वारकरी आंदोलन
कुतुब परिसर के बहुआयामी अर्थ
दिल्ली के महरौली में स्थित कुतुब परिसर केवल मध्यकालीन स्मारकों या पत्थरों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह दिल्ली सल्तनत के उतार-चढ़ाव, उसकी राजनीतिक तथा धार्मिक महत्वाकांक्षाओं का एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इस परिसर में स्थित मस्जिद, मीनार, मकबरे और प्रवेश द्वार समय के साथ बदलते रहे और प्रत्येक सुल्तान ने इसके माध्यम से समाज, प्रजा और अपने शत्रुओं को अलग-अलग संदेश देने का प्रयास किया। आधुनिक इतिहासकारों जैसे आर. नाथ, पर्सी ब्राउन, सुनील कुमार, एंथनी वेल्च, और मोहम्मद मुजीब के अनुसार, कुतुब परिसर के साथ कई राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ जुड़े हुए है।
सैन्य विजय और राजनीतिक प्रभुत्व
क़ुतुब मीनार :- 'टावर ऑफ विक्ट्री' के रूप में मीनार कुतुब-उद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ईस्वी में शुरू की गई मीनार को एक 'विजय स्तंभ' के रूप में देखा गया। विद्वान पर्सी ब्राउन के अनुसार, यह मीनार सुदूर क्षेत्रों से भी दिखाई देती थी और यह स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा करती थी कि राजपूत शासकों को पराजित कर दिल्ली पर अब मुसलमानों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो चुका है।
लौह स्तंभ :- परिसर के प्रांगण में राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के समय का चौथी शताब्दी ईसा पूर्व का विशाल 'लौह स्तंभ' स्थापित है। सुल्तानों ने इस स्तंभ को नष्ट नहीं किया, बल्कि इसके शीर्ष से हिंदू/वैष्णव प्रतीक को हटाकर इसे मस्जिद के केंद्र में बनाए रखा। इतिहासकारों के अनुसार यह कृत्य यह दर्शाता था कि नई सल्तनत ने भारत के पुराने गौरव और संप्रभुता को अपने अधीन कर लिया है और अब वे ही इस भूमि के वैध शासक हैं।
धार्मिक सर्वोच्चता और सत्ता का वैधीकरण
मूर्तियों का पुनरुत्पादन और शक्ति का प्रदर्शन: कुतुब-उद्दीन ऐबक के इतिहासकार हसन निजामी ने अपने ग्रंथ 'ताज-उल-माआसिर' में लिखा है कि विजेता ने शहर को मूर्ति पूजा से मुक्त किया और वहाँ देवताओं के गर्भगृहों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कीं। परिसर के पूर्वी द्वार पर लगा शिलालेख गवाही देता है कि मस्जिद का निर्माण 27 हिंदू और जैन मंदिरों को नष्ट करके उनके मलबे से किया गया था।
विद्वान सर सैयद अहमद खान और ब्रिटिश अलेक्जेंडर कनिंघम का तर्क है कि मंदिरों की मूर्तियों और स्तंभों को उलट-पुलट कर या दीवारों में चुनकर नई मस्जिद बनाना गैर-मुस्लिम आबादी के लिए एक संदेश था, जो स्थापित करता था कि पुरानी व्यवस्था का अंत हो चुका है।
'कुव्वत' बनाम 'कुब्बत' का विवाद :- आधुनिक समय में इस मस्जिद को आमतौर पर 'कुव्वत-उल-इस्लाम' (इस्लाम की शक्ति) कहा जाता है। लेकिन इतिहासकार सुनील कुमार ने अपने शोध 'Qutb and Modern Memory' में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया है। वे बताते हैं कि मध्यकालीन समकालीन ग्रंथों में इस मस्जिद का नाम कभी भी 'कुव्वत-उल-इस्लाम' नहीं था, बल्कि इसे 'कुब्बत-उल-इस्लाम' अर्थात् इस्लाम का गुंबद कहा जाता था।
इस्लामी दुनिया में 'कुब्बत-उल-इस्लाम' की उपाधि उन गिने-चुने शहरों को दी जाती थी जो सुरक्षा, ज्ञान और धार्मिक आस्था के गढ़ बन जाते थे। 13वीं शताब्दी में जब चंगेज खान ने मध्य एशिया और ईरान के इस्लामी शहरों को तहस-नहस कर दिया, तब दिल्ली का यह परिसर पूरी इस्लामी दुनिया के लिए एक सुरक्षित 'गुंबद' या शरणस्थली बनकर उभरा। इस प्रकार, सुल्तानों के लिए यह परिसर पूरी मुस्लिम दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाने का साधन था।
सूफी संत से जुड़ाव और 'बरकत':- इस मीनार और परिसर का नाम प्रसिद्ध चिश्ती सूफी संत ख्वाजा कुतुब-उद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर भी 'कुतुब मीनार' पड़ा। तत्कालीन समाज में यह मान्यता थी कि सुल्तान की सत्ता को स्थायित्व सूफी संतों के आध्यात्मिक आशीर्वाद से मिलता है। इसलिए सुल्तानों और आम जनता दोनों के लिए यह परिसर एक गहरा आध्यात्मिक महत्व रखता था।
सांस्कृतिक समेलन
