वारकरी आंदोलन

 वारकरी आंदोलन 


वारकरी आंदोलन की शुरुआत 13 शताब्दी में महाराष्ट्र में हुई। पंडुलिक को इसका प्रथम संत माना जाता है। पंढरपुर वारकरी आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। अधिकांश वारकरी संत विठोबा की पूजा करते थे जिन्हे विष्णु का अवतार माना जाता है। वारकारी संतो की संख्या 50 से अधिक थी। इसके प्रमुख संतो में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, और रामदास शामिल है।  



दार्शनिक शिक्षाएं 


वारकरी संतो के अनुसार भगवान् तक पहुँचने का रास्ता प्रेम और मानवता की सेवा से होकर जाता है और यह रास्ता सभी के लिए खुला है। साथ ही उनका मानना था की इसपर केवल पंडितों और ब्राह्मणों का ही विशेष अधिकार नहीं है। इनके अनुसार पुरोहित वर्ग भगवान पर अधिकार होने का दावा करते है। वह नहीं जानते की दिव्य को वश में नहीं किया जा सकता, बल्कि सेवा के माध्यम से ही उसका अनुसरण किया जा सकता है। वारकरी सम्रदाय का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं को दैनिक जीवन में अधिक सुलभ बनाना था। 


विद्वान सुविरा जायसवाल के अनुसार भगवान को केवल एक समुदाय की संपत्ति के रक्षक और मालिक के रूप में देखने से लेकर भगवान को एक सार्वभौमिक ईश्वर के रूप में देखने की ओर बढ़ना एक महत्वपूर्ण संक्रमण था। भक्ति कविता अक्सर दैनिक जीवन की वास्तविकताओं को दर्शाती है। 


विद्वान GA  Deleury के अनुसार महाराष्ट्र संतो ने अपने समय की सामाजिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए अभंग, कीर्तन ओर गाथा जैसे नए काव्य रूपों की शुरुआत की। उनका प्राथमिक उद्देश्य उन संरचनाओं को चुनौती देना था जो धार्मिक शिक्षा पर उच्च जातियों का नियंत्रण बनाये रखते है। इन कवियों ने निचली जातियों को ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की असमानताओं का विरोध करने की ऊर्जा प्रदान की।  


इसके लिए इन कवियों ने दो मार्ग अपनाये (1) स्वयं के विचारों को मराठी भाषा के माध्यम से व्यक्त किया। (2) प्राचीन संस्कृत को आम लोगो के लिए अधिक सुलभ बनाया।


विद्वान विजया रामास्वामी के अनुसार वारकरी पंथ ने सामाजिक मानदंडों को तोड़ते हुए जाती या लिंग की परवाह किये बिना सभी सदस्यों का स्वागत किया।  

वारकरी सम्प्रदाय में सभी जातियों के संतो का समावेश था क्योंकि इस साम्प्रदाय ने समानता और स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण तत्वों को महत्त्व दिया। वारकरी सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण तत्व अद्वैतवाद है, इसमें भगवन और भक्त के बीच कोई भेद नहीं माना जाता।


यह पंथ ग्रहस्थ जीवन छोड़ सन्यास लेने का विरोध करता है। इनके अनुसार भक्ति में ऊंच नीच तथा जाति का महत्व नहीं होता बल्कि शुद्ध आचरण का होता है तथा व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके आचरण पर निर्भर होती है न की उसकी जाति पर। यह कर्मकांड का विरोध करता है। इसी कारण इसमें सभी जातियों का समावेश है जिन्होंने जाति निरपेक्ष समाज के निर्माण का प्रयास किया।


