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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

1812 के युद्ध के कारण और परिणाम

प्रश्न:- 1812 के युद्ध के कारणों और परिणामों का वर्णन कीजिए। परिचय:- 1812 का युद्ध अमेरिका और ब्रिटेन के बीच लड़ा गया। यह युद्ध मुक्त सागर और नाविक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ा गया था। किंतु युद्ध का कारण विवादास्पद बना रहा। कुछ लोग मानते हैं कि यह युद्ध सीमांत भूमि के लिए लड़ा गया, किंतु कुछ लोगों का मानना है कि यह युद्ध मुक्त सागर के लिए लड़ा गया। न्यू इंग्लैंड के व्यापारियों ने इस युद्ध का विरोध किया और इसे मेडिसन का युद्ध बतलाया। इसने इंडियन व्यवधान को तोड़ दिया जो उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम विस्तार के मार्ग में बाधा थे। युद्ध के फलस्वरुप व्यापार-व्यवसाय को प्रोत्साहन मिला और औघोगिक श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हुआ। इस युद्ध का अंत 1815 में हुआ। यह वर्ष संयुक्त राज्य और विश्व के अन्य देशों के साथ उसके संबंधों के लिए युगांतकारी साबित हुआ। पहले यह देश यूरोपीय मामलों में उलझा रहता था और इसका अधिकांश ध्यान विदेशिक मामलों में केंद्रित रहता था। लेकिन युद्ध के बाद यह अपना अधिकांश ध्यान गृह-मामलों में केंद्रित करने लगा। लगभग एक शताब्दी तक वैदेशिक मामलों की अपेक्षा गृह मामलों की प्राथमिकता बन...

अमेरिका के संविधान का निर्माण

प्रश्न:- (1787) अमेरिका के संविधान के निर्माण का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- 1776 में जिस समय अमेरिका को आजादी मिली, तब वहां कॉन्टिनेंटल कांग्रेस के अलावा कोई भी केंद्र सरकार नहीं थी। जिसका प्रमुख उद्देश्य युद्ध के संचालन को देखना था। क्योंकि इस कांग्रेस में विधानमंडल, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका जैसी एक भी संस्था नहीं थी। 1777 में कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने संघ के अनुच्छेदों की नियमावली (article of confederation) को अपनाया तथा राज्यों की स्वीकृति के लिए भेज दिया। इस संघ को विदेशों के साथ राजनीतिक संबंधों का संचालन करने तथा रक्षा आदि मामलों में अधिकार प्राप्त थे, लेकिन न तो यह कर लगा सकता था और न ही व्यापार तथा वाणिज्य से संबंधित इसे कोई अधिकार प्राप्त था। इस नियमावली के अधीन प्रत्येक अमेरिकी राज्य को प्रभुता संपन्न तथा स्वतंत्र मान लिया गया लेकिन उनसे अपेक्षा की गई कि वह कांग्रेस की सिफारिशों को अवश्य लागू करें। इस संघ में प्रत्येक राज्य को अलग-अलग एक-एक वोट प्राप्त था। बिना राज्यों की अनुमति के नियमावली में संशोधन नहीं किया जा सकता था। प्रत्येक राज्य के अपने अलग-अलग न्यायालय थे। धन ...

अकबर की "सुलह-ए-कुल" की नीति

प्रश्न:- अकबर की "सुलह-ए-कुल" की नीति का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- अकबर ने यह महसूस किया कि सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है। अतः उसने सर्वधर्म समन्वय अर्थात सब धर्मों की अच्छी बातें लेने का मार्ग अपनाया। इसी को उसने 'सुलह-ए-कुल' कहा। इस तरह सब धर्मों की अच्छी बातों को लेकर उसने दीन-ए-इलाही चलाया। अकबर की धार्मिक नीति के मुख्य रूप से दो पक्ष थे- उसकी राज्य नीतियां व उसके अपने व्यक्तिगत विचारों के कारण। उसने उदार नीति अपनाकर हिंदुओं के प्रति सामान्य व्यवहार किया तथा रूढ़िवादिता को समाप्त किया। अकबर की नीतियों ने धार्मिक विरोधी समाज में सामंजस्य और सद्भावना का वातावरण उत्पन्न किया। हाल के इतिहासकारों ने उन आधारों पर ध्यान केंद्रित किया है जिसके कारण अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। इतिहासकार "इक्तेदार आलम खान" के अनुसार अकबर ने शिया और राजपूतों को भी अपनी नीति में शामिल किया। अकबर ने इसे अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में अपनाया था। माना जाता है कि अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति जनमानस पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाई और उन्हें पूर्ण रूप से प्रभावित नहीं कर सक...

मुगलकाल में जमीदारो की भूमिका

प्रश्न:- मुगल काल में जमीदारों की भूमिका का वर्णन कीजिए। परिचय:- मुगल साम्राज्य के प्रत्येक हिस्से में जमीदार उपस्थित थे और मुगलकालीन भारत की कृषि संरचना में उन्हें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। कृषि की जमीनों के स्वामी होने के अलावा जमीदारों के एक अच्छे खासे वर्ग को अपने गांवों से मालगुजारी की वसूली का पुश्तैनी अधिकार प्राप्त था। मालगुजारी वसूल करने के बदले जमींदार उसमें से एक हिस्सा पाता था। जमीदार अपनी जमीदारी में आने वाले सभी जमीनों का स्वामी नहीं होता था। जमीन पर वह वास्तव में खेती करने वाले किसान जब तक मालगुजारी देते रहते थे, वह बेदखल नहीं किए जा सकते थे। इस तरह जमीन में जमीदार और किसानों के अपने-अपने वंशानुगत अधिकार थे। जमीदारों के ऊपर राजा होते थे जो छोटे-बड़े भूखंडों के स्वामी होते थे तथा उन्हें कम या अधिक आंतरिक स्वायत्तता प्राप्त होती थी। जमीदारों और राजाओं के अपने-अपने सैनिक दल होते थे। इन जमीदारों की मध्यकाल में संख्या काफी बड़ी थी। आईन-ए-अकबरी के अनुसार अकबर के काल में इनके पास 3,84,558 सवार, 42,77,057 पैदल सैनिक, 1,863 हाथी और 4,260 तोपें थी। जमीदारों का यह अधिका...

ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत में वि- औद्योगिकरण

प्रश्न:- वि-औद्योगीकरण के विषय में हुए वाद-विवाद का विस्तार से वर्णन कीजिए। परिचय:- वि-औद्योगीकरण से तात्पर्य किसी भी राष्ट्र की औद्योगिक क्षमता में गिरावट से है। किसी भी अर्थव्यवस्था में यह स्थिति तब आती है जब उद्योगों का अंशदान कम होता जाता है और गैर औद्योगिक क्षेत्र का अंशदान बढ़ता जाता है। दूसरे शब्दों में जब अर्थव्यवस्था में द्वितीय क्षेत्र की भागीदारी कम होती जाती है और प्राथमिक क्षेत्र की भागीदारी बढ़ती जाती है तो स्थिति वि-औद्योगीकरण की होती है। ब्रिटिश भारत के काल में भारत की अर्थव्यवस्था को भी एक ऐसे ही स्थिति से गुजरना पड़ा जिसके लिए वि-औद्योगीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। वि-औद्योगीकरण का विचार सबसे पहले "दादा भाई नौरोजी" ने 19वीं सदी के अंत में दिया था जिसका समर्थन बाद में रमेश चंद्र दत्त जैसे विद्वानों ने किया। नौरोजी और दत ने इस प्रक्रिया की तार्किक व्याख्या की और आंकड़ों के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारत में अंग्रेजों की उपस्थिति का सीधा परिणाम था -वि-औद्योगिकरण। वहीं साम्राज्यवादी इतिहासकारों, जिसमें "डी. मार्थट" और मॉरिस-डी-माॅरि...

अकबर के शासनकाल मनसब व्यवस्था का विकास

प्रश्न:- अकबर के शासन काल में मनसब व्यवस्था का वर्णन कीजिए। परिचय:- एक शक्तिशाली सेना के बिना अकबर न अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकता था और न उस पर नियंत्रण रख सकता था। इस उद्देश्य के कारण उसके लिए अपने अमीर वर्ग को और अपनी सेना को भी संगठित करना आवश्यक था। अकबर ने यह दोनों उद्देश्य मनसबदारी व्यवस्था के सहारे पूरे किए। इस व्यवस्था में हर अधिकारी को एक मनसब दिया जाता था। मनसबदारी व्यवस्था मुगलों को एक प्रकार की नागरिक सेवा व्यवस्था प्रदान करती थी। मनसब का शाब्दिक अर्थ पदवी, गौरव या प्रतिष्ठा है। "इरविन" के अनुसार मनसबदारी व्यवस्था का अभिप्राय पदों में क्रम स्थापित करना तथा वेतन निर्धारित करना था। यह मनसबदार नागरिक और सैनिक दोनों विभाग में होते थे। सबसे कम मनसब 10 का और सबसे अधिक 5,000 का था। शाही परिवार के शहजादे इससे अधिक का मनसब पाते थे। अकबरी दौर के अंतिम भाग में सबसे ऊंचे मनसब को 5,000 से बढ़ाकर 7,000 कर दिया गया और साम्राज्य के दो प्रमुख कुलीनो अर्थात मिर्जा अजीज कोका और राजा मानसिंह को 7000 के मनसब दिए गए थे। अकबर के काल में मनसब व्यवस्था का क्रमिक विकास हुआ। 1594-95 मे...

अकबर की राजपूत नीति का वर्णन

प्रश्न:- अकबर की राजपूत नीति का वर्णन कीजिए ? क्या अकबर ने धार्मिक उदारता की छाप छोड़ी। परिचय:- अकबर की राजपूत नीति को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 1569-70 तक पहला चरण माना जाता है जिसमें अकबर ने दिल्ली सुल्तानों की नीतियों का अनुसरण किया। दूसरे चरण में अकबर ने राजपूतों के साथ दोस्ती बढ़ाने का प्रयत्न किया। तीसरे चरण में अकबर ने मुस्लिम कट्टरपंथ से अपने को अलग कर लिया। राजपूतों के साथ अकबर के संबंध को लेकर कई प्रकार के विवाद हुए हैं। कुछ का तर्क है कि अकबर ने एक ऐसी व्यवस्था शुरू की जिसमें धर्म के आधार पर सार्वजनिक नियुक्तियों में कोई भेदभाव नहीं रखा जाता था। दूसरे यह तर्क देते हैं कि साम्राज्य के विस्तार के लिए अकबर ने राजपूत शक्ति का उपयोग किया और उन्हें एक दूसरे के खिलाफ लड़ाया ताकि एकजुट होकर वे साम्राज्य के लिए खतरा ना पैदा कर सकें। यह भी कहा जाता है कि अकबर की राजपूत नीति जमीदारों और लड़ाकू जातियों को अपने और मिलाने की नीति थी। इसमें राजपूत और अफगान दोनों शामिल थे। खैर जो भी हो राजपूतों की स्वामीभक्ति जगप्रसिद्ध थी। वे दरबार के अंदर और बाहर एक महत्वपूर्ण आधारस्तंभ साबित ...