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जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) || कोरिया और मंचूरिया

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                                                        जापानी साम्राज्यवाद (1894 से 1945) कोरिया और मंचूरिया मेजी काल की सबसे बड़ी पहचान राष्ट्रवाद थी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जापान ने आधुनिकीकरण की शुरुआत की। यह माना गया कि जापान को बचे रहने के लिए आधुनिक सेना और मज़बूत औद्योगिक आधार ज़रूरी हैं। तोकुगावा काल में जापान दुनिया से काफ़ी कटा हुआ था। दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों का रूप सबसे पहले पश्चिमी साम्राज्यवाद के संदर्भ से तय हुआ, जिसने संकट की भावना पैदा की। दरअसल विद्वान ई. एच. नॉर्मन आधुनिक जापानी राष्ट्रवाद को 'प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद' मानते हैं। यह राष्ट्र की चेतना और आधुनिक राज्य बनाने की तुरंत ज़रूरत का एहसास था, जो जापान में पश्चिम के सैन्य कब्ज़े या सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के डर से पैदा हुआ। इस तरह साम्राज्यवाद एक नए अंतरराष्ट्रीय माहौल की देन था। जापानी विस्तार एशियाई महाद्वीप पर केंद्रित रहा और खास तौर पर चीन और कोरिया के विर...

फ्रांसीसी क्रांति में प्रकाशनों की भुमिका

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फ्रांसीसी क्रांति में प्रकाशनों की भूमिका प्रिंटिंग प्रेस ने क्रांतिकारी विचारों का प्रसार करके और व्यापक आबादी को संचार और सूचना प्रसार का साधन प्रदान करके फ्रांसीसी क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे जनता को लामबंद करने और सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने में मदद मिली। इसने समाचारों, राजनीतिक पैम्फलेटों और क्रांतिकारी घोषणापत्रों के तेजी से प्रसार को बढ़ावा दिया और क्रांति के लिए जनता की राय और समर्थन को प्रेरित करने में मदद की। प्रिंटिंग प्रेस ने क्रांति के विचारधारा को आकार देने में भी भूमिका निभाई, क्योंकि विभिन्न समूहों और गुटों ने इसका इस्तेमाल अपने विचारों और एजंडो को बढ़ावा देने के लिए किया। इतिहासकार लिन हंट  जिन्होंने फ्रांसीसी क्रांति में प्रिंटिंग प्रेस की भूमिका पर विस्तार से लिखा है। अपनी पुस्तक,"फ्रांसीसी क्रांति में राजनीति, संस्कृति और वर्ग" में, कहा है की प्रिंटिंग प्रेस ने राजनीतिक संचार के एक नए रूप की अनुमति दी, जहां लोग बड़े पैमाने पर एक-दूसरे और राज्य के साथ जुड़ सके। संचार के इस नए रूप ने जनमत को आकार देने में मदद की और क्रांति की सफलता में मह...

कन्फूसियसवाद

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कन्फूसियसवाद   प्राचीन काल में चीन के दार्शनिक विचारों ने व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने बजाय सामाजिक जरूरतों को पूरा किया। इस समय में उत्पन्न हुए अधिकतर विचारक नौकरशाही तथा राजनितिक व्यवस्था की उत्पत्ति थे जो राजनितिक समूह से आते थे। आगे चलकर इन विचारकों ने अपने गुट बना लिए और वे उपदेशक हो गए। धीरे धीरे उनके शिष्यों ने उनकी विचारधाराओं को स्थापित किया। इनमे से ही एक विचारधारा कन्फूसियसवाद थी। जिसका अनुसरण चीन ने कई शताब्दियों तक किया। कन्फूसियसवाद एक पश्चिमी नाम है। चीनियों द्वारा इसे जू शियाओ या " विद्वानों का उपदेश" कहा जाता है। कन्फूसियस कब अस्तित्व में आया इसको लेकर विवाद है। चीनी उसके जन्म का समय 551 ई.पू. मानते है तथा वह 479 ई.पू. तक जीवित रहा। उसने एक छोटे अधिकारी के रूप में कई कार्य किये। जैसे कि उसने गोदाम प्रबंधन, अध्यापन, अपराध के लिए दंड देने वाले तथा सामाजिक कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारी के रूप में कार्य किया। आगे चलकर उसके यही उपदेश कन्फूसियस सम्प्रदाय में परिवर्तित हो गए। उसको इस सम्प्रदाय का सबसे बड़ा प्रवर्तक माना गया किन्तु अन्य कई उपदेशकों एव...