ज्ञानेश्वर 


वारकरी सम्प्रदाय के लोग संत ज्ञानेश्वर को अपना संस्थापक मानते है जो की मध्यकालीन भारत के महान कवी संतो में से एक है। ज्ञानेश्वर ने कई आध्यात्मिक कृतियों की रचना की जिनमें प्रमुख है - अमृतानुभव, अभंग, ज्ञानेश्वरी, चांगदेव - पासष्ठी, हरिपाठ, और नमन यह रचनाएँ मराठी भाषा में है जो की उनके अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित है। ज्ञानेश्वर भक्ति मार्ग के समर्थक थे। इनके लिए भक्ति का मतलब स्वयं को ईश्वर को समर्पित करना था। इनकी रचनाएं और कविता सामान्य मनुष्य के जीवन और उनके अनुभवों पर आधारित थी।


ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी ने धार्मिक अधिकार की भाषा के रूप में संस्कृत को चुनौती दी। जिसके लिए ज्ञानेश्वर ने भगवतगीता का मराठी अनुवाद करके इस ग्रंथों को आम लोगो ओर निचली जातियों के लिए सुलभ बना दिया, जिसे अब तक धार्मिक विमर्श से बाहर रखा गया था। उनके इस कार्य ने भक्ति आंदोलन की नीव रखी जिसने हिन्दू धर्म की कठोर सामाजिक कुरीतियों पर सवाल उठाय। इन भक्ति संतों के अनुसरण में वर्ष में दो बार पंढरपुर की तीर्थयात्रा करना और तुलसी की माला पहनना शामिल है।


ज्ञानेश्वर भली भाँती जानते थे की तत्कालीन समाज वर्णव्यवस्था और जातिभेद की की समस्या से घिरा हुआ है। उन्होंने देखा की बहुजन समाज को शास्त्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया है। लोग पीड़ित और अधिकार से वंचित है। इसलिए ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी नामक ग्रन्थ की रचना की। जो की मराठी की सर्वप्रथम रचना है। इस रचना द्वारा ज्ञानेश्वर ने बहुजन समाज को लिखित शब्दों से परिचित करवाया जिसे सुनने, पढ़ने और जानने का अधिकार उस समय केवल उच्च वर्ग के पास था।


ज्ञानेश्वर ने उस समय प्रचलित बहुदेववाद, यज्ञ, तप और सन्यास आदि अंधविश्वासों को बढ़ावा देने वाले रीती रिवाजों का विरोध किया। ज्ञानेश्वर ने धर्म के नाम पर फैले अनेक खोखली मान्यताओं और विश्वासों के विरुद्ध अपनी तर्कपूर्ण और सत्य की खोज करने वाली मधुर वाणी में उपदेश दिए।


वारकरी संतो ने समाज के दलित और बहिष्कृत लोगो को प्रेम से अपनाकर उनको उन्नति का मार्ग दिखाया। ज्ञानेश्वर ने छुआ- छूत और ऊंच नीच का विरोध किया, उनके अनुसार मनुष्य किसी भी जाति में पैदा होकर सद्भाव से भक्ति करें तो वह ईश्वर की निकटता को प्राप्त कर सकता है। जिसके लिए ज्ञानेश्वर ने प्रह्लाद का उदाहरण देते हुए कहा है की दैत्य कुल में जन्मे प्रह्लाद ने अपनी भक्ति से भगवन के समुख जो श्रेष्ठ पद प्राप्त किया वह इंद्र को भी प्राप्त नहीं है इसलिए भक्ति के लिए जाति की कोई आवश्यकता नहीं है।


ज्ञानेश्वर ब्राह्मणवादी रूढ़ियों के विरुद्ध थे। वह वेदों में कही गयी बातों का विरोध करते है और कहते है की स्त्री और शूद्र को वेद पढ़ने का अधिकार न देना अन्यायपूर्ण है। ज्ञानेश्वर का मानना था की ईश्वर निराकार है तथा प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है। उनके अनुसार सच्चे मन से भक्ति और ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। इसके अलावा मनुष्य को व्रत रखने और स्वर्ण से सजी मूर्तियों को रखने के लिए भव्य मंदिरों की आवश्यकता नहीं है।


