि आल्पस के दक्षिण और पीरेनस पर्वत का संपूर्ण क्षेत्र था जो व्यापारिक गतिविधियों से प्रेरित था। 

भूमध्यसागर क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक विभेद के बावजूद आर्थिक एकता थी। यह एकता इटली के प्रभावशाली शहरों के कारण थी। इन प्रमुख शहरों में वेनिस, मिलान, जिनेवा और फ्लोरेंस शामिल थे। सोलवीं सदी में स्पेन का यूरोप के सर्वोच्च शक्ति के रूप में विकास हुआ। पुर्तगाल के साथ स्पेन ने नए समुद्री मार्ग बनाने की प्रक्रिया शुरू की। फलस्वरूप कैडिज, सेविले और लिस्बन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए केंद्र बन गए। इस दौरान आईबेरियन व्यापार अटलांटिक तट पर केंद्रित हो गया। वेनिस का महत्व घटने लगा और भूमध्यसागर विश्व अर्थव्यवस्था की मुख्य नेटवर्क से बाहर हो गया। इस आर्थिक परिवर्तन को समझने के लिए स्पेन और इटली की परिस्थितियों पर अलग से नजर डालना आवश्यक है।

स्पेन:- सोलवीं सदी में स्पेन का यूरोप पर दबदबा था। इस दौरान स्पेन और इसके उपनिवेशों के बीच व्यापार कई गुना बढ़ गया। स्पेन ने व्यापार के जरिए भारी मात्रा में चांदी आती थी। किंतु सत्रहवीं सदी की शुरुआत में स्पेन की अर्थव्यवस्था का पतन होने लगा। इतिहासकारों द्वारा इसके पतन की अलग-अलग व्याख्या की गई है।

इतिहासकार "अर्ल जे हैमिल्टन" कहते हैं कि स्पेन के उदय में चांदी के आयात की महत्वपूर्ण भूमिका थी और 1620 के दशक से जब आयात की मात्रा कम हुई, तभी पतन शुरू हो गया। अमेरिकी चांदी के बिना स्पेन अपने विशाल साम्राज्य के विस्तार को जारी नहीं रख सका। इसने विलासिता और फिजूलखर्ची को बढ़ावा दिया जिससे आर्थिक पतन शुरू हुआ। इस तर्क के समर्थन में "डेनिस ओ फिल्न"कहते हैं कि चांदी के आयात की मात्रा स्पेनिश साम्राज्य का सहारा थी। अमेरिकी चांदी के अधिक उत्पादन और स्पेन में इसके आमद से इसका बाजार मूल्य घट गया। अमेरिका से प्राप्त चांदी के कारण स्पेन के राजाओं ने अनावश्यक युद्ध किए। जिससे संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होते गए।

इसके विपरीत स्पेन के कुलीन वर्ग के लोग व्यापार को पसंद नहीं करते थे और वे व्यवसायिक गतिविधियों से अलग रहते थे। इसके कारण स्पेन में शहरीकरण भी अधिक नहीं हुआ। स्पेन के पतन का महत्वपूर्ण संकेत इसके जनसंख्या ह्रास में देखा गया। 1595 और 1602 के बीच प्लेग के कारण स्पेन में लगभग दस लाख लोग मारे गए। स्पेन से यहूदियों और मुसलमानों को बाहर निकालने के लिए शासकों द्वारा अपनाई गई नीतियों के कारण स्पेन की अर्थव्यवस्था में कमी आई। यहूदी लोग न केवल ऊंचे पदों पर आसीन थे बल्कि वे बड़े उद्यमी भी थे। दूसरी ओर मुसलमानों का वर्ग कारीगर और काश्तकार था जो खासतौर पर ऊन उत्पादन कार्य करते थे।