नायक राज्यों का उदय

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नायक राज्यों का उदय पंद्रहवी तथा सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर शासकों, कृष्णदेवराय (1509 -29) तथा अच्यूतदेवराय (1529 - 42) के शासनकाल में बड़ी संख्या में नायकों का उदय हुआ। विजयनगर के राजाओं द्वारा इन नायकों को भू-क्षेत्र आबंटित किये गए थे, जिसके बदले में इन नायकों को सैनिक टुकड़ी रखनी होती थी तथा राज्य की ओर से करों की वसूली करनी पड़ती थी। ऐसे भू-अनुदानों ने ही स्वतंत्र राजनितिक व्यवस्थाओं का आधार तैयार किया, जिन्होंने विजयनगर शासन के दौरान राज्यों का दर्जा हासिल कर लिया। इनमें से कुछ शक्तिशाली नायक राजव्यवस्थायें इक्केरी तथा ओड्यार उत्तरी दक्षिण कर्नाटक क्षेत्र में, सेंजी, तंजावुर तथा मदुरै के नायक तमिल क्षेत्र में स्थापित थे। इन राज्यों ने शक्तिशाली और स्वतंत्र होने की बावजूद विजयनगर शासको के प्रति स्वामिभक्ति दर्शाकर अपनी निष्ठा का दावा किया। नायक राजव्यवस्थाऐं अठाहरवीं शताब्दी में 1730 के दशक तक अस्तित्व में बनी रही जब प्रमुख नायक राज्यों में से अंतिम, मदुरै का पतन हुआ।   नायक राज्य मूल रूप से तेलगु थे। उन्हें वडूगा या उत्तरी प्रदेश के निवासी कहा जाता था। नायक राजव्यवस...

1848 की क्रांतियां

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1848 की क्रांति 1848 का वर्ष यूरोप के इतिहास में " क्रांति का वर्ष " माना जाता है I उस वर्ष यूरोप में छोटी बड़ी 17 क्रांतियां हुई I सर्वप्रथम 14 मार्च को वियना में विद्रोह हुआ जिसके फलस्वरूप मेटरनिख को ऑस्ट्रिया छोड़कर भागना पड़ा I उसी सप्ताह इटली, जर्मनी, बोहेमिया, हंगरी, कोटिया में विद्रोह की आग भड़क उठी I 15 मार्च को पोप के राज्य में विद्रोह की लहर फ़ैल गयी और 18 मार्च को मिलान निवासियों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया I 22 मार्च को वेनिस ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर और दूसरे ही दिन सार्डिनिया के राजा चार्ल्स एल्बर्ट ने ऑस्ट्रिया  के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी I इसके पहले ही जर्मनी में 15 मार्च को बर्लिन में विद्रोह हो चूका था और फेड्रिक विलियम को विवश होकर समस्त जर्मन के लिए वैधानिक शासन का सिद्धांत स्वीकार करना पड़ा था I बवेरिया के लोगो ने अपने राजा को सिंहासन त्यागने पर विवश किया और अपने लिए एक उदार शासन स्थापित किया I ऐसे ही विद्रोह डेनमार्क , हॉलैंड, आयरलैंड आदि देशों में हुए I यहां तक की इंग्लैंड भी इस क्रांति से अछूता नहीं रह सका I  इतिहासकार हाब्सवाम के अनु...

