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काकतीय अभिलेख

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  काकतीय अभिलेख  काकतीय वंश ने 12वीं से 14वीं शताब्दी तक पूर्वी दक्कन क्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया। इस साम्राज्य की जानकारी का प्रमुख स्रोत लिखित अभिलेख (Inscriptions) है। यह अभिलेख, पत्थर, तांबे की प्लेटों और मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए है जो काकतीयों साम्राज्य की वंशावली, राजनीतिक गतिविधियों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म और सांस्कृतिक योगदान के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। काकतीय अभिलेख मुख्य रूप से तेलुगु और संस्कृत में लिखे गए। उल्लेखनीय अभिलेखों में बय्यारम टैंक शिलालेख, मोटुपल्ली शिलालेख, मंगल्लु शिलालेख और हनुमकोंडा शिलालेख शामिल हैं। विद्वान पी.वी. परब्रह्म शास्त्री के अनुसार काकतीय अभिलेख तेलुगु भाषा और साहित्य के विकास का "स्वर्णयुग" दिखाते हैं।  वंशावली की जानकारी शिलालेख काकतीय शासकों की वंशावली और कालक्रम को उजागर करते है। गणपति देवा (1199–1262) के शासनकाल में जारी बय्यारम टैंक शिलालेख , एक विस्तृत वंशावली सूची प्रदान करता है। यह शिलालेख वेन्ना, बीटा I, प्रोल I, और रुद्रदेवा जैसे पूर...

मौर्य राज्य की प्रकृति

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मौर्य राज्य की प्रकृति मौर्य साम्राज्य की अवधि 325 से 185 ई•पू• तक मानी जाती है। यह विशाल साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान, पश्चिम में कठियावाड़ा से पूर्व में उड़ीसा और दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तृत है। चंद्रगुप्त मौर्य इस साम्राज्य का संस्थापक था और उसके पौत्र अशोक ने इस साम्राज्य को विस्तार और मजबूती प्रदान की। मेगस्थनीज की इंडिका और कौटिल्य का अर्थशास्त्र ऐसे स्रोत है जो इस साम्राज्य पर प्रकाश डालते हैं। दिव्यदान और मुद्राराक्षस बाद के काल की साहित्यिक कृतियां हैं जो मौर्य साम्राज्य की घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं। अशोक के शिलालेख भी इस काल के बारे में सूचना के बहुमूल्य स्रोत है।  मौर्य साम्राज्य के आरंभ के साथ भारतीय इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ क्योंकि इसके साथ भारत में पहली बार राजनीतिक एकता और प्रशासनिक एकरूपता कायम हुई।  प्रांत:- राज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में बांटा गया था। सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई प्रांत थी। प्रांतों का प्रशासन वायसराय रूपी अधिकारी द्वारा होता था। यह अधिकारी राजवंश के होते थे। अशोक के अभिलेखों में उन्हें कुमार या आर्यपुत्र कहा गय...

अबुल फजल (इतिहासकार)

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अबुल फजल इतिहासकार के रूप में अबुल फजल की भाषा फारसी है। उसने इतिहास को धर्म से नहीं बल्कि दर्शनशास्त्र से जोड़ा। उसके लिए लड़ाइयां धार्मिक रंग में रंगकर नहीं उभरती बल्कि वह विनाशकारी तत्वों तथा स्थायित्व की शक्तियों के बीच की अराजकता का परिणाम है। अबुल फजल ने ऐतिहासिक क्षेत्र को अधिक विस्तृत कर दिया तथा उसे राजनीतिक लड़ाई तक सीमित न रखकर, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा प्रशासनिक सभी प्रकार की जानकारी अबुल फजल ने दी है। अबुल फजल ने इतिहासलेखन के प्रति अपने विचार अकबरनामा के दूसरे भाग में व्यक्त किए हैं कि इतिहास को मिथ बनाने के बजाय बुद्धि संपन्न तथा लौकिक रूप से भी आंकना व दर्शाया जाना चाहिए। इसलिए उसकी अकबरनामा एक विश्वसनीय प्रमाणिक शोध ग्रंथ है। अकबरनामा में अबुल फजल ने अकबर की अत्यधिक प्रशंसा की है। उसे महानायक के रूप में प्रतिष्ठित करने की हर संभव कोशिश की है। उसने अकबर को इंसान-ए-कामिल माना है जिससे कोई गलती हो ही नहीं सकती। डॉ• विंसेंट स्मिथ ने इसलिए अबुल फजल को अकबर का चापलूस माना है। उनके अनुसार उसने कहीं-कहीं इस सत्य को छुपाने की कोशिश की है। असीरगढ़ के दुर्ग को विजित करने म...