सोलहवीं सदी के दौरान स्पेन में तोपनिर्माण उद्योग का विकास हुआ। लेकिन अमेरिकन मांग के कारण नौपरिवहन का तेजी से विकास हुआ। स्पेनिश पोतनिर्माण उद्योग इस मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं था। फलस्वरुप सत्रहवीं सदी के आरंभ में पोतनिर्माण में तेजी से गिरावट आई। स्पेन यूरोप के अन्य तटवर्ती राज्यों से पिछड़ गया। इससे स्पेन की अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी दिशा नहीं मिली।

इटली:- इटली में शहरीकरण और आर्थिक विकास यूरोप के अन्य भागों की तुलना में सबसे पहले शुरू हुआ। किंतु 17 वी सदी के अंत तक इटली की आबादी घटने लगी। अकाल, प्लेग और महामारी के कारण जनसंख्या में कमी आई। सैन्य विद्रोह के कारण भी आक्रमण और विनाश हुए। इन घटनाओं के कारण आर्थिक अवसर बहुत सीमित हो गए और शहरों में आबादी घटने लगी। इतिहासकार "हालेन लीज" और "हाहेनबर्ग" के अनुसार शहरीकरण में कमी के साथ-साथ शहर और गांव के बीच संबंध में बदलाव आया। शहरों में रहने वाले लोगों की जनसंख्या में कमी आई जबकि ग्रामीण आबादी में वृद्धि हुई।

फ्रांसीसी शासकों ने इतावली राज्य पर आक्रमण आरंभ कर दिए और उनकी अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया। इसके बाद स्पेन ने सैनिक आक्रमण किए जिसका इटली के उत्तरी राज्यों पर इसका नकारात्मक असर हुआ। इटली में जनसंख्या की कमी के कारण सोलवीं सदी में शहरी अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। व्यापारी बैंकरो ने इसकी राजधानी इटली से दूर सुरक्षित क्षेत्रों में स्थानांतरित कर ली। जिससे औद्योगिक केंद्र नष्ट हो गए।

इटली में उद्योगों का कुछ समय बाद पुनरुत्थान हुआ किंतु इसने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना प्रभुत्व खो दिया था। इसका स्थान वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में इंग्लिश, डच और फ्रांसीसी उत्पादों ने ले लिया क्योंकि वह काफी कम दर पर कपड़े मुहैया कराते थे। इसके विपरीत इतावली कपड़े अंतरराष्ट्रीय दरो के मुकाबले बहुत महंगे थे।

इतावली राज्य में कर का बोझ बहुत अधिक था और यह गलत संकल्पना पर आधारित था। कर विभिन्न समूह से कोटा के रूप में लिया जाता था और इसका नियमित रूप से आकलन नहीं किया जाता था। इसके अतिरिक्त व्यापारी संघ के नियंत्रण के कारण मजदूरी लागत अधिक थी। इटली में विनिर्माण और व्यापार क्षेत्र के विपरीत कृषि में निवेश किया जाने लगा। इटली का कुलीन वर्ग गांव में आश्रय लेने लगा और आर्थिक क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करने में विफल हो गया। उद्योगों के ह्रास के कारण कृषि उत्पादों की मांग घट गई। शहरी जनसंख्या में कमी, मूल्य में गिरावट, भारी कर और प्लेग के फैलने का इटली की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

भूमध्यसागर अर्थव्यवस्था इटली और स्पेन के अर्थव्यवस्था के विकास पर आधारित थी। इटली और स्पेन में आंतरिक आर्थिक समस्या, प्लेग और महामारी के फैल जाने के कारण इसका भूमध्यसागर अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। भूमध्यसागर अर्थव्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय महत्व घटने लगा और यह अटलांटिक महासागर अर्थव्यवस्था की ओर केंद्रित हो गया। इटली ने अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया किंतु यह पहले की भांति विकसित नहीं हो पाए। स्पेन सैन्य शक्ति के कारण काफी विकसित देश था किंतु आर्थिक पतन के कारण इसका भी प्रभुत्व समाप्त हो गया। इस भूमध्यसागर अर्थव्यवस्था का पतन इन दोनों क्षेत्रों पर आधारित था।

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