नामदेव


ज्ञानेश्वर के समान नामदेव भी समाज में फैली असमानताओं का विरोध करते थे। उस समय हिन्दू और मुसलमान के बीच धर्म के आधार पर तनाव रहता था। पंडित और मुल्ला इन दोनों समुदायों के बीच समन्वय भावना को स्थापित नहीं होने देते थे। नामदेव के अनुसार मंदिर में पूजा करने वाला हिन्दू अँधा है, तो मस्जिद में नमाज पढ़ने वाला मुसलमान भी अँधा है। नामदेव निर्गुण ब्रह्म के सेवा करने में विश्वास रखते थे जो न मंदिर में है और न ही मस्जिद में बल्कि वह सर्वत्र व्याप्त है।


नामदेव ने हिन्दू धर्म में व्याप्त मूर्तिपूजा, तीर्थ स्थान, उपवास, दान पुण्य, यज्ञ आदि का विरोध किया। सन्यासी, योगी और अघोरी द्वारा किये जाने वाले अनावश्यक ढोंग और कर्मकांड को वह आवश्यक नहीं मानते। उनके अनुसार सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने से ही ईश्वर मिलेंगे। नामदेव ने हिन्दू मुस्लिम भाईचारे को बढ़वा दिया। साथ साथ उन्होंने पुरोहितों और मुल्लाओं को भी वो नया मार्ग दिखाना चाहते थे। अपने इस उद्देश्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए वह उत्तर भारत की यात्रा पर गए। 


नामदेव ने महाराष्ट्र में भक्ति प्रचार के लिए मराठी भाषा में रचना की तथा इसी प्रकार उत्तर भारत की जनता के लिए उन्होंने हिंदी, ब्रज तथा पंजाबी में भी रचना की। नामदेव के शिष्यों में ज्यादातर निम्न जाति के थे। वह अस्पृश्य चोखामेला को अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य मानते थे। विद्वान श्री बारटके के अनुसार नामदेव केवल महाराष्ट्र के ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के प्रथम अस्पृश्योद्धारक थे।


नामदेव ने हिन्दू मुस्लिम दोनों के रूढ़िवादी विचारों की कड़ी आलोचना की। वह कहते है की मंदिर या मस्जिद की चार दीवारी में ईश्वर या अल्लाह का अस्तित्व नहीं है बल्कि वह तो घट-घट का वासी है। इसलिए नामदेव ने दोनों समुदायों की धार्मिक और सामाजिक कट्टरता को समाप्त करने की कोशिश की। वह राम और रहीम को अलग अलग न मानकर एक ही ब्रह्म के दो रूप मानते है।

 

निष्कर्ष

वारकरी आंदोलन केवल एक धार्मिक संप्रदाय नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था, जातिगत असमानता, और कर्मकांडीय जटिलताओं के विरुद्ध एक 'सामाजिक क्रांति' थी। इस आंदोलन ने धर्म को पुरोहित वर्ग के एकाधिकार से मुक्त कर उसे सामान्य जनमानस के लिए सुलभ और लोकतांत्रिक बनाया। वारकरी आंदोलन ने मध्यकालीन भारत में एक ऐसी वैचारिक नींव रखी, जिसने समाज के शोषित और बहिष्कृत वर्गों को आत्मविश्वास प्रदान किया। यह आंदोलन आज भी हमें यह सिखाता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र की शुद्धता और समाज के प्रति सेवा भाव है। यह भारतीय संस्कृति की उस समावेशी परंपरा का प्रतीक है, जो विविधता में एकता का मार्ग दिखाती है।

Bibliography

B. P Bahirat :- The philosophy of Gyandev

N. M Sadarangani :- Bhakti Poetry in Medieval India 

IGNOU :- Marathi Bhakti Sahitya : Gyaneshwar or Naamdev

I. Shima :- The Vithoba Faith or Maharashtra 

P. Burchett :- Bhakti Rhetoric and Hagiography of

'Untouchable' Saints.

G. A Deleury :- The Cult of Vithoba.

Harishchanra Verma :- Madhykalin Bharat








 





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