बौद्ध धर्म की शिक्षाएं
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बौद्ध धर्म की शिक्षाएं
बौद्ध दर्शन का विकास गौतम बुद्ध के उपदेशों से हुआ, जिनका मूल नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म 566 ई.पू. नेपाल के कपिलवस्तु में स्थित शाक्य राजघराने में हुआ। 29 वर्ष की आयु में ही, बुद्ध ने अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर संन्यास ले लिया। वह सत्य की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहे और इस दौरान उन्होंने अनेक गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। अंततः 35 वर्ष की आयु में बोधगया में एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और उसके बाद वह बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में अपने पहले पांच शिष्यों को दिया। बौद्ध धर्म में इस घटना को 'धर्मचक्रप्रवर्तन' के नाम से जाना जाता है। उनका देहावसान 80 वर्ष की अवस्था में संभवतः 486 ई.पू. में हुआ।
बुद्ध की शिक्षा का उद्देश्य निर्वाण की प्राप्ति थी। निर्वाण एक अनुभूति है जिसे इसी जीवन में हासिल किया जा सकता है। निर्वाण का अभिप्राय तृष्णा, माया और अहंकार के नष्ट हो जाने से है।
बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया
अति सुख और अति दुख दोनों से परे संयमपूर्ण जीवन।
उनके अनुसार ज्ञान प्राप्ति के चार मूल्य आर्य सत्य है:-
* जीवन में दुःख-ही-दुःख है।
* दुःख का कारण है।
* दुःख का निवारण संभव है।
* दुःख से निवारण का मार्ग भी है।
बुद्ध के अनुसार, जीवन की स्थितियाँ दुखों से भरी हुई हैं। जन्म, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु, अप्रिय लोगों से मिलना, प्रिय लोगों से बिछड़ना और इच्छा करने पर किसी चीज का न मिलना, ये सब दुःख हैं। इस सत्य का बोध ही पहला आर्य सत्य है।
द्वितीय आर्य सत्य दुःख अकारण नहीं है, इसका भी कारण है और वह कारण है 'तृष्णा'। बुद्ध ने जीवन के दुखों की उत्पत्ति को 'कारण-कार्य संबंध' से जोड़ा है, जिसे बौद्ध दर्शन में 'प्रतीत्यसमुत्पाद' कहा गया है। इसके अनुसार, कुछ भी अकारण नहीं होता। हर घटना या प्राणी के अस्तित्व में कुछ ऐसा होता है जो दुःख का कारण बनता है। बुढ़ापा और रोग इसलिए हैं, क्योंकि जन्म है। यदि मनुष्य का जन्म ही न हो, तो उसे दुःख क्यों झेलना पड़ें।
तृतीय आर्य सत्य के अनुसार दुःख का निवारण संभव है। यदि दुःख का कारण है, तो उन कारणों को दूर करने से दुःख का अंत भी संभव है। आर्य सत्यों के निरंतर चिंतन और मनन से मनुष्य सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सकता है और दुखों से छुटकारा पा सकता है। यह स्थिति 'निर्वाण' (मोक्ष या मुक्ति) की है, जिसका अर्थ है जन्म-मरण के बंधन से छुटकारा पाना।
चतुर्थ आर्य सत्य के अनुसार, निर्वाण प्राप्ति के लिए एक मार्ग है, जिसका अनुसरण कर बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए जिस मार्ग का प्रतिपादन किया, उसके आठ अंग हैं, इसलिए इसे 'अष्टांगिक मार्ग' कहते हैं। ये निम्नलिखित हैं:
* सम्यक् दृष्टि: जीवन को यथार्थ रूप में देखना और समझना, जैसे दुःख, दुःख का कारण, दुःख का अंत और दुःख के अंत की ओर ले जाने वाले मार्ग को सही तरीके से समझना।
* सम्यक् संकल्प: सांसारिक विषयों के प्रति लगाव, दूसरों के प्रति विद्वेष और हिंसा का परित्याग करने का संकल्प करना।
* सम्यक् वाक: सही और उचित तरीके से बोलना, यानी झूठ, चुगली, कठोर और व्यर्थ बातें न बोलना।
* सम्यक् कर्मांत: अच्छे कर्म या आचरण, अहिंसा, चोरी न करना और मद्यपान निषेध।
