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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

युद्धरत साम्यवाद

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युद्धरत साम्यवाद सोवियत राष्ट्र द्वारा जून 1918 से मार्च 1921 तक अपनाई गई नीति को युद्धरत साम्यवाद की संज्ञा दी गई है। विश्वयुद्ध तथा गृहयुद्ध के कारण सोवियत आर्थिक ढाँचा नष्ट हो गया। इसलिए सरकार को युद्धरत साम्यवाद की नीति को अपनाना पड़ा। युद्धरत साम्यवाद के तहत भूमि, किसानों और जमींदारों से छीनकर राज्य की घोषित कर दी गई और फिर उसको किसानों में बांट दिया गया। सरकार ने किसानों से जबरन अनाज लेने की नीति अपनाई, अपने खाने लायक अनाज को छोड़कर बाकी संपूर्ण उत्पादन सरकार को देने के लिए किसान बाध्य हो गया। उत्पादन को बाजार में बेचने से रोकने के लिए सशस्त्र टुकड़ियों को किसानों के अनाजों को जब्त करने के लिए भेजा गया। अनाज संग्रह करने वाले को कठोर सजाएं दी गई। गृह युद्ध और बोल्शेविक सरकार द्वारा बलपूर्वक अनाज लेने के खिलाफ कृषकों ने विद्रोह किया, जिससे कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई। देश में भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई और अकाल पड़ गया। कारण खेतों का असंतोषजनक विभाजन: बोल्शेविक क्रांति के सफल होने के बाद कृषकों से भूमि छीनकर उसका पुनः बँटवारा किया गया। भूमि के अव्यवस्थित विभाजन से किसानों म...