कई आधुनिक इतिहासकारों ने कुतुब परिसर को केवल संघर्ष के नजरिए से न देखकर इसे दो महान संस्कृतियों के मिलन स्थल के रूप में परिभाषित किया है। इतिहासकार एम. मुजीब और माइकल मैस्टर का तर्क है कि इस परिसर के निर्माण का उद्देश्य केवल मुस्लिम विजय की घोषणा करना नहीं था। वे देशी (हिंदू-जैन) और विदेशी (मुस्लिम) तत्वों के बीच स्थापत्य सद्भाव को रेखांकित करते हैं। चूंकि सुल्तान अपनी नई वास्तुकला को आकार देने के लिए पूरी तरह से स्थानीय हिंदू कारीगरों पर निर्भर थे, इसलिए इन कारीगरों ने बिना किसी संकोच के इस इमारत पर अपनी कलात्मक उत्कृष्टता की मुहर लगा दी। मस्जिद के स्तंभों पर बने 'कलश', लटकाती घंटियां, और कमल के फूल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
प्रजा और कारीगरों का दृष्टिकोण :- इतिहासकार इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि तत्कालीन हिंदू कारीगरों के लिए यह मीनार किसी शोक या पराजय का प्रतीक नहीं थी। परिसर में मिले स्थानीय शिलालेखों से पता चलता है कि शिल्पकारों ने काम पूरा होने पर वास्तुकला के देवता भगवान विश्वकर्मा की स्तुति की और मीनार को गर्व से "मलिकदीन का स्तंभ" कहा, जिसे वे सौभाग्य का प्रतीक मानते थे।
विद्वान एंथनी वेल्च और रॉबर्ट हिलनब्रांड का दृष्टिकोण :- इन विद्वानों ने एक मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाया। उनका मानना था कि भले ही दो संस्कृतियों के मिलने से स्थापत्य में एक तनाव दिखाई देता है क्योंकि मुस्लिम संरक्षक अपनी मातृभूमि मध्य एशिया जैसी वास्तुकला चाहते थे और हिंदू कारीगर अपनी शैली में माहिर थे अंततः इसलिए इस परिसर ने दोनों संस्कृतियों को मिलाकर भारत-इस्लामी (Indo-Islamic) कला की एक नई परिभाषा को जन्म दिया।
जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ, कुतुब परिसर सुल्तानों के लिए अपनी व्यक्तिगत महिमा, धन और शाही निरंतरता को प्रदर्शित करने का एक राजनीतिक मंच बन गया। इल्तुतमिश ने मस्जिद के प्रांगण को दोगुना कर दिया और मीनार की तीन और मंजिलें जोड़ीं। इल्तुतमिश के समय तक साम्राज्य स्थिर हो चुका था, इसलिए उसने ध्वस्त मंदिरों की सामग्री के बजाय स्वतंत्र रूप से तराशे गए पत्थरों का उपयोग किया और कूफि तथा नस्ख शैलियों में बेहतरीन सुलेख करवाया ताकि शासन वैध मुस्लिम साम्राज्य के रूप में स्थापित दिखे।
खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा :- अलाउद्दीन खिलजी ने जब दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त की, तो उसने इस परिसर को अपनी असीमित शक्ति के प्रदर्शन का जरिया बनाया। उसने परिसर के आकार को इल्तुतमिश से भी दोगुना बढ़ा दिया और कुतुब मीनार से दोगुनी ऊंची 'अलाई मीनार' की नींव रखी। यद्यपि यह मीनार उसकी मृत्यु के कारण अधूरी रह गई, लेकिन उसका निर्मित हिस्सा 'अलाई दरवाजा' आज भी खड़ा है।
इतिहासकार मोइन एस. हकाक के अनुसार अलाई दरवाजा यह दर्शाता है कि अलाउद्दीन खिलजी संरचना की दीर्घकालिक स्थिरता के बजाय शाही तड़क-भड़क, भव्यता और दिखावे में अधिक रुचि रखता था। लाल पत्थर, सफेद संगमरमर के विरोधाभास और विस्मयकारी अरबी सुलेख से सुसज्जित यह दरवाजा खिलजी साम्राज्य की चरम शक्ति का प्रतीक था।
निष्कर्ष
दिल्ली के सुल्तानों के अधीन कुतुब परिसर के मायने समय के साथ लगातार विकसित होते रहे। जहाँ यह शुरुआत में सैन्य विजय, मूर्तिभंजन और राजनीतिक प्रभुत्व की एक कठोर उद्घोषणा था; वहीं मध्यकालीन संकट के दौर में यह पूरी इस्लामी जगत के लिए एक पवित्र शरणस्थली ('कुब्बत-उल-इस्लाम') और सूफी आध्यात्मिक आशीर्वाद का केंद्र बन गया। आगे चलकर यह सुल्तानों की असीमित साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बना। इन सबसे अलग यह परिसर धर्मनिरपेक्ष कला का एक ऐसा अनूठा उदाहरण है जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही कारीगरों की व्यक्तिगत प्रतिभा ने मिलकर भारत-इस्लामी संस्कृति की एक अमर गाथा लिख दी।
Bibliography
Percy Brown :- Indian Architecture
R. Nath :- Islamic architecture and culture in India.
Sunil Kumar :- Qutb and Modern Memory
M. Mujeeb :- Islamic Influence on Indian Society
Michael Willis :- The Archaeology of Hindu Ritual
E. B. Havell :- The Ancient and Medieval Architecture of India
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