चिश्ती सिलसिला

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चिश्ती सिलसिला भारत में सूफियों के कई संप्रदाय थे। 1200 से लेकर 1500 तक सूफी मत का भारत में विस्तार हुआ। उस काल में कई नए संप्रदाय और आंदोलन प्रारंभ हुए जो कि हिंदू धर्म और इस्लाम के मध्य का रास्ता बताते थे। उनमें से चिश्ती सिलसिला महत्वपूर्ण है। चिश्ती सिलसिले का अजमेर , राजस्थान के कुछ नगरों, पंजाब , उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा तथा दक्षिण में विस्तार हुआ। चिश्ती सिलसिला के प्रमुख सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती, हमीदुद्दीन नागोरी, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर, निजामुद्दीन औलिया, शेख नसीरुद्दीन चिराग, शेख सलीम चिश्ती थे।  मोइनुद्दीन चिश्ती :- भारत में चिश्ती संप्रदाय के प्रथम संत शेख मोइनुद्दीन चिश्ती थे। उनकी कब्र अजमेर में है। जनसाधारण में वे ख्वाजा के नाम से विख्यात है। उनका जन्म लगभग 1143 में ईरान में स्थिति सिजिस्तान में हुआ था। उन्होंने भारत में मोहम्मद गौरी के आक्रमण के कुछ समय पूर्व प्रवेश किया था। वे अपनी योग्यता और सादगी के कारण भारत में प्रसिद्ध हो गए और सुल्तान उल हिंद (भारत का आध्यात्मिक बादशाह) की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने समरकंद , बुखारा और...

मीराबाई (भक्तिकाल में महिला संत)

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भक्तिकाल में महिला संत (मीराबाई) मध्यकाल में वैचारिक परिवर्तन को लेकर चलने वाला भक्ति आंदोलन हताश एवं शोषित वर्ग की आवाज बनकर उभरा और हाशिए पर पड़े वर्ग की पहचान बना। इसी हाशिए से निकलकर महिलाएं भी अपनी पहचान बनाने के लिए आगे आई जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि अन्याय एवं शोषण के भंवर से निकलने में पितृसत्तात्मक समाज अब उन्हें अधिक देर तक नहीं रोक सकता। मध्यकालीन समाज में भक्ति आंदोलन का आरंभ ही स्त्री-पुरुष के भेदभाव को तोड़ने वाला था। मध्य युग में जर-जोरू-जमीन के लिए होने वाले युद्ध में जहां स्त्री विजय पक्ष को जीती हुई वस्तु के रूप में प्राप्त होती तो पराजित पक्ष के साथ सती भी होती। दोनों ही सूरतो में स्त्री की इच्छा अनिवार्य न थी क्योंकि संस्कृति के ठेकेदार उसके विरोध को मानने को भी तैयार न थे। ऐसे में भक्तिकाल की विधवा मीराबाई ने जिस विरोध की मशाल जलाई उस समय की परिस्थितियों में एक स्त्री की निडरता को पुष्ट करता है क्योंकि सती न होकर भक्त बन जाना उस समय के समाज में स्त्री के लिए निषेध था। अंत: भक्तिन मीराबाई का ऐसा आचरण पुरुष प्रधान समाज के लिए चुनौती बना। मीराबाई का यह कथन “मेरे त...

चार्टिस्ट आंदोलन

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चार्टिस्ट आंदोलन चार्टिस्ट आंदोलन का आरंभ 1832 में हुआ। यह आंदोलन मजदूरों तथा श्रमिकों द्वारा चलाया गया, जो राजनीतिक अधिकार प्राप्त करके अपनी सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान करना चाहते थे। महारानी विक्टोरिया के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में इस आंदोलन ने जोर पकड़ा तथा यह आंदोलन 1848 तक चलता रहा। इस आंदोलन के प्रमुख नेता विलियम लॉवेट, थामस एट्वुर्ड तथा फीयरगस ओ. कोनर थे। इस आंदोलन के प्रसिद्ध केंद्र लंदन, बर्मिंघम तथा लीड्स आदि नगर थे। विद्वान कालाईल ने कहा है कि “चार्टिस्ट का मामला बड़ा गंभीर और दूर-दूर तक फैलने वाला था। इसका आरंभ केवल कल ही नहीं हुआ और न ऐसे ही किसी ढंग से आज या कल समाप्त किया जा सकता है”। आंदोलन का कारण:- (सामाजिक तथा आर्थिक) औद्योगिक क्रांति के कारण इंग्लैंड के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में काफी परिवर्तन आया। औद्योगिक विकास तथा मशीनों के प्रयोग से देश के उत्पादन एवं विदेशी व्यापार का आश्चर्यजनक विकास हुआ था परंतु इससे देश में हजारों किसान, कारीगर तथा मजदूर बेकार हो गए थे। कारखानों में लगे मजदूरों की स्थिति भी चिंताजनक हो गई थी। उन्हें बहुत कम वेतन प्रा...