* सम्यक् आजीव: सही आजीविका या जीवनयापन। आजीविका कमाने का तरीका ऐसा होना चाहिए जो किसी को भी नुकसान न पहुंचाए।
* सम्यक् व्यायाम: अकुशल विचारों को दूर करने और कुशल विचारों को विकसित करने का प्रयास करना, साथ ही मन को शुद्ध और शांत बनाने के लिए सही दिशा में प्रयास करना।
* सम्यक् स्मृति: पूर्ण सजगता या सही स्मृति। व्यक्ति को वर्तमान में पूरी तरह से सचेत रहना चाहिए ताकि वह अपनी भावनाओं, विचारों और शारीरिक गतिविधियों के प्रति जागरूक रह सके।
* सम्यक् समाधि: मन को एकाग्र, शांत और पूर्ण रूप से जागरूक अवस्था में स्थिर करना।
बुद्ध अक्सर कहा करते थे कि वस्तुएँ परिवर्तनशील और नाशवान हैं। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति किसी कारण से ही होती है, और कारण के नष्ट होने पर उस वस्तु का नाश हो जाता है। जिसका आदि है, उसका अंत भी है।
बुद्ध के अनुसार, निर्वाण प्राप्ति के तीन मार्ग हैं:
* अर्हतयान: जो लोग सिर्फ अपनी ही मुक्ति या निर्वाण चाहते हैं, वे अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण कर इसे प्राप्त कर सकते हैं।
* प्रकृत बुद्धयान: जो अपने निर्वाण के साथ-साथ दूसरों के निर्वाण की भी इच्छा रखते हैं, वे इस मार्ग से इसे प्राप्त कर सकते हैं।
* बुद्धयान: जिन लोगों ने अपनी मुक्ति का परित्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए खुद को समर्पित कर दिया है, उनका मार्ग बुद्धयान कहलाता है।
दुःख और दुःख से मुक्ति ही बुद्ध के सिद्धान्त का आधार है। बुद्ध ने 'सब्वम् दुःखम्' कहा अर्थात् सब ओर दुख व्याप्त हैं। दुःख का अर्थ एक व्यक्ति के द्वारा अनुभव की गई पीड़ा और निराशा तक सीमित नहीं था, बल्कि वैसा अनुभव करने की तमाम संभावनाएं दुःख के दायरे में आती है। तृष्णा, मोह, अहंकार, घृणा जैसी मानवीय प्रवृत्तियों को दुःख का कारण कहा गया। इससे भी गंभीर स्तर पर 'मैं' या 'अहम्' को अनुभवों की श्रृंखला के रूप में देखा गया। इसकी व्याख्या के लिए नदी की उपमा दी गई। नदी हमेशा एक समान दिखलाई पड़ती है, किंतु नदी के जल के तत्त्व निरन्तर प्रवाहमान होते हैं, हर क्षण उनका परिवर्तन होता रहता है। बोध ग्रन्थ मिलिन्दपन्ह के अनुसार, एक आदमी के नाम के पीछे परिवर्तनशील व्यक्तित्व विद्यमान रहता है। जैसे कि रथ प्रत्यक्ष रूप से एक सम्पूर्ण रथ प्रतीत होता है, लेकिन यह कई घटको से मिलकर बना होता है। इसलिए मैं' या 'अहम् का भाव अस्थाई और परिवर्तनशील है।
आर.सी. मजुमदार जैसे इतिहासकारों का मानना है कि बुद्ध की शिक्षाओं में मौलिकता कम है; जैसे ईश्वर, आत्मा का इनकार। वहीं, डॉ.बी.आर. आंबेडकर बुद्ध के धम्म को नैतिकता-आधारित बताते हैं, जो कर्मकांडों से मुक्त है और सामाजिक बुराइयों का समाधान देता है। एडविन अर्नोल्ड ने ‘लाइट ऑफ एशिया’ में बुद्ध की शिक्षाओं को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक बताया, जो विश्वव्यापी प्रेरणा देती हैं।
बुद्ध को ज्ञान के चमर्मोत्कर्ष के रूप में देखा जाता है। उन तक पहुँचने की संभावना असंभव तो नहीं किंतु नणग्य है। बुद्ध को कई बार चमत्कार करते हुए भी दिखलाया गया है। किंतु वैसा वे अपने जिद्दी प्रतिद्वंदियों को प्रभावित करने के लिए किया करते थे। बौद्ध धर्म में देवताओं और स्वगों को स्थान दिया गया। ब्रह्मा और इन्द्र विभिन्न अवसरों पर बुद्ध की प्रशस्ति करते हुए दिखलाए गए हैं। मनुष्य को निर्वाण की उपलब्धि कराना देवताओं की क्षमता से बाहर था। केवल बुद्ध के बताए हुए मार्ग से इस लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।
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