अबुल फजल (अकबरनामा)

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अकबरनामा अकबरनामा का लेखक अबुल फजल था। अकबरनामा की रचना 1592 में प्रारंभ की गई थी और 1602 में यह संपन्न हुआ। अबुल फजल ने वैसे तो बहुत सी पुस्तकें लिखी है परंतु उसकी ख्याति का आधार और क्षमता का सही प्रमाण उसकी पुस्तक अकबरनामा तथा आईन-ए-अकबरी से प्राप्त होता है। अकबरनामा तीन भागों में विभाजित है। इसका तीसरा भाग आईन-ए-अकबरी है। अबुल फजल का इरादा अकबरनामा को पांच भागों में लिखने का था पर यह हो न सका। अकबरनामा को बादशाह के निर्देश एवं प्राश्रय में लिखा गया था। अबुल फजल ने अकबर को अकबरनामा में एक आदर्श मानव, श्रेष्ठतम आत्मा के रूप में अंकित किया है। अबुल फजल ने अकबरनामा में आदम से लेकर अकबर के शासन के 46वर्ष तक का वर्णन किया है। इसके विषय में हरबंस मुखिया ने लिखा है कि अकबरनामा का विभाजन राज्यकाल पर आधारित है और प्रत्येक शासन के राज्यकाल की घटनाओं को वह क्रमिक आधार पर लिखता है परंतु जब वह अकबर के शासनकाल की घटनाओं को लिखता है तो उसके शासनकाल को एक रुप न मानकर वह इसे वार्षिक वृतांत का रूप दे देता है।  अपने इस रचना के लिए अबुल फजल ने समकालीन दरबारी रिकॉर्ड से सामग्री प्राप्त की है तथा राजप...

जजिया

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जजिया जजिया एक कर था, जो केवल गैर-मुसलमानों से लिया जाता था। इसके बदले में उन लोगों को राज्य से जीवन व संपत्ति की सुरक्षा तथा सैनिक सेवा से मुक्ति मिलती थी। भारत में जजिया कर लगाने का प्रथम साक्ष्य मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद देखने को मिलता है। इसने भारत के सिंध प्रांत के देवल में जजिया कर लगाया था। इसके बाद जजिया कर लगाने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान फिरोजशाह तुगलक था। मुगल शासकों ने भी इस कर को 1564 तक लागू रखा। मुगल बादशाह अकबर ने 1564 में अपनी धार्मिक उदारता का परिचय देते हुए इस कर को समाप्त कर दिया। जहांगीर, शाहजहां ने भी इस विषय में अकबर का अनुकरण किया। इनके बाद औरंगजेब ने भी अपने शासन के प्रथम 21 वर्षों तक जजिया कर नहीं लगाया। किंतु 1679 में उसने अपने साम्राज्य में जजिया कर फिर से लगा दिया। इतिहासकार डॉ कुरेशी का कहना है कि जजिया गैर-मुसलमानों से लिया जाता था क्योंकि मुस्लिम राज्य में रहने पर उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व उन पर ही आता है। औरंगजेब के इस कदम ने राजपूतों, मराठों और हिंदुओं को मोटे तौर पर मुगल शासन से विमूख कर दिया। साम्राज्य के विघटन को तीव्रत प्रदान क...

शाहजहांनाबाद

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शाहजहांनाबाद शाहजहांनाबाद मुगल साम्राज्य की राजधानी थी। जिसे 1639 में शाहजहां द्वारा बसाया गया। शाहजहां ने 1639 में अपनी राजधानी शाहजहानाबाद स्थानांतरित करने का फैसला किया, अंत: वह 1648 में यहां आकर बसा। यह शहर आज पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है। यह शहर प्राचीन काल से ही राजाओं और सुल्तानों के शासन का केंद्र रहा है। यह क्षेत्र केंद्र में होने के साथ-साथ, चारों ओर से सुरक्षित तथा व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण था। यहां धार्मिक संतों का भी निवास था, जिसे मुख्य रूप से 22 ख्वाजा की चौखट (22 संतो का निवास) के नाम से जाना जाता है। शाहजहानाबाद की वास्तुकला में यमुना किनारे किला-ए-मुबारक (लाल-किला), जामा मस्जिद तथा प्रमुख बाजार चांदनी चौक शहर में शामिल थे। शाहजहानाबाद की नगर योजना को मीर उस्ताद अहमद और उस्ताद लाहौरी ने तैयार किया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जनसंख्या अधिक होने के कारण शाहजहां ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की। वहीं दूसरी ओर डॉ.‌ कन्हैयालाल श्रीवास्तव एवं झारखंडे चौबे कहते हैं कि मुगल सम्राट शाहजहां की अभिलाषा मध्ययुगीन इतिहास में एक नवीन अध्याय को जोड़ना था। इस...

फ्रांसीसी कांति की बौद्धिक पृष्ठभूमि

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फ्रांसीसी कांति की बौद्धिक पृष्ठभूमि 18 शताब्दी यूरोप में एक बौद्धिक आंदोलन चल रहा था। दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा विचारक मध्यकालीन अंधविश्वासों से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से विचार करने लगे थे। वे चली आ रही राजनीतिक, आर्थिक सामाजिक, धार्मिक और न्यायिक संस्थाओं के दोषों को उजागर कर समाज का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रहे थे। ऐसे विचारक यूरोप के सभी देशों में थे, परंतु उनमें सबसे मुख्य फ्रांस के विचारक थे। इन्हीं दार्शनिकों के साहित्य ने फ्रांसीसी क्रांति को लाने में आग में घी का काम किया। फ्रांस की क्रांति में दार्शनिकों का महत्वपूर्ण भाग था। उन्होंने क्रांति का मनोवैज्ञानिक आधार तैयार किया। जनता का ध्यान फ्रांस में फैली हुई बुराइयों की ओर आकर्षित किया। क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिए जनता को उन्होंने ही तैयार किया। इस तरह का प्रभाव यूरोप के किसी अन्य देश में नहीं पढ़ रहा था। नवीन और क्रांतिकारी विचारधारा को पढ़ने और समझने के लिए जागृत समुदाय की आवश्यकता होती है और इस तरह का समुदाय फ्रांस में मौजूद था। इसके अतिरिक्त मान्टेस्क्यू, वॉल्तेयर, रूसो तथा दिदरो जैसे विचारको का मुख्य कार्यक्षेत्र फ्रांस...

संथाल विद्रोह

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संथाल विद्रोह परिचय:- 1855-57 के बीच संथाल विद्रोह इस काल का सबसे प्रभावशाली आदिवासी आंदोलन था। संथाल पूरे भारत के विभिन्न जिलों जैसे वीरभूम, बांकुरा, पलामू, छोटानागपुर इत्यादि में फैले हुए थे। जहां संथाल सबसे ज्यादा संख्या में रहते थे उसे दमने-ए-कोह या संथाल परगना के नाम से भी जाना जाता है। 19वीं सदी के आरंभ तक औपनिवेशिक सरकार ने राजस्व नीति में कई सारे परिवर्तन कर दिए। इनके फलस्वरुप संथालो को अपने ही गांव में डीकुओ अर्थात बाहर से आकर बसे हुए लोगों को खिलाने पर मजबूर होना पड़ा। यह बाहरी लोग मैदानों से आए हुए सूदखोर, भूस्वामी और छोटे सरकारी अधिकारी थे। उन्होंने संथालों के जीवन पर ही कब्जा कर लिया। इस इलाके में कर्ज के अदा न कर पाने के कारण आदिवासी संथालो को अपनी जमीनों से बेदखल कर दिया गया। कोर्ट-कचहरी के फैसले भू-स्वामियों के पक्ष में और आदिवासियों के खिलाफ जाने लगे। परिणामस्वरूप संथाल लोग औपनिवेशिक सत्ता को अपना दुश्मन मानने लगे और विद्रोह की शुरुआत सूदखोरों और अनाज व्यापारियों की संपत्तियों पर हमले से हुई। विद्रोह को कुचलने के लिए सेना बुलाई गई। विद्रोहियों को या तो मार डाला गया या ...